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धर्म संकट में यूपी कांग्रेस : प्रदेश प्रभारी की विचारधारा अपनाएं या राज्याध्यक्ष की विचारधारा पर करें अमल; एक की ईश्वर में पूर्ण आस्था, दूसरे को गुरेज़

यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम अंबेडकरवादी हैं, पूजापाठ पर भरोसा नहीं करते, वहीं यूपी कांग्रेस कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय सनातनी हैं.

UP Congress dilemma
कांग्रेस का अनूठा प्रयोगा: अंबेडकरवादी और सनातनी साथ-साथ. (ईटीवी भारत)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : July 3, 2026 at 3:46 PM IST

14 Min Read
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति, बिना धर्म और जाति के संभव नहीं है. भले ही राजनीतिक दलों के नेता बयानों में ये कहते हों कि हमारी पार्टी धर्म और जाति की राजनीति नहीं करती है. सभी जाति और वर्गों के साथ लेकर चलती है. सभी दल सामाजिक न्याय की बात करते हैं, लेकिन हकीकत यही है कि धर्म और जाति यूपी की राजनीति में अहम हैं. पार्टियां ऐसे नेता को ही दायित्व सौंपती हैं, जो अपनी जाति में पैठ रखता हो और अपनी जाति के वोट दिलवाने की क्षमता रखता हो. इस मुद्दे पर देखिए अखिलेश्वर पाण्डेय की ख़ास रिपोर्ट...

कांग्रेस पार्टी ने भी यही सोचकर एक दलित नेता को यूपी का प्रभार सौंपा है. ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के एक कदम से उत्तर प्रदेश कांग्रेस के सामने बड़ा धर्म संकट खड़ा हो गया है. धर्म संकट इसलिए, क्योंकि पार्टी ने जिस नेता राजेंद्र पाल गौतम को यूपी प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी है. वह आम आदमी पार्टी की तत्कालीन अरविंद केजरीवाल सरकार में कैबिनेट मंत्री रहने के दौरान दिल्ली में बड़ी संख्या में मौजूद लोगों को भगवान की पूजा न करने की शपथ दिला रहे थे. इससे साफ़ ज़ाहिर है कि यूपी कांग्रेस के नए प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम की ईश्वर में आस्था नहीं है, जबकि प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ईश्वर के अनन्य भक्त हैं. वे काशी से आते हैं. ऐसे में काशी विश्वनाथ मंदिर जाते ही रहते हैं. कांग्रेस मुख्यालय के अपने कमरे में वे जहां वे बैठते हैं, वहां पर भगवान काशी विश्वनाथ की बड़ी सी तस्वीर लगी हुई है. भगवान राम में भी उनकी आस्था का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह कई बार अयोध्या में भगवान राम के दर्शन करने जा चुके हैं. हाल ही में सरकार ने उन्हें लाख रोकने की कोशिश की फिर भी वह अडिग रहे और दर्शन करके ही माने. ऐसे में कांग्रेस के यूपी प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष की आइडियोलॉजी पूरी तरह विपरीत है. अब कार्यकर्ता धर्म संकट में हैं कि प्रभारी की मिशन विचारधारा पर चलें या फिर कांग्रेस अध्यक्ष की विचारधारा पर अमल करें.

कांग्रेस का अनूठा प्रयोगा: अंबेडकरवादी और सनातनी साथ-साथ. (ईटीवी भारत (फाइल))

वैसे तो कांग्रेस की विचारधारा नेहरू गांधी की विचारधारा है, लेकिन धार्मिक विचारधारा की बात की जाए, तो यूपी में कांग्रेस के नेता सभी धर्मों को बराबर अहमियत देते हैं. किसी भी धर्म के प्रति कोई ऐसी बात नहीं करते हैं, जिससे किसी की भावनाएं आहत हों.

पता है, ऐसा करेंगे तो इसका राजनीतिक नुकसान पार्टी को उठाना ही पड़ेगा, लेकिन वर्तमान में कांग्रेस आलाकमान ने जिस नेता को यूपी प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी है, उनका पास्ट सनातन धर्म की आस्था से खिलवाड़ वाला रहा है. जब वह आम आदमी पार्टी में थे, तो एक बड़े बौद्ध सम्मेलन में बाकायदा लोगों के साथ किसी भी भगवान की पूजा न करने की शपथ ले रहे थे. ऐसा वह मिशन को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे थे.

