बनारस के 53 घाटों पर फैला भारत का भूगोल: देश के अलग-अलग राजाओं की विरासत की दास्तान सुनाते घाट
काशी के कुल 84 घाटों में कई विविधताओं का संगम, जानिए खास घाटों से जुड़ी खास बातों के बारे में.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : February 20, 2026 at 8:31 AM IST
|Updated : February 20, 2026 at 2:13 PM IST
रिपोर्ट: गोपाल मिश्रा
वाराणसी: काशी कबहु ना छोड़िए विश्वनाथ दरबार, यानी काशी कभी मत छोड़िए क्योंकि यहां विश्वनाथ का दरबार, इस नगरी को मोक्ष के शहर के रूप में भी जाना जाता है और बाबा विश्वनाथ मां गंगा का तीर्थ होने के कारण इस पावन भूमि पर हर कोई आना चाहता है. शायद यही वजह है कि वाराणसी में हर राज्य के राजाओं ने अपनी छाप छोड़ने की कोशिश की है और यह यहां के गंगा घाटों पर साफ तौर पर दिखाई भी देता है. बनारस एकमात्र ऐसा शहर है जहां 84 घाटों की लंबी श्रृंखला मौजूद है. यहां के करीब 53 ऐसे घाट हैं जिनका कनेक्नशन राजशाही से हैं. चलिए आगे जानते हैं इनके बारे में.
देश के हर हिस्से का नेतृत्व: घाटों के जानकार बताते हैं कि बनारस में धर्म की दृष्टि से बहुत से गंगा घाट है, लेकिन ऐतिहासिकता के आधार पर यहां घाटों की मौजूदगी देश के हर हिस्से का नेतृत्व करती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बनारस के गंगा घाटों का निर्माण 17वीं शताब्दी से शुरू हुआ और 18वीं शताब्दी तक मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल सहित अलग-अलग राज्यों के राजाओं ने काशी वास की नीयत से अपने महल और घाटों का निर्माण करवाया. यही वजह है की गंगा घाट किनारे काशी का एक ऐसा स्वरूप दिखाई देता है, जो शायद पूरे देश को काशी में एकजुट करने का काम करता है काशी के गंगा घाट पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण और उत्तर से लेकर पश्चिम तक का जीवन स्वरूप नजर आता है. यहां हर राजा के महल आज भी गंगा की शोभा को और बढ़ाने का काम करते हैं. गंगा घाटों कि यह मणिमला मां गंगा के गले में जैसे कोहिनूर के समान चमकती नजर आती है.


काशी जैसे घाट देश में कहीं भी नहीं: इस बारे में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के प्रोफेसर अजीज कुमार शुक्ला का कहना है कि बनारस में 84 घाट और अनेक रूप से है. हरिद्वार जाइए गढ़मुक्तेश्वर जाइए ऋषिकेश जाइए या और भी जगह पर जाइए यहां घाट मिलेंगे लेकिन उसे रूप में नहीं जैसे काशी में, लेकिन काशी में 84 घाट है जो पूरी तरह से पक्के हैं और ऐतिहासिकता की दृष्टि से हर घाट का अपना महत्व है.


कब से शुरू हुआ था निर्माण: उन्होंने बताया कि काशी नरेश 17वीं शताब्दी में राजघाट पर रहा करते थे. इसी घाट पर उनका महल था और सेना भी यही थी, बाद में जब काशी के गंगा घाटों पर अलग-अलग स्टेट के राजा बसने लगे तो काशी नरेश ने गंगा उस पार रामनगर के किले का निर्माण किया, क्योंकि उनकी सेना के लिए जगह कम थी. तब वह गंगा उस पार जाकर अपने किले में रहने लगे. उस वक्त जब देश के अलग-अलग राजाओं ने काशी में कुछ वक्त तक रहने और काशीवास करने की इच्छा जाहिर की तो उनके पास यहां जगह नहीं थी. उस वक्त के जो प्रमुख राजा थे. उन्होंने काशी नरेश से निवेदन किया कि हमें काशी में कुछ घाटों के किनारे स्थान दिया जाए और उन्होंने उसे वक्त अलग-अलग राज्यों को काशी में घाट किनारे जगह उपलब्ध होती गई. जिसमें दरभंगा नरेश, सिंधिया स्टेट, मानसिंह घाट, चेत सिंह घाट, बूंदी पर कोटा घाट, शिवाला घाट ऐसे ही अलग-अलग घाटों का निर्माण हुआ. इनका ऐतिहासिक महत्व विशेष रूप से माना जाता है.

