विदिशा में हर साल जनवरी में ही क्यों होती है रामलीला? जानिए 125 साल पुराना इतिहास
विदिशा में आयोजित ऐतिहासिक रामलीला में रावण वध का मंचन, सन् 1901 से हर साल होता आया है मेले का आयोजन.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 7, 2026 at 5:32 PM IST
|Updated : February 7, 2026 at 7:52 PM IST
विदिशा: शहर की ऐतिहासिक रामलीला में शुक्रवार को रावण वध का मंचन किया गया. विदिशा में चलित रामलीला का आयोजन आजादी के पहले से लगातार होता चला आ रहा है. इस बार रामलीला का यह 125वां साल है. इसकी शुरुआत 1901 में की गई थी और आज तक हर साल इसका आयोजन होता आया है. कोरोना काल के दौरान भी विदिशा में चलित रामलीला नहीं रुकी थी.
रावण वध देखने पहुंचे हजारों लोग
शुक्रवार रात करीब 12 बजे रावण वध का मंचन किया गया. राम-रावण युद्ध का मंचन अत्यंत सजीव और रोमांचक रहा. रावण वध के साथ ही रावण का दहन किया गया. इस दौरान रोशनी और आतिशबाजी से आसमान गूंज उठा. मेले में रावण वध की लीला देखने विदिशा सहित आस पास के इलाके से हजारों की संख्या में दर्शक पहुंचे थे. सभी दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया.
हर साल जनवरी में ही क्यों होती है रामलीला?
विदिशा शायद एकमात्र ऐसा शहर है, जहां जनवरी में रामलीला का आयोजन किया जाता है. मकर संक्रांति के अवसर पर हर साल यहां 27 दिनों तक इसका आयोजन किया जाता है.
इतिहासकार गोविंद देवलिया बताते हैं कि "बाबा बलदेव दास द्वारा सन् 1900 में यहां एक यज्ञ कराया गया था. उस दौरान मकर संक्रांति के समय यहां स्थित चरण तीर्थ पर मेला आयोजित हुआ था. (चरण तीर्थ वह स्थल हैं, जहां भगवान राम के चरण बने हुए हैं. माना जाता है कि यहां भगवान राम आए थे.) इस मेले में रामलीला मंडली भी आई थी, जिसका सुंदर मंचन किया गया. इसी समय पंडित विश्वनाथ शास्त्री को हर साल रामलीला प्रारंभ करने का सुझाव दिया गया. इसके बाद उन्होंने 1901 से रामलीला मंचन की शुरुआत की. इसके बाद यह सिलसिला बगैर रुके जारी है."

लंका और अयोध्या के रूप में बने हैं पक्के मकान
यह रामलीला प्रांगण बेतवा नदी से लगा हुआ क्षेत्र है. जहां लंका और अयोध्या अलग-अलग क्षेत्र में बनी हुई, जिसमें पक्की इमारतें भी है. यहीं पर प्रसंग अनुसार लीला का मंचन होता है. जैसे जब लंका दहन होता है, तो लंका नामक भवन को जलने का दृश्य दिखाया जाता है. मेले का संचालन पहले नगर के लोगों की रजिस्टर्ड समिति करती थी. 1956 में बाबू तख्तमल और रामसहाय जी के प्रयास से विधानसभा में रामलीला एक्ट पारित किया और शासन से सहयोग दिलवाया गया. तब से रामलीला एक्ट के अनुसार जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में इस मेले का आयोजन होने लगा.

रामलीला मेला समिति के सचिव डॉ अनिल शर्मा ने बताया कि "हमारे पूर्वजों से हम सुनते थे कि पूर्व राष्ट्रपति पंडित शंकर दयाल शर्मा ने इस रामलीला में वानर का पात्र निभाया है. लीला का उद्देश्य सनातन धर्म और भगवान राम के चरित्र से युवा पीढ़ी को अवगत कराना है. इस बार मेले में 51 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया है."

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सुरक्षा के किए गए थे कड़े इंतजाम
भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे. आयोजन स्थल पर पर्याप्त पुलिस बल तैनात रहा तथा यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए विशेष व्यवस्था की गई. महिला एवं बच्चों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया. आयोजन शांतिपूर्ण एवं अनुशासित वातावरण में संपन्न हुआ. एएसपी प्रशांत चौबे ने बताया कि "सुरक्षा को लेकर भी तमाम व्यवस्थाएं की गई थीं. "

