पढ़ने वाले 11.. पढ़ाने वाले 4, सवालों के घेरे में बिहार के इस सरकारी स्कूल का हाल
सरकारी शिक्षा व्यवस्था भी गजब है. जिन बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए पूरा इंतजाम है, वो ही स्कूल से दूरी बना रहे हैं. आखिर क्यों?

Published : February 25, 2026 at 5:40 PM IST
- रिपोर्ट: अमरेश कुमार
वैशाली: देश में शिक्षा प्राप्त करना हर बच्चे का मौलिक अधिकार है. सरकार बच्चों को पढ़ाने के लिए भारी-भरकम बजट लाती है, फिर भी देश के नौनिहालों का भविष्य सुधरने की जगह पटरी से उतरता जा रहा है. वजह सरकारी स्कूलों में शिक्षा को छोड़कर बाकी अन्य कामों पर फोकस का होना माना जा सकता है. आज सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे, प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों से कमजोर क्यों होते जा रहे हैं? सवाल ये है कि क्या इन बच्चों को उनकी मजबूरी की सजा मिल रही है? आखिर शिक्षा गरीब बच्चों की पहुंच से दूर क्यों होती जा रही है?
26 साल पुराने नवसृजित सरकारी स्कूल का हाल : अब वैशाली जिले के गोरौल प्रखंड स्थित रुसुलपुर कोरीगांव गांव को ही देख लें. यहां नवसृजित प्राथमिक विद्यालय इन दिनों चर्चा में है. 26 साल पुराने इस दो मंजिला सरकारी स्कूल में पहली से पांचवीं कक्षा तक महज 11 बच्चे नामांकित हैं, जबकि पढ़ाने के लिए चार शिक्षक तैनात हैं. यह तस्वीर सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन और निजी स्कूलों की बढ़ती मांग पर बड़ा सवाल खड़ा करती है.
दान की जमीन पर बना दो मंजिला विद्यालय : वर्ष 2000 में गांव के ही झगरू राय ने विद्यालय संचालन के लिए 9 डिसमिल जमीन दान में दी थी. इसके बाद करोड़ों रुपये की लागत से दो मंजिला भवन का निर्माण हुआ. स्थापना के 26 साल बाद भी यहां पहली से पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई होती है, लेकिन छात्रों की संख्या सिमटकर 11 पर आ गई है.
''मैं जुलाई 2025 में यहां आया. हमलोग बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए अपने स्तर से सप्ताह में दो से दिन पोषक क्षेत्र में घर-घर घूमकर विद्यालय में बच्चों को लाने का प्रयास कर करते हैं. हम दूसरे इलाके में जाकर बच्चों को ला रहे हैं. अब बच्चों की संख्या 30 के पार हो गई है लेकिन नामांकन 11 बच्चों का ही है.''- धर्मेन्द्र कुमार, प्रधान शिक्षक, नवसृजित प्राथमिक विद्यालय

11 बच्चों पर 4 शिक्षक तैनात : विद्यालय में प्रधान शिक्षक धर्मेंद्र कुमार के अलावा एक शिक्षिका और दो अन्य शिक्षक पदस्थापित हैं. मध्याह्न भोजन के लिए एक रसोइया भी नियुक्त है. कक्षा एक में 3, दूसरी में 2, तीसरी में 3, चौथी में 1 और पांचवीं में 2 बच्चे नामांकित हैं. प्रधान शिक्षक के अनुसार रोजाना 9 से 10 बच्चे नियमित रूप से स्कूल आते हैं और निर्धारित रूटीन के अनुसार पढ़ाई होती है.
नामांकन घटने की वजह क्या? : विद्यालय के पोषक क्षेत्र में महज 15 से 20 घर हैं. कई परिवार रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में रह रहे हैं, जिससे बच्चों का नामांकन प्रभावित हुआ है. प्रधान शिक्षक का कहना है कि सप्ताह में दो से तीन दिन घर-घर जाकर अभिभावकों से संपर्क कर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. हाल के प्रयासों से नामांकन में थोड़ी वृद्धि भी हुई है.

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा : प्रधान शिक्षक धर्मेंद्र कुमार बताते हैं कि स्कूल में प्रार्थना, व्यायाम, सुविचार, समाचार वाचन और राष्ट्रगान के माध्यम से बच्चों में अनुशासन और आत्मविश्वास विकसित किया जाता है. महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग, सामान्य ज्ञान और संविधान की प्रस्तावना जैसी जानकारियां भी साझा की जाती हैं. मिड डे मील के तहत बच्चों को भोजन के साथ फल और अंडा भी दिया जाता है.
''प्रधान शिक्षक धर्मेंद्र कुमार योग्य शिक्षक हैं. पहले बीआरपी रह चुके हैं. शिक्षकों को ऐसे बच्चों की पहचान करने का निर्देश दिया गया है, जिनका नामांकन नहीं हुआ है. यह प्रक्रिया चल रही है और बच्चों की संख्या बढ़ी हैं.''- सुशील कुमार, प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी

चोरी की घटना से बढ़ी चिंता : हाल ही में विद्यालय में चोरी की घटना भी सामने आई. ग्रिल का ताला काटकर पंखा, घंटी और बल्ब सहित अन्य सामान चोरी कर लिए गए. गोरौल थाना में प्राथमिकी दर्ज कर पुलिस जांच कर रही है. घटना के बाद शिक्षक और ग्रामीण चिंतित हैं.
स्थानीय प्रशासन का पक्ष : प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी सुशील कुमार ने प्रधान शिक्षक को योग्य बताते हुए कहा कि ऐसे बच्चों की पहचान करने का निर्देश दिया गया है, जिनका नामांकन नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि नामांकन बढ़ाने की प्रक्रिया जारी है और शिक्षकों को पोषक क्षेत्र में सक्रियता बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं.

सरकारी बनाम निजी स्कूल : राज्यसभा में केंद्र सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार पिछले पांच वर्षों में 18,727 सरकारी स्कूल बंद हुए, जबकि सिर्फ एक वर्ष में 8,475 निजी स्कूल खोले गए. यह आंकड़े शिक्षा व्यवस्था की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. कम नामांकन वाले स्कूलों के विलय की नीति, शहरीकरण, निजी शिक्षा की बढ़ती मांग और सरकारी स्कूलों में घटता भरोसा इसकी प्रमुख वजह मानी जा रही है.
ग्रामीण शिक्षा पर असर? : सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि सरकारी स्कूलों में नामांकन लगातार घटता रहा तो ग्रामीण और गरीब परिवारों की शिक्षा तक पहुंच प्रभावित हो सकती है. क्या शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे निजी हाथों में सिमटती जा रही है? वैशाली का यह विद्यालय इसी बहस के केंद्र में खड़ा नजर आता है.

जो बच्चों के काम का नहीं वो किसके काम का? : इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिक्षक मेहनत नहीं कर रहे हैं लेकिन सवाल इस बात का है कि किस दिशा में कर रहे हैं. ज्यादातर मामलों में सरकार शिक्षकों को दूसरे सरकारी कामों में उलझाकर रखती है. जिन बच्चों को लिए लाखों करोड़ का पूरा शिक्षा तंत्र खड़ा है वहीं उसका लाभ नहीं ले पा रहा है और जिसको शिक्षा हासिल भी हो रही है तो वो मोटी कीमत चुकाकर हासिल कर रहा है.
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