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धमतरी के सेमरा गांव की अनोखी कहानी, तय तारीख से पहले मनाते हैं होली सहित चार त्योहार

गांव के लोगों का कहना है कि तय तारीख पर त्योहार मनाने से गांव पर दैवीय विपदा आती है.

HOLI CELEBRATED BEFORE SCHEDULED
सेमरा गांव की अनोखी कहानी (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : February 26, 2026 at 12:20 PM IST

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धमतरी: देशभर में 4 मार्च को होली मनाई जाएगी, लेकिन धमतरी में एक ऐसा गांव है जहां पर एक सप्ताह पहले ही चार प्रमुख बड़े त्योहारों को मना लिया जाता है. बुधवार को पूरा गांव रंगों में सराबोर नजर आया. त्योहारों की तय तिथि से पहले ही त्योहार मनाने वाले इस गांव की पूरे देश भर में चर्चा है. खास करके बड़े त्योहार में दिवाली और होली में यहां पर मेहमान और आसपास के गांव के लोग भी यहां पर आकर त्योहार की खुशियों में शामिल होते हैं.

स्थानीय लोग बताते हैं कि धमतरी से लगे सेमरा - सी गांव में एक सप्ताह पहले ही चार प्रमुख त्योहारों को मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. इसके पीछे की मान्यता है कि गांव में सुख शांति रहे और किसी प्रकार की कोई विपत्ति नहीं आए.

सेमरा गांव की अनोखी कहानी (ETV Bharat)

सेमरा गांव 4 बड़े त्योहार 1 हफ्ते पहले मनाने की परंपरा

सेमरा गांव के लोगों ने बताया कि 1 हफ्ते पहले ही होली खेलने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. जिस दिन वास्तविक त्योहार होता है उस दिन ये लोग उस त्योहार को नहीं मनाते हैं. यहां तक घरों में पकवान और मिठाई तक नहीं बनती है. इस बार यहां के लोगों ने 25 फरवरी को होली का त्योहार पुरानी पंरपरा अनुसार मनाया.

HOLI CELEBRATED BEFORE SCHEDULED
सेमरा गांव की अनोखी कहानी (ETV Bharat)

जानिए कौन हैं आराध्य सिरदार देव, क्यों मंदिर मे महिलाओं के प्रवेश पर है रोक

गांव के लोग गांव में बने आराध्य सिरदार देव के मंदिर में पूजा अर्चना कर एक सप्ताह पूर्व त्योहार मनाते हैं. खास बात ये है कि इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. केवल पुरुष वर्ग ही इस मंदिर में जाकर पूजा अर्चना कर सकते हैं. गांव के लोगों की मानें तो गांव के देवता सिरदार देव हैं. सालों पहले जब गांव में विपदा आई थी, तब गांव के मुखिया को ग्राम देवता सिरदार देव सपने में आए और आदेश दिया कि हर त्योहार और पर्व सात दिन पहले मना लें.

अगर ऐसा नहीं किया तो गांव में फिर से कोई न कोई विपदा जरूर आएगी. शुरू में सभी लोगों ने इस बात को नहीं माना और परंपरागत रूप से त्योहार मनाने लगे, लेकिन कुछ दिनों बाद गांव में संकट आने लगा. कभी बीमारी, तो कभी अकाल पड़ने लगा. तब ग्रामीणों ने सपने वाली बात का पालन करने का फैसला किया. तब से ही ये परंपरा चली आ रही है. गांव के बुजुर्गो के कहने पर युवा भी इस परम्परा का पालन करते आ रहे हैं. आज भी ये परम्परा निभाई जा रही है.

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