कई घाटों का अपना अस्तित्व: काशी में मणिकर्णिका, शीतला दशाश्वमेध, पंचगंगा जैसे धार्मिक घाटों का एक अपना ही अस्तित्व है यह काशी की स्थापना के समय से स्थापित है, लेकिन जो कच्चे घाट थे वह 16वीं शताब्दी में अकबर काल में जब गोस्वामी तुलसीदास जी ने काशी का वर्णन अपने सबसे चर्चित श्री रामचरितमानस में किया बालकांड में उन्होंने अपने एक श्लोक के जरिए काशी में मोक्ष और इसके महत्व के बारे में बताया तो उसे वक्त के सनातनी राजाओं ने काशीवास करने की इच्छा के साथ यहां बसने का संकल्प लिया. उस वक्त राजाओं के लिए कहीं जाना मतलब पूरी व्यवस्था के साथ वहां रहना होता था और ऐसे में काशी नरेश ने 17वीं शताब्दी में इन राजाओं को काशी में धीरे-धीरे जगह देकर उनके स्ट्रक्चर और स्थापत्य कला के अनुसार महलों का निर्माण करवाना शुरू किया. इसके बाद हर स्टेट के राजा ने काशी में अपना महल बनाया और उस महल के बाहर का घाट उस राजा के स्टेट के नाम से चर्चित हुआ.



देश का इकलौता शहर इस वजह से: उन्होंने बताया कि काशी एकमात्र ऐसा शहर है जहां पर देश के बड़े राजघराने के घाट उनके नाम से जाने जाते हैं. हर राजघराने का घाट यहां पर मौजूद है और आज भी उनके महल गंगा किनारे पौराणिकता और ऐतिहासिकता को समेटकर साथ चल रहे हैं. प्रोफेसर शुक्ला का कहना है कि समय के साथ चीज बदलती हैं और ऐसे में कुछ गंगा घाट किनारे भवन और महल होटल में भी तब्दील हो रहे हैं. इसे जरूरत भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा, क्योंकि राजघराने रहे नहीं जो है वह इन्हें संरक्षित नहीं कर रहे. इस वजह से पर्यटकों की दृष्टि से इनको तब्दील करना ज्यादा उचित है. इससे इनका संरक्षण भी है और आर्थिक दृष्टि से भी मुनाफा है. लेकिन काशी का यह स्वरूप हर राज्य के राजाओं के प्रतिनिधित्व को आज भी काशी में स्थापित करता है.

कुछ प्रमुख धर्मिक घाट
- अस्सी घाट: ये घाट वाराणसी के दक्षिणी छोर पर गंगा व असि नदी के संगम पर स्थित है. अस्सी नदी के किनारे बसा यह घाट इस नदी के नाम पर जाना जाता है और यही से वाराणसी की शुरुआत भी होती है.
- तुलसीघाट: तुलसीघाट कवि व संत तुलसीदास कर नाम पर है. यहाँ गोस्वामी तुलसी दास ने श्रीरामचरित मानस के कई अंशों की रचना की थी. तुलसीदास ने अपना आखिरी समय यहीं व्यतीत किया था.
- हरिश्चंद्र घाट: हरिश्चंद्र घाट राजा हरिश्चंद्र के नाम से जाना जाता है. सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र डोम के हाथों यही बिके थे.
- केदार घाट: केदार घाट का नाम केदारेश्वर महादेव मंदिर के नाम पर पड़ा है. इस घाट के समीप में ही स्वामी करपात्री आश्रम व गौरी कुंड स्थित है.
