ETV Bharat / state

सीजीएसटी के सुपरिटेंडेंट अग्रवाल की जमानत याचिका फिर से खारिज, रिश्वत के आरोप में हुए थे अरेस्ट

भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे सीजीएसटी विभाग के सुपरिटेंडेंट योगेश चंद को होईकोर्ट से फिर झटका लगा है.

Etv Bharat
उत्तराखंड हाईकोर्ट (ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : December 18, 2025 at 7:11 PM IST

3 Min Read
Choose ETV Bharat

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के आरोपी सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (सीजीएसटी) विभाग के सुपरिटेंडेंट योगेश चंद अग्रवाल की दूसरी जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है. न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी की गिरफ्तारी में संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं हुआ है. अदालत ने माना कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित में आधार स्पष्ट कर दिए गए थे, जो कानूनन पर्याप्त है.

यह पूरा मामला रुद्रपुर स्थित सीजीएसटी कार्यालय का है, जहां आरोपी योगेश चंद अग्रवाल सुपरिंटेंडेंट के पद पर तैनात थे. आरोप है कि उन्होंने एक व्यवसायी की पत्नी का निलंबित जीएसटी नंबर (जीएस टिन) सक्रिय करने के बदले 15,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी. सीबीआई ने इस शिकायत पर जाल बिछाया और आवेदक को रंगे हाथों गिरफ्तार किया था, जिसके बाद से वह न्यायिक हिरासत में हैं.

याची अग्रवाल के अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित में 'गिरफ्तारी के आधार' नहीं दिए गए थे. उन्होंने इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया. बचाव पक्ष का कहना था कि केवल गिरफ्तारी के 'कारण' बताना पर्याप्त नहीं है, बल्कि विस्तृत आधार लिखित में देना अनिवार्य है.

सीबीआई के वकील ने इन तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी को गिरफ्तारी के समय ही स्पष्ट कर दिया गया था कि उसे क्यों पकड़ा जा रहा है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए बताया कि 'गिरफ्तारी के आधार' और 'गिरफ्तारी के कारण' में अंतर होता है और इस मामले में गिरफ्तारी मेमो में स्पष्ट रूप से अपराध का विवरण दिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का विश्लेषण: अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 'पंकज बंसल', 'विहान कुमार' और 'मिहिर राजेश शाह' जैसे महत्वपूर्ण वादों का उल्लेख किया. पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अब 'मिहिर राजेश शाह' मामले के बाद गिरफ्तारी के आधार लिखित में देना अनिवार्य कर दिया गया है, लेकिन आवेदक की गिरफ्तारी के समय लागू नियमों के अनुसार, गिरफ्तारी मेमो में दी गई जानकारी को पर्याप्त माना जा सकता है.

न्यायालय ने विस्तार से समझाया कि गिरफ्तारी के आधार वे बुनियादी तथ्य होते हैं, जिनसे अपराध का गठन होता है, जो ट्रायल के दौरान तय किए जाने वाले 'आरोपों' के समान होने चाहिए. अदालत ने कहा कि यदि गिरफ्तारी मेमो या किसी अन्य दस्तावेज में ये तथ्य लिखकर आरोपी को दे दिए जाते हैं, तो इसे लिखित सूचना ही माना जाएगा.

अदालत का अंतिम निष्कर्ष: इस मामले के तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो के पैरा 12 में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि आवेदक को 'मुकेश कुमार से 10,000 रुपये की रिश्वत मांगने और स्वीकार करने' के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है. अदालत ने इसे अनुच्छेद 22(1) का उचित अनुपालन माना और कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में सूचित किए गए थे.

पढ़ें---