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देहरादून मस्जिद सील होने का मामला, हाईकोर्ट ने MDDA की कार्रवाई को बताया सही, याचिका की खारिज

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना अनुमति निर्माण करने वाले व्यक्ति या संस्था को अनुच्छेद 226 के तहत राहत नहीं दी जा सकती.

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उत्तराखंड हाईकोर्ट (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : February 24, 2026 at 8:33 PM IST

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Updated : February 25, 2026 at 8:10 AM IST

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नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण द्वारा देहरादून की एक मस्जिद सील करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना अनुमति निर्माण करने वाले व्यक्ति या संस्था को अनुच्छेद 226 के तहत राहत नहीं दी जा सकती. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ में हुई.

याचिकाकर्ता जामा मस्जिद सोसायटी थानो देहरादून ने एमडीडीए द्वारा 13 फरवरी 2026 को जारी उस नोटिस को निरस्त करने की मांग की थी, जिसमें वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक देहरादून को मस्जिद को सील करने हेतु पुलिस सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए थे.

याचिका में यह भी प्रार्थना की गई थी कि जब तक सोसायटी को नियमानुसार कंपाउंडिंग मानचित्र प्रस्तुत करने का अवसर न दिया जाए, तब तक किसी प्रकार की दंडात्मक या जबरन कार्रवाई न की जाए. मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य स्वीकार किया गया कि याचिकाकर्ता ने विवादित निर्माण के लिए मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण से कभी कोई अनुमति प्राप्त नहीं की. साथ ही यह भी माना गया कि निर्माण के लिए कंपाउंडिंग मानचित्र के लिए भी कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया था.

न्यायालय ने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं कानून का उल्लंघन कर रहा हो, वह न्यायालय में राहत की अपेक्षा नहीं कर सकता. बिना अनुमति निर्माण कर बाद में न्यायालय से संरक्षण मांगना विधि के सिद्धांतों के विपरीत है.

अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता सोसायटी स्वयं डिफॉल्टर है और न्यायालय किसी भी अवैध निर्माण को संरक्षण देने का माध्यम नहीं बन सकता. इस आधार पर याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया गया.

हालांकि न्यायालय ने यह छूट दी कि यदि याचिकाकर्ता चार सप्ताह के भीतर अवैध निर्माण के कंपाउंडिंग हेतु संबंधित प्राधिकरण के समक्ष आवश्यक अभिलेखों सहित आवेदन प्रस्तुत करता है, तो मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण चार सप्ताह के भीतर उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 (जो उत्तराखंड में लागू है) के प्रावधानों के अनुसार उस पर विचार करेगा. इसके साथ ही लंबित प्रार्थना-पत्र भी निस्तारित कर दिए गए.

वहीं उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक और याचिका पर सुनवाई की. उत्तराखंड हाईकोर्ट में नैनीताल जिले की बदहाल सड़कों और पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई. मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट की खंडपीठ ने नगर पालिका और जिला प्रशासन को इस सम्बंध में मीटिंग कर रोड सेफ्टी और कूड़े के निस्तारण करने को कहा है. साथ में कोर्ट ने निर्णय लेने के बाद उसकी प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत कराने से अवगत कराने के निर्देश जिला प्रशाशन व नगर पालिका को दिये हैं. आज मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश मनोज कुमार गुप्ता व न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खण्डपीठ में हुई.

मामले के अनुसार अनिल यादव द्वारा उच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका में जिले के पर्वतीय मार्गों पर सुरक्षा मानकों का उल्लंघन कर अवैध डंपिंग होने और कचरा प्रबंधन की विफलताओं को उजागर किया है, जिसे न्यायालय ने गंभीरता से लिया है.

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता डी.सी.एस. रावत और जय कृष्ण पांडे ने कोर्ट को बताया कि हल्द्वानी-नैनीताल, कालाढूंगी और भवाली-कैंची धाम जैसे व्यस्ततम मार्गों पर निर्माण कार्यों का मलबा जानबूझकर तीखे मोड़ों और 'ब्लाइंड टर्न्स' पर फेंका जा रहा है. यह मलबा न केवल यातायात को बाधित कर रहा है, बल्कि मानसून के दौरान फिसलन पैदा कर वाहनों के लिये खतरा बन रहा है. सड़कों पर सुरक्षा दीवारें और क्रैश बैरियर गायब हैं, जिससे स्थानीय निवासियों, स्कूली बच्चों और पर्यटकों की जान हर समय जोखिम में रहती है.

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Last Updated : February 25, 2026 at 8:10 AM IST