वेलेंटाइन डे: रानी की मौत के बाद राजा ने छोड़ दिया था महल, हिमाचल में आज भी अमर है दोनों की प्रेम कहानी
रानी के बिछड़ने के बाद सिरमौर के 44वें महाराजा ने शाही महल त्याग दिया था.वेलेंटाइन डे पर पढ़िए एक सच्ची प्रेम गाथा

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 14, 2026 at 11:41 AM IST
सिरमौर: आज दुनियाभर में वेलेंटाइन डे मनाया जा रहा है. ये दिन दो लोगों के आपसी प्यार का प्रतीक माना जाता है. लोग अपने प्रेम का इजहार कर इस दिन को यादगार बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कहते हैं कि प्यार का इजहार करने के लिए प्रेमियों को किसी दिन की जरूरत नहीं होती है. हिमाचल के पहाड़ों पर आज भी एक खामोश कहानी गूंजती हैं. आज से कई साल पहले जब वेलेंटाइन डे का नाम किसी सुना भी नहीं था तब एक राजा और रानी के बीच इतना अटूट प्यार था जो आज भी मिसाल है.
वेलेंटाइन डे पर जब दुनिया गुलाबों और तोहफों के सहारे प्यार जताती है, तब हिमाचल की शांत वादियों में एक ऐसी कहानी सांस लेती है, जहां प्रेम का इजहार शब्दों से नहीं, त्याग से हुआ था. ये कहानी है महाराजा शमशेर प्रकाश की और उनकी उस रानी की, जिनकी याद में उन्होंने अपना शाही महल तक छोड़ दिया. बताते है कि शमशेर प्रकाश बेहद कम उम्र (12-13) साल में गद्दी पर बैठे. महाराजा शमशेर प्रकाश सिरमौर रियासत के 44वें राजा थे, जिन्होंने 1857 से 1898 तक राज किया था.

सिरमौर रियासत के इतिहास के पन्नों में दर्ज इस प्रेम कहानी का ज़िक्र करते हुए शाही परिवार के सदस्य कंवर अजय बहादुर बताते हैं कि उस वक्त बाल अवस्था में ही महाराजा की शादी क्युंथल (जुन्गा) की दो राजकुमारियों के साथ हुई, लेकिन किस्मत को कुछ और मंज़ूर था. विवाह के 2 वर्ष बाद ही छोटी रानी बीमारी के कारण चल बसीं. समय के साथ बड़ी रानी से राजा शमशेर प्रकाश का रिश्ता गहराता गया. यह रिश्ता औपचारिकता से आगे बढ़कर सच्चे प्रेम में बदल गया.
जब मौत ने छीन लिया जीवन का सुकून
बताते है कि कुछ साल बाद मौत राजा रानी के इस प्यार के बीच विलेन बनकर आ गई. साल 1879 में बड़ी रानी का भी निधन हो गया. यह घटना महाराजा के जीवन का सबसे बड़ा आघात थी. फिर राजा ने वो फैसला लिया, जिसने इस प्रेम कहानी को जगजाहिर कर दिया. कहा जाता है कि रानी के बिछड़ने के बाद महाराजा शमशेर प्रकाश उस राजमहल में एक पल भी नहीं रह पाए, जहां उन्होंने उनके साथ जीवन के सबसे खूबसूरत पल बिताए थे.

महल से दूर, यादों के करीब
कंवर अजय बहादुर सिंह बताते हैं कि इस आघात से महाराज शमशेर प्रकाश इतने आहत हुए कि उन्होंने नाहन का भव्य राजमहल, जिसे 'महलात' कहा जाता है, आज भी शहर की पहचान है, उसे रानी की मृत्यु के बाद महाराजा ने त्याग दिया. सन् 1889 में उन्होंने मुख्य राजमहल से अलग एक नया निवास बनवाया. यूरोपियन शैली में निर्मित यह भवन 'शमशेर विला' कहलाया. अपने नाम के साथ 'विला' शब्द जोड़ना उस समय एक अनोखा कदम था. यह केवल एक आवास नहीं था, बल्कि एक टूटे हुए दिल की शरणस्थली थी. मानो राजा ने अपने अतीत से दूरी बना ली हो, लेकिन प्रेम की स्मृतियों को अपने साथ रख लिया हो.
फिर हुआ विवाह, लेकिन बदला नहीं ठिकाना
अजय बहादुर सिंह के मुताबिक परिजनों और सलाहकारों के आग्रह पर बाद में महाराज का विवाह कुनिहार की राजकुमारी से करवाया गया. फिर भी उन्होंने दोबारा मुख्य राजमहल में कदम नहीं रखा. जीवन की अंतिम सांस तक वो शमशेर विला में ही रहे. यह त्याग केवल एक फैसले भर का नहीं था बल्कि यह उस प्रेम की गहराई का प्रमाण था, जिसने सत्ता और वैभव को भी पीछे छोड़ दिया.

जब राख में बदल गई प्रेम की निशानी
महाराजा के निधन के बाद शमशेर विला को यूरोपियन गेस्ट हाउस के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा. ब्रिटिश मेहमान वहीं ठहराए जाते थे, लेकिन 1947-48 में लगी भीषण आग ने इस ऐतिहासिक इमारत को पूरी तरह नष्ट कर दिया. आज जहां कभी शमशेर विला खड़ा था, वहां जंगल और सैरगाह है. स्थानीय लोग सुबह-शाम वहां सैर करने पहुंचते हैं.

तारीख-ए-रियासत सिरमौर किताब में भी जिक्र
सिरमौर रियासत के मुख्य महल के प्रमुख गेट पर लगे दो शेर भी शमशेर विला आवास पर ही लगे हुए थे. सिरमौरी रियासत पर कंवर रजौर सिंह की लिखी किताब तारीख-ए-रियासत सिरमौर में राजा शमशेर प्रकाश की ये कहानी अब भी जीवंत है. बाद में इन दोनों शेरों को मुख्य महल के द्वार पर स्थानांतरित कर दिया गया. इतिहास के पन्नों में दर्ज अमर मोहब्बत
लैला-मजनूं और हीर-रांझा की कहानियां हर जुबान पर हैं, लेकिन सिरमौर के इस राजा की कहानी कम ही लोगों तक पहुंच पाई, क्योंकि कुछ मोहब्बतें शोर नहीं करतीं, इतिहास बन जाती हैं.

