हाईकोर्ट ने ONGC डॉक्टरों की याचिका पर की सुनवाई, दिए ये आदेश
हाईकोर्ट ने ओएनजीसी में कार्यरत डॉक्टरों द्वारा एनपीए को वेतन का हिस्सा मानकर अन्य सेवा लाभों की गणना वाली याचिका पर सुनाई की.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : July 7, 2026 at 7:52 AM IST
नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तेल और प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) में कार्यरत डॉक्टरों (मेडिकल अफसरों) द्वारा गैर-प्रैक्टिसिंग भत्ते (एनपीए) को वेतन का हिस्सा मानकर अन्य सेवा लाभों की गणना करने की मांग वाली दायर याचिकाओं को निस्तारित कर दिया है. न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने डॉ. श्याम सुंदर, डॉ. रजत अग्रवाल और डॉ. नितिन चावला द्वारा दायर याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया.
याचिकाकर्ता डॉक्टर ओएनजीसी के उस प्रशासनिक आदेश से असंतुष्ट थे, जिसके तहत एनपीए को महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता, ग्रेच्युटी और भविष्य निधि जैसे प्रमुख लाभों की गणना के लिए 'मूल वेतन' के रूप में शामिल करने से रोक दिया गया था. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने दलील दी कि भारी उद्योग एवं लोक उद्यम मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी किए गए कार्यालय ज्ञापनों (ऑफिस मेमोरेंडम) के तहत पुराने दिशा-निर्देशों को संशोधित किया जा चुका है.
इसलिए डॉक्टर इस लाभ के हकदार हैं. इसके विपरीत, ओएनजीसी के कानूनी प्रतिनिधि ने इन दावों का विरोध करते हुए तर्क दिया कि संबंधित नीति केवल उन केंद्रीय सार्वजनिक उद्यमों पर लागू होती है जो सीडीए वेतनमान पैटर्न का पालन करते हैं, जबकि ओएनजीसी इस दायरे में नहीं आता है. हालांकि, जब याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत से इस मामले में सक्षम प्राधिकारी के समक्ष नए सिरे से अपना पक्ष (प्रतिवेदन) रखने की अनुमति मांगी, तो ओएनजीसी के वकील ने इस पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई.
उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की आपसी सहमति और दलीलों को ध्यान में रखते हुए याचिकाओं को इस निर्देश के साथ निस्तारित कर दिया कि डॉक्टरों को अपनी शिकायत प्रशासनिक स्तर पर उठाने का मौका दिया जाए. अदालत ने याचिकाकर्ताओं को आदेश की तिथि से तीन सप्ताह के भीतर भारत सरकार के भारी उद्योग एवं लोक उद्यम मंत्रालय के सचिव के समक्ष एक विस्तृत और नया प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी है. खंडपीठ ने संबंधित सचिव को आदेश दिया है कि उक्त प्रतिवेदन प्राप्त होने के बाद कानून के प्रावधानों के अनुरूप मामले की गहन समीक्षा की जाए और अगले छह महीनों के भीतर एक उचित और अंतिम आदेश पारित किया जाए.

