वन विभाग 9 महीने में कैंपा फंड का 40% भी नहीं कर पाया खर्च, ₹160 करोड़ लैप्स होने का खतरा!
कैंपा फंड के उपयोग में फिसड्डी रहा उत्तराखंड का वन विभाग, सिस्टम की सुस्ती का ये रहा रिपोर्ट कार्ड

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : January 10, 2026 at 12:12 PM IST
नवीन उनियाल
देहरादून: CAG रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर चर्चाओं में रहने वाला कैंपा फंड, इस बार सरकारी सिस्टम की सुस्ती का गवाह बना है. वन विभाग वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक केवल 36.79 प्रतिशत बजट ही खर्च कर पाया है. अब इस बजट का उपयोग करने के लिए विभाग के पास महज 3 महीने का ही वक्त बाकी है. यानी जिस बजट को महकमा 9 महीने में 40% भी खर्च नहीं कर पाया, उसे अब 3 महीने में 60% खर्च करना है. ये मौजूदा स्थिति में तो मुमकिन नहीं लग रहा. पेश है ईटीवी भारत की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट.
उत्तराखंड को मिलता है तगड़ा कैंपा फंड: उत्तराखंड का करीब 70 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र से आच्छादित है. ऐसे में राज्य में वन विभाग की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है. वृक्षारोपण, वन्यजीव संरक्षण, मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करना, जंगलों में आधारभूत ढांचे का विकास और ईको-टूरिज्म जैसी गतिविधियों के लिए हर साल राज्य को केंद्र सरकार से मोटा बजट मिलता है. लेकिन इस बजट का कितना प्रभावी उपयोग हो पा रहा है, इसकी असल तस्वीर अब कैंपा फंड (CAMPA) के ताजा आंकड़ों से सामने आई है.
कैंपा फंड के उपयोग में फिसड्डी रहा वन विभाग: CAMPA यानी Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority, जिसके तहत वन भूमि के संरक्षण और विकास से जुड़े कार्यों के लिए राज्यों को विशेष फंड जारी किया जाता है. मकसद साफ है कि जंगलों में जरूरी काम पैसों की कमी के कारण न रुकें. लेकिन उत्तराखंड में इस अहम फंड के उपयोग पर सरकारी सिस्टम की सुस्ती भारी पड़ती नजर आ रही है.
कैंपा फंड का 40 फीसदी भी खर्च नहीं कर सका वन विभाग: वित्तीय वर्ष 2025–26 के 9 महीने बीत जाने के बावजूद वन विभाग कैंपा फंड का 40 प्रतिशत भी खर्च नहीं कर पाया है. आंकड़ों के मुताबिक इस वित्तीय वर्ष में उत्तराखंड को कैंपा के तहत कुल 25,336.69 लाख रुपये, यानी करीब 253 करोड़ रुपये जारी किए गए. इसके मुकाबले अब तक महज 9,321.43 लाख रुपये, यानी करीब 93 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके हैं. इस तरह विभाग केवल 36.79 प्रतिशत बजट ही उपयोग कर पाया है.

3 महीने में 60 प्रतिशत बजट खत्म करना होगा मुश्किल: यह स्थिति तब है जब वित्तीय वर्ष के अब केवल तीन महीने शेष हैं और विभाग को बाकी के 60 प्रतिशत से ज्यादा बजट को इसी अवधि में खर्च करना होगा. जिस बजट को 9 महीनों में 40 प्रतिशत तक नहीं खर्च किया जा सका, उसे तीन महीनों में पूरा खर्च कर पाना मौजूदा हालात में मुश्किल नजर आ रहा है.
सख्ती करने के बजाय वन मंत्री ने किया अफसरों का बचाव: कैंपा फंड के इस कमजोर प्रदर्शन का खुलासा तब हुआ जब विभागीय मंत्री सुबोध उनियाल ने बजट खर्च की समीक्षा की. समीक्षा के बाद अधिकारियों को बजट खर्च में तेजी लाने के निर्देश जरूर दिए गए, लेकिन अपने ही विभाग की सुस्त कार्यप्रणाली को लेकर मंत्री ने अधिकारियों का बचाव भी किया. ईटीवी भारत से बातचीत में वन मंत्री सुबोध उनियाल ने दावा किया कि आने वाले समय में बजट खर्च की रफ्तार बढ़ेगी.

कैंपा फंड खर्च करने के क्षेत्रवार आंकड़े भी निराशाजनक: क्षेत्रवार आंकड़े भी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं. गढ़वाल क्षेत्र में कैंपा के तहत कुल 135 करोड़ रुपये जारी किए गए, लेकिन इनमें से केवल 53 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके. इस तरह गढ़वाल का प्रदर्शन 39.13 प्रतिशत तक सीमित रहा. वहीं कुमाऊं क्षेत्र में 74 करोड़ रुपये जारी हुए, जिनमें से सिर्फ 25 करोड़ रुपये खर्च किए गए. यहां बजट उपयोग का प्रतिशत 34.24 रहा.
वन्यजीव क्षेत्रों के लिए 31 करोड़ रुपये जारी किए गए थे, लेकिन खर्च हो सके केवल 12 करोड़ रुपये. यानी करीब 41 प्रतिशत. रिसर्च मद में स्थिति और भी खराब रही. यहां 3 करोड़ रुपये के बजट में से केवल 70 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके, जो महज 22 प्रतिशत है. अन्य प्रशासनिक इकाइयों को मिले करीब 9 करोड़ रुपये में से सिर्फ 1 करोड़ 24 लाख रुपये खर्च हुए, यानी बजट उपयोग का प्रतिशत 14 ही रहा.

