फायरिंग की अजीब परंपरा, पेड़ पर 400 फीट ऊपर बंधे नारियल पर बंदूकधारियों का निशाना
विदिशा के झूकरजोगी में भुजरिया पर्व पर प्राचीन व अजीब परंपरा आज भी कायम. पेड़ पर लटके नारियल पर सबकी निगाहें. रवि प्रजापति की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : August 31, 2026 at 2:19 PM IST
विदिशा : मध्य प्रदेश विविधताओं से भरा राज्य है. त्यौहारों को मनाने की अपनी अलग-अलग परंपराएं हैं, जिनका पालन आज भी लोग बड़ी शिद्दत से करते हैं. ऐसी ही एक अजीब परंपरा विदिशा और आसपास भुजरिया पर्व पर देखी जाती है. विदिशा के झूकरजोगी में बंदूकों के साए में भुजरिया पर्व मनाया जाता है. भुजरियों के विसर्जन से पहले ऊंचे पेड़ पर नारियल बांधा जाता है. इस नारियल पर बंदूक से निशाना लगाया जाता है. निशाना सटीक होने और नारियल फूटने के बाद ही भुजरियों का विसर्जन शुरू होता है.
पेड़ पर बंधे नारियल पर बंदूक से निशाना
भुजरिया पर्व के दौरान एक तरफ महिलाएं मंगलगीत गाती हैं और पारंपरिक रस्में निभाती हैं तो दूसरी ओर गांव के लाइसेंस बंदूकधारी ऊंचे पेड़ पर बंधे नारियल पर निशाना लगाते हैं. बेहद ऊंचे पेड़ पर नारियल बांधा जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार पेड़ की ऊंचाई करीब 300 से 400 फीट तक होती है. इतनी ऊंचाई पर बंधे नारियल को जमीन से बंदूक के जरिए निशाना बनाना आसान नहीं होता. नारियल फोड़ने के लिए लाइसेंस बंदूकधारी आयोजन स्थल पर पहुंचते हैं. एक के बाद एक निशानेबाज अपनी बंदूक से नारियल पर निशाना साधते हैं.
नारियल फूटने के बाद ही विसर्जन
जैसे-जैसे निशानेबाजी आगे बढ़ती है, मौके पर मौजूद लोगों की उत्सुकता भी बढ़ती जाती है. लोगों की निगाहें पेड़ की ऊंचाई पर बंधे नारियल पर टिकी रहती हैं. जैसे ही किसी निशानेबाज की गोली नारियल को लगती है और नारियल टूटकर नीचे गिरता है तो पूरा माहौल जयकारों से गूंज उठता है. इसके बाद भुजरियों के विसर्जन की रस्म पूरी की जाती है.
आयोजन के दौरान गीत और संगीत
स्थानीय मान्यता के मुताबिक जब तक ऊंचाई पर बंधा नारियल निशाने से नहीं टूटता, तब तक भुजरियों का विसर्जन नहीं किया जाता. इस दौरान लोकगीतों का दौर चलता है. महिलाएं और युवतियां पारंपरिक नृत्य करती हैं. इसके बाद जब निशानेबाजी की रस्म पूरी होती है तो भुजरियों को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है. लोक संस्कृति और पारंपरिक निशानेबाजी का यह मेल झूकरजोगी के भुजरिया पर्व को दूसरी जगहों से अलग पहचान देता है.

झूकरजोगी में निशानेबाजी देखने उमड़ती है भीड़
प्राचीन काल से ही भुजरियों के अवसर पर जुलूस और सामूहिक आयोजन होने तथा उनकी सुरक्षा के लिए हथियारों का इस्तेमाल किए जाने की लोक मान्यता है. झूकरजोगी में भुजरिया पर्व के दौरान आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं. लोगों के लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ कौतूहल का विषय भी रहता है.

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हथियारों से जुड़ी परंपरा में सुरक्षा पर भी फोकस
झूकरजोगी की भुजरियों की यह परंपरा ऐसे दौर में जारी है, जब ग्रामीण समाज की कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे बदल रही हैं. निशानेबाज पवन सिंह राजपूत बताते हैं " उद्देश्य यही है कि सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे. लेकिन इसके साथ हथियारों से जुड़े सभी कानूनी प्रावधानों और सुरक्षा मानकों का पालन भी जरूरी है. परंपरा तभी सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ सकती है, जब आस्था और संस्कृति के साथ सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जाए."

