सैकड़ों करोड़ का बजट, लेखा-जोखा रखने वालों का हिसाब नहीं, उत्तराखंड वन महकमे का बिगड़ा गणित
उत्तराखंड वन महकमा अकाउंटेंट की कमी से जूझ रहा है, विभाग के लिए स्वीकृत 34 अकाउंटेंट के पदों पर सिर्फ 13 ही तैनात हैं

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : June 25, 2026 at 11:19 AM IST
देहरादून: उत्तराखंड वन महकमे में इन दिनों पेड़ों की गिनती से ज्यादा चर्चा हिसाब किताब की हो रही है. वजह भी खास और कुछ नई है. दरअसल करोड़ों के बजट वाले विभाग के पास अब लेखा जोखा रखने वाले ही नहीं बचे हैं. हालात ये हैं कि पहले से ही अधिकतर पद खाली हैं और नई तबादला लिस्ट ने खाली पदों की संख्या को और भी बढ़ा दिया है. जानिए जंगलों के बिगड़ते गणित का हाल.
उत्तराखंड वन महकमे का बिगड़ा गणित: उत्तराखंड का वन महकमा इन दिनों पेड़ों की गिनती से ज्यादा अपने बिगड़ते हिसाब-किताब को लेकर चर्चा में है. करोड़ों रुपये के बजट और प्रदेश के करीब 70 फीसदी भूभाग पर फैले जंगलों की जिम्मेदारी संभालने वाले इस विभाग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय प्रबंधन की बनती जा रही है. वजह यह है कि जिस विभाग को अपने बजट, खर्च और कर्मचारियों के वेतन का पूरा लेखा-जोखा रखना होता है, उसी विभाग में लेखाकारों की भारी कमी हो गई है. हालात ऐसे हैं कि पहले से खाली पड़े पदों के बीच हाल ही में जारी तबादला सूची ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है.
लेखा जोखा रखने वालों का नहीं रखा हिसाब: उत्तराखंड का वन विभाग राज्य के सबसे महत्वपूर्ण विभागों में गिना जाता है. प्रदेश के अधिकांश हिस्से में वन क्षेत्र होने के कारण वन संरक्षण, वन कानूनों के अनुपालन, वन्यजीव संरक्षण और विभिन्न परियोजनाओं के संचालन की जिम्मेदारी इसी विभाग के कंधों पर है. ऐसे में विभाग का बजट भी बड़ा है और कर्मचारियों की संख्या भी काफी अधिक है. लेकिन इसके बावजूद विभाग के वित्तीय प्रबंधन के लिए जरूरी लेखाकारों की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है.
कागजों में ही सीमित है व्यवस्था: राज्य में वन विभाग के अंतर्गत करीब 40 वन प्रभाग और इकाइयां संचालित हैं. इन सभी के लिए लेखाकारों के पदों का सृजन किया गया है. प्रत्येक डिवीजन के आकार और कार्यभार के आधार पर अकाउंटेंट की संख्या भी निर्धारित है. लेकिन यह व्यवस्था अब केवल कागजों तक ही सीमित होकर रह गई है. वास्तविक स्थिति यह है कि विभाग को कभी भी स्वीकृत संख्या के अनुरूप लेखाकार उपलब्ध नहीं कराए गए.

वन विभाग में 34 अकाउंटेंट के पद स्वीकृत हैं, 21 पद हैं खाली: आंकड़ों पर नजर डालें तो वन विभाग में कुल 34 अकाउंटेंट के पद स्वीकृत हैं. इनमें से 21 पद लंबे समय से खाली पड़े हुए हैं. यानी पूरे विभाग में केवल 13 अकाउंटेंट ही कार्यरत हैं. इसका मतलब यह है कि विभाग अपने स्वीकृत ढांचे के आधे से भी कम लेखाकारों के सहारे काम चला रहा है. स्वाभाविक रूप से इसका असर विभाग के वित्तीय कार्यों पर पड़ रहा है और कई स्तरों पर दिक्कतें सामने आ रही हैं.
अब 5 अकाउंटेंट और हुए कम: वन विभाग की चिंता केवल पुराने रिक्त पदों तक सीमित नहीं है. हाल ही में निदेशालय विभागीय लेखा की ओर से जारी तबादला सूची ने विभाग की परेशानी को और बढ़ा दिया है. इस सूची में वन विभाग से जुड़े 9 लेखाकारों का अन्य विभागों या स्थानों पर तबादला कर दिया गया, जबकि बदले में केवल 4 लेखाकार ही वन विभाग को दिए गए हैं. यानी तबादलों के बाद विभाग के पास कुल मिलाकर पांच लेखाकार और कम हो गए हैं.