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आप से इस्तीफ़ा देते वक्त राजेंद्र पाल गौतम. (ईटीवी भारत (फाइल))
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राजेंद्र पाल गौतम ने आप से इस्तीफ़ा देते वक्त लिखी थी चिट्ठी. (ईटीवी भारत (फाइल))
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राजेंद्र पाल गौतम ने आप से इस्तीफ़ा देते वक्त लिखी थी चिट्ठी. (ईटीवी भारत (फाइल))

आम आदमी पार्टी को समझ आ गया कि इससे नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसके बाद आम आदमी पार्टी ने राजेंद्र पाल गौतम का इस्तीफा ले लिया. इससे आहत गौतम ने आम आदमी पार्टी की विधायकी भी छोड़ दी और आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी में दलितों-पिछड़ों की बात नहीं सुनी जाती. इसके बाद उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस पार्टी ज्वॉइन कर ली. कांग्रेस पार्टी ने उन्हें सर आंखों पर बिठा लिया.

साल 2024 में कांग्रेस ज्वॉइन करने के कुछ माह बाद ही पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर का पद भी दे दिया. अब देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का प्रभार भी सौंप दिया गया. उन्हें अनुसूचित जाति कांग्रेस विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ ही यूपी प्रभारी बनाकर भेज दिया है. अब पार्टी के अंदर ही नेताओं और कार्यकर्ताओं में यह चर्चा है कि प्रभारी घोर जातिवादी तो हैं ही, हिंदू धर्म के प्रति उनकी आस्था भी नहीं है.

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कांग्रेस के एससी प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम. (ईटीवी भारत)

दलितों में भी उन्हें वही दलित प्रिय हैं, जो पूजा-पाठ में विश्वास न करते हों, जबकि यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय की भगवान में अटूट आस्था है. भगवान शिव की नगरी काशी से ताल्लुक रखते हैं. ऐसे में उनके रोम-रोम में आस्था और भक्ति भरी हुई है. पार्टी कार्यकर्ता तो मजाक के लहजे में अब यह भी कहने लगे हैं कि अब जय भीम बोलने का भी दबाव होगा और जय श्री राम भी.

चार दशक से यूपी की सत्ता से दूर

अब कांग्रेस पार्टी की उत्तर प्रदेश में राजनीति की बात की जाए, तो पिछले चार दशक से पार्टी सत्ता की कुर्सी से दूर है. इसके पीछे कई कारण भी हैं. यहां पर क्षेत्रीय दल के रूप में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का उदय होना. इसके बाद भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाना. क्षेत्रीय दलों ने उत्तर प्रदेश से कांग्रेस की राजनीति खत्म करने में अहम भूमिका निभाई. पार्टी लगातार प्रयास करती रही कि यूपी में कैसे भी फिर से सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाए, लेकिन ऐसा हो न सका.

40 सालों में पार्टी ने विभिन्न दलों के साथ गठबंधन भी किया, लेकिन सीटें इतनी नहीं आईं कि गठबंधन की सरकार में भी कांग्रेस शामिल हो सके. पिछले दो विधानसभा चुनाव की बात की जाए, तो साल 2017 में कांग्रेस पार्टी की उम्मीद जगी थी. शीला दीक्षित को मैदान में उतारा गया था. रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी कांग्रेस के लिए यूपी में काम कर रहे थे, लेकिन अचानक कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन का एलान हो गया.

इसके बाद सब कुछ बदल गया. जिस कांग्रेस पार्टी को लग रहा था कि यूपी में उसके किस्मत के दरवाजे खुलेंगे उसी कांग्रेस को गठबंधन से बड़ा नुकसान हुआ. राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने प्रदेश भर में साथ चलकर 27 साल यूपी बिहार के नारे तो खूब लगाए, लेकिन वह जनता को लुभा नहीं पाए. समाजवादी पार्टी ने 298 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन सिर्फ 47 सीटों ही जीत पाई थी, जबकि कांग्रेस पार्टी ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ 7 सीटों पर सिमट कर रह गई.

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यूपी कांग्रेस प्रभारी बनने पर लोगों का अभिवादन स्वीकार करते राजेंद्र पाल गौतम. (ईटीवी भारत (फाइल))

नहीं चला था राज बब्बर और गुलाम नबी आजाद का जादू

साल 2017 में कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और उत्तर प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था, लेकिन राज बब्बर और गुलाम नबी आजाद की जोड़ी यूपी में कोई करिश्मा नहीं कर पाई थी. पिछड़ा और मुस्लिम का दांव यहां पर नहीं चल पाया था. नतीजों के बाद कांग्रेस पार्टी ने माना था कि अगर गठबंधन नहीं होता, तो कांग्रेस की बहुत ज्यादा सीटें आतीं. गठबंधन का नुकसान हुआ.