- दशाश्वमेध घाट: प्राचीन ग्रंथों के मुताबिक राजा दिवोदास द्वारा यहाँ दस अश्वमेध यज्ञ कराने के कारण इसका नाम दशाश्वमेध घाट' पड़ा.
- मणिकर्णिका घाट: इस घाट की गणना काशी के पंचतीर्थों में की जाती है. मणिकर्णिका घाट पर स्थित भवनों का निर्माण पेशवा बाजीराव तथा अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था. यह घाट पौराणिक दृष्टि से माता पार्वती और भगवान शंकर के प्रेम का प्रतीक है.
- पंचगंगा घाट: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पंचगंगा घाट से गंगा, यमुना, सरस्वती, किरण व धूतपापा नदियों गुप्त रूप से मिलती हैं. इसी घाट की सीढ़ियों पर संत कबीर लेट गए थे और गुरु रामानंद जी के चरण उन पर पड़े इसके बाद रामानंद जी अपना गुरु माना.
ये घाट है राजघरानों के नाम पर
- चेतसिंह घाट: चेत सिंह घाट एक किले की तरह लगता है. चेत सिंह बनारस के एक राजा थे. जिन्होंने 1781 ई. में वॉरेन हेस्टिंगस की सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. आज भी यह सिलापट्ट इस घाट के ऊपर मौजूद किले के बाहरी दीवार पर लगा है.
- मणिकर्णिका घाट: यह घाट काशी विश्वनाथ मंदिर के पास है और महाराज ग्वालियर में इसका निर्माण करवाया करवाया था. इस घाट पर अहिल्याबाई होल्कर ने कई मंदिरों का मणिकर्णिका घाट का बदला स्वरूप सामने लाने का काम किया था.
- अहिल्याबाई घाट: काशी का यह घाट शीतला घाट यानी दशाश्वमेध के पास है. यह स्थान महारानी अहिल्याबाई होलकर के महल के रूप में स्थापित है और घाट किनारे ही उनका महल और घाट आज भी मौजूद है.
- दरभंगा घाट: इस घाट का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था. महाराज दरभंगा के द्वारा यहां बेहतरीन महल और घाट पक्का किया गया था. आज भी यह महल अपनी वास्तुकला के लिए जाना जाता और अब यहां होटल का संचालन हो रहा है. उस वक्त की पहली हाथ से संचालित लिफ्ट भी यहां लगाई गई थी.
- बूंदीपर कोटा घाट: इस घाट का निर्माण 17वीं शताब्दी के शुरुआत में किया गया था. यहां राजस्थान स्थित बूंदी के राजा का भव्य महल आज भी स्थापित है. जिसके अंदर से काशी विश्वनाथ मंदिर विंध्याचल मंदिर सहित अलग-अलग देवी देवताओं के मंदिर स्थापित हैं और यह महल बहुत बड़े क्षेत्र में आज भी बसा हुआ है. इस घाट को इसी के नाम से जाना जाता है.
- भोंसले घाट: काशी में महाराष्ट्र के लोगों का हमेशा से ही आना जाना रहा. यही वजह है नागपुर के तत्कालीन महाराजा ने 1780 में काशी के इस घाट का पक्का निर्माण करवाया. 1795 में यहां लक्ष्मी नारायण मंदिर और महल की स्थापना हुई. इस घाट से लेकर आसपास के लगभग दो दर्जन से ज्यादा मोहल्ले में आज भी मराठी परिवार रहते हैं. जिनको इस घाट के नाम के साथ ही आसपास के कई और मराठी राजघराने द्वारा निर्मित घाटों के नाम से जाना जाता है.
- दिग्पलिया घाट: दिग्पलिया स्टेट के तत्कालीन महाराजा ने 1731 के आसपास इस घाट का निर्माण करवाया था. यह घाट बंगाल स्टेट के महत्वपूर्ण घाट के रूप में स्थापित है और यहां मौजूद महल और अन्य का स्ट्रक्चर बंगाली आर्किटेक्ट के हिसाब से ही बनाया गया है. इसी घाट के ऊपर गलियों में रानी भवानी मंदिर सहित कई अन्य बंगाल की पूजा पद्धति के अनुसार मंदिर स्थापित है इस घाट के आसपास बड़ी संख्या में बंगाल की आबादी भी रहती है.