कैंपा फंड खर्च करने में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व रहा फिसड्डी: वन्यजीव जोन में सबसे खराब प्रदर्शन कॉर्बेट टाइगर रिजर्व का रहा. यहां कुल 7 करोड़ 13 लाख रुपये जारी किए गए थे, लेकिन खर्च हो सके सिर्फ 1 करोड़ 30 लाख रुपये. यानी केवल 18.32 प्रतिशत बजट ही उपयोग हो पाया. इसके मुकाबले राजाजी टाइगर रिजर्व की स्थिति बेहतर रही, जहां 58.29 प्रतिशत बजट खर्च किया जा सका.
यमुना सर्कल का निराशाजनक प्रदर्शन: सर्कल स्तर पर देखें तो गढ़वाल में यमुना सर्कल सबसे फिसड्डी साबित हुआ. यहां कैंपा के तहत जारी बजट का केवल 29.77 प्रतिशत ही खर्च किया जा सका. वहीं कुमाऊं में सबसे खराब प्रदर्शन नॉर्थ कुमाऊं सर्कल का रहा. यहां बजट उपयोग 33.8 प्रतिशत तक ही सिमट कर रह गया.
प्रमुख वन संरक्षक का बयान: इस पूरे मामले पर वन विभाग के मुखिया और प्रमुख वन संरक्षक (HOFF) रंजन कुमार मिश्रा का कहना है कि-
विभाग बजट खर्च को लेकर गंभीर है. अभी तीन महीने का समय बाकी है. हम बजट को खर्च कर लेंगे.
-रंजन कुमार मिश्रा, प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ)-
बजट कैसे खर्च हो पाएगा, इस पर गोलमोल जवाब: हालांकि जब उनसे पूछा गया कि जो बजट 9 महीनों में खर्च नहीं हो सका, वह तीन महीनों में कैसे पूरा होगा, तो इसका कोई ठोस और तार्किक जवाब सामने नहीं आया.
असफलता मानने के बजाय वन विभाग के टालमटोली वाले तर्क: बजट खर्च को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्ती करने के बजाय जिस तरह विभाग सिस्टम की जटिलताओं का हवाला दे रहा है, उससे यह साफ नहीं होता कि भविष्य में समयबद्ध बजट उपयोग को लेकर अधिकारियों पर कोई दबाव बनेगा. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यदि केंद्र से मिला यह अहम कैंपा फंड, लैप्स हो जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?

इससे पहले भी वन विभाग कैंपा फंड खर्च नहीं कर पाया था: वैसे तो यह पहली बार नहीं है जब वन विभाग कैंपा फंड का बजट खर्च करने में नाकामयाब रहा हो. इससे पहले भी इस बजट का शत प्रतिशत खर्चा विभाग नहीं कर पाया था. पिछली वित्तीय वर्ष पर ही नजर दौड़ाएं, तो साल 2024-25 में केंद्र से मिले करीब 400 करोड़ के बजट में से वित्तीय वर्ष खत्म होने तक विभाग कम से कम 25 से 30 करोड़ रुपए खर्च नहीं कर पाया था. हालांकि इंटरेस्ट को मिलाकर यह रकम इससे भी ज्यादा रही है. उधर मौजूदा वित्तीय वर्ष में तो स्थिति और भी खराब दिखाई देती है और इस साल बजट का 100% खर्च करना मुमकिन नजर नहीं आ रहा.
कैंपा का पैसा लैप्स होगा तो अगली बार कम मिलेगा बजट: खास बात यह है कि केंद्र से मिले इस बजट को यदि वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक खर्च नहीं किया जाता है, तो ये पैसा लैप्स हो जाता है और राज्य को मिले बजट का पूरा लाभ नहीं मिल पाता. इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि सरकारी सिस्टम औपचारिकताओं में ही इतना समय गुजार देता है, कि जरूरी कामों के लिए समय पर बजट खर्च नहीं हो पाता.
इससे भी बड़ी बात यह है कि बजट खर्च नहीं होने की स्थिति में अगले वित्तीय वर्ष के लिए राज्य की तरफ से जो प्रस्ताव केंद्र को बजट डिमांड के रूप में भेजा जाता है, उसमें भी कटौती की आशंका रहती है. इसके पीछे वजह यह है कि जब केंद्र में प्रस्ताव दिए जाते हैं, तो पिछले बजट पर परफॉर्मेंस और बजट खर्च नहीं हो पाने जैसे बिंदुओं को भी केंद्रीय अधिकारी ध्यान में रखते हैं.
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