लेफ्ट विचारधारा से पार्टी हुई ग्रसित, राइट ट्रैक पर नहीं हुई वापसी

कांग्रेस की विचारधारा वक्त-वक्त पर बदलती भी रही है, जिसका पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता रहा है. 2022 के विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस की महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी थीं, तब लेफ्ट विचारधारा कांग्रेस पर हावी हो गई. पूरा जेएनयू गैंग ही उत्तर प्रदेश कांग्रेस में सक्रिय हो गया.

वामपंथियों ने कांग्रेस पार्टी पर इस कदर कब्जा जमाया कि खांटी कांग्रेसी भी पार्टी से दूर हो गए. लेफ्ट विंग के इस कदम से कांग्रेस पार्टी राइट ट्रैक पर आ ही नहीं पाई.

लेफ्ट विंग ने ऐसी चाल चली कि कांग्रेस का सबसे मजबूत बनारस घराना ही पार्टी से छिटक गया. जिस घराने से कभी कमलापति त्रिपाठी कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे थे, उसी घराने के ललितेश पति त्रिपाठी ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया और तृणमूल कांग्रेस के साथ हो गए.

इससे कांग्रेस की स्थिति यूपी में और कमजोर हो गई. यही नहीं यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष बनने की कतार में चल रहे वरिष्ठ कांग्रेस नेता राजेश मिश्रा ने भी वामपंथियों की चाल से नाराज होकर कांग्रेस पार्टी छोड़ भाजपा ज्वॉइन कर ली.

इसके अलावा यूपी के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी या तो पार्टी से दूर चले गए, दूसरी पार्टी ज्वॉइन कर ली या फिर घर पर ही बैठ गए. नेहरू गांधी विचारधारा वाले खांटी कांग्रेसियों की लेफ्ट विचारधारा से मैचिंग ही नहीं हुई, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा.

प्रियंका गांधी और अजय कुमार लल्लू के हाथ थी यूपी की कमान

2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी थीं, तो प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी अजय कुमार लल्लू के पास थी. पार्टी ने 2022 का यूपी विधानसभा चुनाव अकेले दम पर लड़ा. 399 सीटों पर पार्टी ने प्रत्याशी उतारे. वामपंथी टीम की स्कीम पर प्रियंका गांधी ने काम किया. "लड़की हूं लड़ सकती हूं" का स्लोगन दिया. 40% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दीं. इसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी को सिर्फ दो ही विधानसभा सीटें जीतने में सफलता मिली. यूपी में वोट प्रतिशत भी धड़ाम हो गया. कांग्रेस का सिर्फ 2.7 मत प्रतिशत रह गया. संदेश साफ था कि कांग्रेसी विचारधारा वामपंथी विचारधारा को नहीं अपनाएगी.

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पूजा-पाठ करते यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय. (ईटीवी भारत (फाइल))
पिछले लोकसभा चुनाव में प्रभारी अविनाश पांडेय और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय का प्रदर्शन रहा बेहतर

2024 के लोकसभा चुनाव के लिए नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने खुद कमान संभाली थी. प्रभारी के रूप में अविनाश पांडेय को यूपी भेजा और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अजय राय यहां पर काम कर रहे थे. कांग्रेस पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव के सात साल बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया. इस बार गठबंधन का फायदा दोनों ही पार्टियों को मिला.

यूपी में कांग्रेस के रणनीतिकार प्रभारी अविनाश पांडेय और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने बेहतर काम किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस पार्टी छह लोकसभा सीटें जीतने में सफल हो गई, जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सिर्फ एक लोकसभा सीट ही जीत पाई थी. यह चुनाव जीतने के पीछे कांग्रेसी एक अहम कारण यही मानते हैं कि 2022 के बाद यूपी कांग्रेस से लेफ्ट विचारधारा वाले लोग खदेड़ दिए गए थे. इसके बाद कई प्योर कांग्रेसी फिर से पार्टी के साथ जुड़े.

यूपी में 21 फीसद दलित मतदाता

यूपी में दलित कम्युनिटी को लुभाने के लिए ही कांग्रेस पार्टी ने राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी बनाकर बड़ा दांव खेला है. पार्टी को उम्मीद है कि राजेंद्र पाल गौतम दलितों को पार्टी के साथ जोड़ने में सफल होंगे. उत्तर प्रदेश में अगर दलित मतदाताओं की बात की जाए, तो राजनीति में दलित मतदाता बड़ा और निर्णायक सामाजिक समूह हैं. जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 21 फीसद है. यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें और 80 लोकसभा सीटों में से 17 लोकसभा सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं.