- संकटा घाट: महाराजा ग्वालियर ने बनारस में कई घाटों का निर्माण करवाया था 17वीं शताब्दी के मध्य में सिंधिया घाट, गंगा महल घाट, संकटा घाट जो आसपास ही मौजूद है इन सभी का पक्का निर्माण और यहां महलों का निर्माण भी तत्कालीन ग्वालियर नरेश ने करवाया था जो आज भी मौजूद हैं.
- ललिता घाट: 18 वीं शताब्दी में नेपाल के तत्कालीन नरेश राणा बहादुर शाह काशी आए थे. उस वक्त उन्होंने ललित सुंदरी के नाम पर ललिता घाट का निर्माण करवा कर यहां पर नेपाल के ही पशुपतिनाथ मंदिर के तर्ज पर भगवान शिव के मंदिर की स्थापना की. बाद में इसका रिनोवेशन उनके बेटे ने करवाया. उस वक्त राणा बहादुर शाह ने काशी में ही रहते हुए यहां सन्यास भी लिया था तभी से यह स्थान नेपाल नरेश के प्रयासों से नए रूप में सामने आया.
जानिए कौन किसका घाट?
- अस्सी घाट: महाराजा बनारस
- राजा घाट: माधोराव पेशवा
- खोरी घाट: कवीन्द्र नारायण सिंह
- संकटा घाट: महाराजा ग्वालियर
- गंगामहल घाट: महाराजा ग्वालियर
- बूंदीपर कोटा घाट: महाराज बूंदी (राजस्थान)
- भोंसला घाट: महाराजा नागपुर
- लाला मिश्र घाट: महाराजा रीवां
- पांडे घाट: बबुआ पांडे
- तुलसी घाट: महंत स्वामीनाथ
- दिग्पलिया घाट: दिग्पलिया स्टेट (बंगाल)
- गणेश घाट: माधोराव पेशवा
- चौसट्ठी घाट: उदयपुर के राजा
- अग्निश्वर घाट: माधोराव पेशवा
- माता आनंदमयी घाट: लाला बच्छराज
- राणा घाट: उदयपुर के राजा
- मेहता घाट: माधोराव पेशवा
- बच्चाराज घाट: बाबू शेखर चंद
- मुंशी घाट: श्रीधर मुंशी
- रामघाट: माधोराव पेशवा
- दरभंगा घाट: महाराजा, दरभंगा
- मंगलागौरी घाट: माधोराव पेशवा
- अहिल्याबाई घाट: महाराजा, इंदौर
- शिवाला घाट: पं. बैजनाथ मिश्र
- चेतसिंह घाट: पंचकोट के राजा
- निरंजनी घाट: पंचकोट के राजा
- प्रयाग घाट: रानी हेमन्द कुमारी देवी
- शीतला घाट: महाराजा, बूंदी
- मान मंदिर घाट: महाराजा, जयपुर
- हनुमान घाट: महंत हरिहर जी
- मैसूर घाट: मैसूर राज परिवार
- त्रिपुरा भैरवी घाट: महाराजा, बनारस
- लल्ली घाट: महाराजा बनारस
- विजयनगरम घाट: महाराजा विपायनगरम
- केदार घाट: कुमार स्वामी
- नेपाली घाट: नानही बाबू
- ललिता घाट: नेपाल नरेश
- सोमेश्वर घाट: कुमार स्वामी
- नारद घाट: दत्तात्रेय स्वामी
- खिरकिया घाट: महाराजा, इंदौर
- मणिकार्णिका घाट: महाराजा, इंदौर
- बाजीराव घाट: महाराजा, इंदौर
- संकटा घाट: महाराज बड़ौदा
- सिंधिया घाट: महाराजा ग्वालियर

