कट ऑफ डेट ने खड़ी की अनिश्चितता की दीवार, साल 2018 के बाद के उपनल कर्मियों का अधर में भविष्य
सरकार 2018 तक के उपनल कर्मियों को दो चरणों में समान काम के बदले समान वेतन देने का निर्णय लिया है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : February 21, 2026 at 8:22 AM IST
देहरादून: उत्तराखंड में उपनल कर्मियों को समान काम के बदले समान वेतन देने को लेकर करीब आठ साल से चल रही कानूनी और प्रशासनिक जद्दोजहद के बाद आखिरकार सरकार ने निर्णय ले लिया है. लेकिन इस फैसले के साथ ही एक नई बहस भी खड़ी हो गई है. 12 नवंबर 2018 को कट ऑफ डेट मानते हुए जारी आदेश के बाद जहां उस तारीख तक नियुक्त उपनल कर्मियों को दो चरणों में लाभ देने की बात कही गई है, वहीं 2018 के बाद नियुक्त हुए कर्मियों का भविष्य अब भी अनिश्चित बना हुआ है.
मामला उस ऐतिहासिक निर्णय से जुड़ा है जो साल 2018 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दिया था. अदालत ने समान काम करने वाले उपनल कर्मियों को समान वेतन देने के साथ-साथ नियमितीकरण पर भी विचार करने के निर्देश दिए थे. इसके बाद यह मामला कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. शासन और सरकार स्तर पर भी इस पर कई दौर की कवायद हुई, लेकिन अंतिम निर्णय आने में लंबा समय लग गया.
3 फरवरी 2026 को शासन ने समान काम के बदले समान वेतन देने से जुड़ा आदेश जारी किया. इस आदेश में 12 नवंबर 2018 को कट ऑफ डेट (निर्धारित समय-सीमा या अंतिम तिथि) माना गया और 25 नवंबर 2025 तक 10 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले उपनल कर्मियों को पहले चरण में लाभ देने की बात कही गई. हालांकि इस आदेश के बाद कई तरह की विसंगतियां सामने आईं. गणना 25 नवंबर 2025 से किए जाने के कारण व्यवहारिक रूप से 2015 तक नियुक्त कर्मियों को ही इसका लाभ मिल पाता दिखाई दे रहा था. इससे कट ऑफ डेट को लेकर भी भ्रम की स्थिति बन गई.
इसी संशय को दूर करने के लिए शासन ने एक नया आदेश जारी किया, जिसे पहले आदेश की भूल सुधार के रूप में देखा जा रहा है. संशोधित आदेश में स्पष्ट किया गया कि हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप 12 नवंबर 2018 ही अंतिम कट ऑफ डेट रहेगी. साथ ही लाभ वितरण को दो चरणों में बांट दिया गया. पहले चरण में 1 जनवरी 2016 से पहले नियुक्त उपनल कर्मियों को मौजूदा लाभ देने का निर्णय लिया गया है. दूसरे चरण में 1 जनवरी 2016 से लेकर 12 नवंबर 2018 तक नियुक्त हुए उपनल कर्मियों को शामिल किया जाएगा.
सरकार का कहना है कि इस चरणबद्ध व्यवस्था से वित्तीय भार को संतुलित रखते हुए न्यायालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित किया जाएगा. लेकिन कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग में इस फैसले को लेकर असंतोष है, उनका तर्क है कि अदालत ने केवल समान वेतन ही नहीं, बल्कि नियमितीकरण पर भी स्पष्ट निर्देश दिए थे. ऐसे में केवल वेतन संबंधी पहलू पर निर्णय लेकर बाकी मुद्दों को लंबित रखना अधूरा कदम माना जा रहा है.
सबसे बड़ा सवाल उन उपनल कर्मियों को लेकर उठ रहा है जिनकी नियुक्ति 12 नवंबर 2018 के बाद हुई है. राज्य के विभिन्न विभागोंऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासन में हजारों कर्मचारी उपनल के माध्यम से कार्यरत हैं. ये कर्मचारी भी समान जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन नए आदेश में उन्हें किसी भी चरण में शामिल नहीं किया गया है. इससे उनके भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है.
सरकार को 2018 के बाद नियुक्त कर्मियों की स्थिति भी स्पष्ट करनी चाहिए. उनके अनुसार यदि समान काम का सिद्धांत लागू किया गया है तो फिर इसे तारीख के आधार पर सीमित करना न्यायसंगत नहीं है. नियमितीकरण का मुद्दा अभी भी अधूरा है और इस पर ठोस नीति बननी चाहिए.
विनोद कवि, अध्यक्ष, विद्युत संविदा कर्मचारी संगठन
कर्मचारियों का यह भी तर्क है कि वर्षों तक न्यायालय में चली लड़ाई और शासन स्तर की प्रक्रियाओं में देरी के लिए कर्मचारी जिम्मेदार नहीं थे. ऐसे में कट ऑफ डेट तय कर लाभ को सीमित करना उनके साथ असमान व्यवहार जैसा प्रतीत होता है. कई कर्मचारी संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि 2018 के बाद नियुक्त कर्मियों को लेकर स्पष्ट नीति नहीं बनाई गई तो वे आगे कानूनी विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं.
फिलहाल सरकार ने दो चरणों में लाभ देने का रास्ता साफ कर दिया है, लेकिन यह फैसला पूरी तरह से विवादमुक्त नहीं हो पाया है. जहां एक ओर 2018 तक नियुक्त कर्मियों को लंबे इंतजार के बाद राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर उसी व्यवस्था में कार्यरत बाद के कर्मियों का भविष्य अधर में लटका हुआ है.
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