क्या कहते हैं कांग्रेस सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष

कांग्रेस सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजेंद्र कुमार सैनी का कहना है कि नए प्रभारी का स्वागत है. संगठन को देखते हुए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने यह फैसला लिया है. पहले वे किसी दल में रहे हों और कुछ किया हो, लेकिन अब कांग्रेस पार्टी में हैं. हमारी पार्टी गांधी नेहरू विचारधारा की है. कांग्रेस से ही सभी पार्टियां निकली हैं, क्योंकि कांग्रेस वो पार्टी है जिसने पूरे भारत को अपना लहू से सींचा है. हमें जय श्री राम भी कहना है और जय भीम भी.

क्या कहते हैं कार्यकर्ता

कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता नवनीत का कहना है कि सनातन धर्म हमारी आस्था का विषय है. जाति और धर्म स्वीकार करना पड़ेगा. यूपी सबसे बड़ा प्रदेश है. यूपी में धर्म की राजनीति होती रही है. कांग्रेस पार्टी सभी को साथ लेकर चलती रही है. नए प्रभारी आए हैं, निश्चित तौर पर इसका फायदा होगा.

कांग्रेस कार्यकर्ता विजय बहादुर का कहना है कि हमारे प्रदेश अध्यक्ष भगवान के अनन्य भक्त हैं. वह काशी से हैं, लेकिन मेरा मानना है कि जब कोई व्यक्ति एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाता है तो वह अपनी पार्टी का कुछ न कुछ एजेंडा लेकर जाता है. धर्म और जाति की राजनीति ज्यादातर यूपी में चल रही है. सत्ता पक्ष में जो है वह भी धर्म और जाति की राजनीति कर रहा है. नेता जब किसी पार्टी में होता है तो वह सिर्फ वोट बैंक बढ़ाने के लिए ऐसा कुछ करता है. कांग्रेस पार्टी में अब प्रभारी आए हैं, तो वे सभी को साथ लेकर चलेंगे. जो उन्होंने वहां पर किया होगा यहां पर ऐसा नहीं करेंगे.

कांग्रेस कार्यकर्ता शुभम का कहना है कि "जब से हमारे यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कांग्रेस का पटका पहना है तबसे कांग्रेस पार्टी की विचारधारा से ही कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं. राहुल और प्रियंका गांधी के साथ चल रहे हैं, इसलिए उन्हें पहले एससी प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था. भाजपा अब बेवजह की बात न करें. वह आम आदमी पार्टी में रहने के दौरान का वीडियो होगा. कांग्रेस में सभी को साथ लेकर चलने की प्रथा है."

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यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम. (ईटीवी भारत (फाइल))

क्या कहते हैं प्रवक्ता

कांग्रेस के वरिष्ठ प्रदेश प्रवक्ता अंशू अवस्थी का कहना है कि "सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि लोग अपने-अपने तरीके से आस्था रखें. दूसरी विशेषता है कि कोई भी किसी के ऊपर सवाल नहीं खड़ा कर सकता. राजेंद्र पाल गौतम तथागत बुद्ध को मानते हैं. बुद्ध भी सनातन धर्म में विष्णु भगवान के दसवें अवतार हैं. सभी मानते हैं. सभी उनका सम्मान करते हैं. करोड़ों करोड़ कांग्रेसी आस्था रखते हैं. भारतीय जनता पार्टी जिनकी सरकार में सालों साल भगवान राम के मंदिर में आए श्रद्धालुओं के चढ़ावों की लूट होती रही. मोहम्मद गौरी ने तो 17 बार लूटा, लेकिन भाजपा और संघ वालों ने तो सालों साल लूटा. रोज लूट रहे हैं. जाति और धर्म की जहां तक बात है, इसमें कोई दो राय नहीं की जाति और धर्म है, इसे स्वीकार करना चाहिए. जाति और धर्म के समीकरण पर राजनीति होती है. कांग्रेस पार्टी सिर्फ जाति और धर्म के नाम पर राजनीति नहीं करती. यही बीजेपी और कांग्रेस में फर्क है. हम जाति और धर्म के लोगों को महत्व देते हैं. भारतीय जनता पार्टी एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव में नहीं उतारती. जाति और धर्म सच्चाई है. कांग्रेस पार्टी जाति और धर्म के मुद्दों को लेकर आगे चलती है. किसान, युवा और आम आदमी की बात करती है. भाजपा हर मोर्चे पर फेल है. उसे धर्म की बात करने का भी हक नहीं है. यह किसी के नहीं हैं."