करोड़ों की योजनाओं का कौन रखेगा लेखा-जोखा: इस स्थिति का सीधा असर विभाग के वित्तीय संचालन पर पड़ने की आशंका है. वन विभाग के पास करोड़ों रुपये की योजनाएं, विकास कार्य, वन संरक्षण कार्यक्रम, कर्मचारियों का वेतन और अन्य वित्तीय दायित्व हैं, जिनका समय पर और सही तरीके से प्रबंधन करना आवश्यक होता है. लेकिन जब लेखाकारों की संख्या लगातार घटती जा रही हो, तो विभागीय कार्यों की गति प्रभावित होना स्वाभाविक है.
असिस्टेंट अकाउंट चला रहे हैं काम: हालांकि विभाग के लिए राहत की बात यह है कि उसके पास सहायक लेखाकार यानी असिस्टेंट अकाउंटेंट की व्यवस्था मौजूद है. इन्हीं कर्मचारियों के सहारे विभाग किसी तरह अपना वित्तीय प्रबंधन बनाए हुए है. मुख्यालय से लेकर विभिन्न वन प्रभागों तक बजट का लेखा-जोखा तैयार करना, भुगतान प्रक्रिया को पूरा करना और कर्मचारियों के वेतन का समय पर वितरण करना फिलहाल इन्हीं अधिकारियों और कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है.

45 अकाउंटेंट की तबादला सूची जारी: तबादला सूची के आंकड़े भी इस पूरे मामले की गंभीरता को दर्शाते हैं. निदेशालय विभागीय लेखा द्वारा जारी आदेशों के अनुसार धारा-7 के तहत सम क्षेत्र से दुर्गम क्षेत्र में अनिवार्य स्थानांतरण के आधार पर 28 लेखाकारों के तबादले किए गए. वहीं धारा-13 के तहत अनुरोध के आधार पर 9 स्थानांतरण हुए. इसी प्रकार धारा-10 के तहत दुर्गम क्षेत्रों से सम क्षेत्रों में 6 लेखाकारों को भेजा गया, जबकि धारा-15 के अंतर्गत 2 तबादले किए गए. इस प्रकार कुल 45 लेखाकारों के तबादले की सूची जारी हुई.
वन विभाग पर तबादलों का ज्यादा असर: इन 45 तबादलों में सबसे ज्यादा असर वन विभाग पर देखने को मिला. विभाग से 9 लेखाकारों को बाहर भेज दिया गया जबकि केवल 4 लेखाकार ही विभाग को मिले. इससे पहले से चल रही कमी और गहरा गई है और अब कई वन प्रभागों में लेखा व्यवस्था सीमित संसाधनों के भरोसे चल रही है.

इन वन प्रभागों से अकाउंटेंट हटाए गए हैं: तबादला सूची में जिन महत्वपूर्ण इकाइयों और वन प्रभागों से लेखाकारों को हटाया गया है, उनमें पिथौरागढ़ वन प्रभाग, चकराता वन प्रभाग, देहरादून वन प्रभाग, तराई केंद्रीय वन प्रभाग रुद्रपुर, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व कार्यालय, रामनगर वन प्रभाग, तराई पूर्वी वन प्रभाग, प्रमुख वन संरक्षक परियोजना कार्यालय और मसूरी वन प्रभाग शामिल हैं. ये सभी वन विभाग की दृष्टि से महत्वपूर्ण इकाइयां मानी जाती हैं और यहां वित्तीय कार्यों का दायरा भी काफी बड़ा है.

वन विभाग ने निदेशालय विभागीय लेखा को लिखी चिट्ठी: वन विभाग इन परिस्थितियों से पूरी तरह वाकिफ है और उसने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया भी है. विभाग की ओर से निदेशालय विभागीय लेखा को पत्र भेजकर अपनी चिंता जाहिर की गई है. विभाग ने स्पष्ट रूप से बताया है कि पहले से ही लेखाकारों की भारी कमी बनी हुई है और ऐसे में तबादलों के कारण स्थिति और खराब हो सकती है.

अकाउंटेंट उपलब्ध कराने की मांग: सीसीएफ एचआरडी पीके पात्रो ने कहा कि-
इस संबंध में वन विभाग के सीसीएफ एचआरडी की ओर से भी पत्राचार किया गया है. पत्र में विभाग में रिक्त पड़े पदों और वित्तीय कार्यों पर पड़ने वाले संभावित असर का उल्लेख करते हुए आवश्यक संख्या में लेखाकार उपलब्ध कराने की मांग की गई है. विभाग का मानना है कि यदि समय रहते रिक्त पदों को नहीं भरा गया तो भविष्य में वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक कार्यों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है.
-पीके पात्रो, CCF, HRD-
वन दारोगा संगठन भी चिंतित: उधर इस मामले में कर्मचारी संगठन भी तमाम डिवीजन में अकाउंटेंट की कमी पर चिंता जाहिर कर रहे हैं. वन दारोगा संगठन के अध्यक्ष कहते हैं कि-

जिस तरह से अकाउंटेंट की कमी वन विभाग में हुई है, उससे विभाग के लिए दिक्कतें पैदा हो सकती हैं. इसलिए हम शासन और संबंधित विभाग से यह चाहते हैं कि वह जल्द से जल्द रिक्त पदों पर लेखाकारों की नियुक्ति करें.
-स्वरूप चंद रमोला, प्रदेश अध्यक्ष, वन दारोगा संगठन-
प्रदेश के जंगलों की सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी संभालने वाला वन महकमा इस समय अपने ही वित्तीय तंत्र की कमजोरी से जूझ रहा है. करोड़ों के बजट और व्यापक जिम्मेदारियों वाले विभाग में लेखाकारों की कमी अब केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह वन प्रबंधन की कार्यक्षमता और योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनती जा रही है. अब देखना होगा कि लेखा विभाग और शासन इस समस्या के समाधान के लिए कितनी जल्दी और कितना प्रभावी कदम उठाते हैं.

उत्तराखंड वन महकमे का बजट: दिलचस्प बात ये है कि उत्तराखंड सरकार ने 2026-27 के लिए वन महकमे को ₹131.68 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं. वहीं 2025-26 में उत्तराखंड के केंद्र से कैंपा योजना के तहत ₹253 करोड़ रुपए मिले हैं. इस राशि को मिला दें तो ये ₹384.68 करोड़ हो जाती है.

वन महकमे में ये होती है अकाउंटेंट की भूमिका: वन महकमे में लेखाकारों यानी अकाउंटेंट की भूमिका वित्तीय प्रबंधक के रूप में होती है. पूरे विभाग का वित्तीय रिकॉर्ड इन्हीं के जिम्मे होता है. मुख्य तौर पर बिंदुवार देखें तो लेखाकारों का ये काम होता है.
- विभाग को मिले बजट का रिकॉर्ड तैयार करना और खर्च की गई रकम पर निगरानी रखना भी अकाउंटेंट का मुख्य काम है. इस दौरान अकाउंटेंट को यह भी देखना होता है कि जिस मद में बजट मिला है, क्या उसका खर्चा उसी मद में किया जा रहा है.
- इसके अलावा कर्मचारियों के वेतन उनके पेंशन साथ ही यात्रा भत्ते के अलावा दूसरे भुगतानों का काम भी इन्हीं के द्वारा किया जाता है. इससे जुड़े बिल वेरीफाई करना जैसे काम भी अकाउंटेंट द्वारा किए जाते हैं.
- विभाग के भीतर विभिन्न कार्यों को करने वाले ठेकेदारों और एजेंसियों के भुगतान करने की जिम्मेदारी के साथ उनके बिलों के सत्यापन से जुड़ी प्रक्रिया भी लेखाकारों के हाथ में होती है.
- विभाग के भीतर दैनिक खर्च का रिकॉर्ड रखना भी इन्हीं का काम है और कैश बुक लेजर और दूसरे वित्तीय रजिस्टर भी इनके द्वारा तैयार या अपडेट किए जाते हैं.
- एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा काम विभागीय ऑडिट या महालेखाकार (AG) ऑडिट से जुड़ा भी होता है, जिसमें विभाग के भीतर तमाम रिकार्ड को ऑडिट टीमों के सामने रखने का काम भी इन्हीं का होता है. यही नहीं रिकॉर्ड में आडिट आपत्तियों के निस्तारण में अहम योगदान अकाउंटेंट निभाते हैं.
- वन विभाग की बात करें तो यहां पर कैंपा, वन्य जीव संरक्षण, इको टूरिज्म समेत दूसरी योजनाओं में हुए खर्च बड़े बजट का हिसाब भी इनके द्वारा रखा जाता है. इतना ही नहीं समय-समय पर उपयोगिता प्रमाण पत्र जिसे अंग्रेजी में यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट कहा जाता है, उसे भी इनके द्वारा तैयार किया जाता है.
- अकाउंटेंट की एक वित्तीय जिम्मेदारी यह भी होती है कि वह खर्च हो रही रकम की प्रक्रिया को देखे और उस पर निगरानी रखते हुए अपनी टिप्पणी भी प्रस्तुत करे.
- विभाग के भीतर रेवेन्यू और खर्च होने वाले विवरण के साथ प्रगति रिपोर्ट और वित्तीय प्रतिवेदन भी इनके द्वारा बनाए जाते हैं.
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