बिहार का अनोखा गांव, यहां हर जातियों के अलग-अलग मंदिर, क्या आप इसके बारे में जानते हैं?
नवादा के सीतामढ़ी में एक परिसर में विभिन्न जातियों के एक दर्जन मंदिर सामाजिक समरसता की मिसाल हैं, लेकिन यहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव है.

Published : June 25, 2026 at 4:46 PM IST
नवादा: बिहार के नवादा स्थित मेसकौर प्रखंड का सीतामढ़ी गांव इन दिनों अपनी एक बेहद अनोखी परंपरा के लिए चर्चा में है. इस पावन भूमि की विशेषता यह है कि यहां एक ही परिसर के भीतर अलग-अलग जातियों के 12 से अधिक मंदिर मौजूद हैं. हर मंदिर में उसी विशिष्ट जाति से आने वाले पुजारियों द्वारा पारंपरिक रीति-रिवाजों से पूजा-अर्चना की जाती है. यह क्षेत्र समाज को जातिगत भेदभाव से दूर ले जाकर सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारे और परंपराओं के संगम की मिसाल पेश करता है.
जीवंत आस्था का केंद्र: इस गांव की परंपरा के तहत एक ही परिसर के अंदर विभिन्न सामाजिक वर्गों के एक दर्जन से भी अधिक मंदिर स्थापित हैं. हर एक मंदिर का संचालन और धार्मिक अनुष्ठान उसी विशेष जात के पुजारी द्वारा किया जाता है. सीतामढ़ी गांव में सदियों से चली आ रही यह दुर्लभ व्यवस्था आज भी अपनी विशिष्ट लोक परंपराओं और अटूट आस्था के साथ जीवंत है. यह गांव भारत देश की ऐतिहासिक हकीकत को बयां करता है, जिसके बारे में शायद ही लोग पहले से जानते होंगे.

गुमनाम योद्धाओं की तस्वीरें: इस परिसर में स्थित राजवंशी मंदिर का पूरा नाम राजवाड़ राजवंशी महावीर ठाकुरबाड़ी सह क्रांति स्थल सीतामढ़ी है. यह ठाकुरबाड़ी देश के महान और गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों की पावन स्मृति और इतिहास से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है. इनमें मुख्य रूप से एतवा रजवार, जवाहिर रजवार और फतह उर्फ कारू राजबार जैसी महान और वीर विभूतियां शामिल हैं. इस क्रांतिकारी मंदिर का निर्माण देश की आजादी मिलने से ठीक 3 साल पहले यानी सन 1944 में स्थानीय राजवंशी समाज के पूर्वजों द्वारा कराया गया था.
स्वर्णकार समाज का मंदिर: यह विडंबना है कि ऐसे महान स्थानीय लोगों के नाम भी आज के आधुनिक शिक्षा के सिलेबस से गायब कर दिए गए हैं. इस ठाकुरबाड़ी में उन तीनों महान वीर शहीदों की अत्यंत दुर्लभ तस्वीरें आज भी साफ तौर पर देखी जा सकती हैं. इस परिसर के भीतर स्थित स्वर्णकार समाज का भी एक मंदिर अत्यंत प्राचीन समय में यानी वर्ष 1939 में निर्मित माना जाता है. ग्रामीण दिनेश कुमार वर्मा और बालवीर चांद के अनुसार यहां भगवान राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान की प्रतिमाएं हैं.

लव-कुश मंदिर की आस्था: इसके साथ ही वहां तुलसीदास जी के दीक्षा गुरु संत शिरोमणि नरहरी जी महाराज की भी एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है. स्वर्णकार समाज के इस ऐतिहासिक मंदिर के मुख्य पुजारी भी पूरी तरह से पारंपरिक व्यवस्था के अनुसार सोनार समाज से ही आते हैं. वर्तमान समय में इस पावन मंदिर के नाम पर सरकारी दस्तावेजों में लगभग 7 बीघा जमीन भी पूरी तरह से दर्ज है. इसके साथ ही इसी परिसर के भीतर एक अत्यंत सुंदर लव-कुश मंदिर भी स्थित है.

कुशवाहा और तांती समाज: बुजुर्गों के अनुसार यह लव-कुश मंदिर लगभग 78 वर्ष पुराना है और यह पूरी तरह से कुशवाहा समाज की आस्था का केंद्र है. इस मंदिर के मुख्य पुजारी वासुदेव प्रसाद भी इसी कुशवाहा समाज से ही आते हैं, जो इस परिसर की समरसता को मजबूत करते हैं. इसी पावन परिसर के भीतर स्थित भगवान सूर्यनारायण का भव्य मंदिर मुख्य रूप से स्थानीय तांती समाज का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है. इस मंदिर की देखरेख करने वाले मुख्य पुजारी अमीरक तांती हैं.
शादियां और समारोह: पुजारी अमीरक तांती स्वयं इसी तांती समाज से सीधे तौर पर ताल्लुक रखते हैं और मंदिर की व्यवस्था को संभालते हैं. सूर्यनारायण मंदिर की सबसे खास बात यह है कि पूरे तांती समाज में होने वाली शादियों की बातचीत यहीं तय होती है. इतना ही नहीं, बल्कि इस समाज के कई परिवारों के सुंदर विवाह समारोह भी इसी मंदिर परिसर के प्रांगण में संपन्न कराए जाते हैं. इसके अलावा परिसर में एक अत्यंत पवित्र और सुंदर भोला रजक मंदिर भी स्थित है.

भोला रजक और जरासंध मंदिर: इस भोला रजक मंदिर के भीतर पूजा-अर्चना का सारा कार्य मुख्य रूप से रजक (धोबी) समाज के पुजारियों द्वारा ही किया जाता है. इसी विशाल परिसर के भीतर स्थित महाराजा जरासंध के ऐतिहासिक मंदिर को लेकर ग्रामीणों के बीच कई मान्यताएं सामने आती हैं. ग्रामीणों का मानना है कि प्राचीन मगध साम्राज्य के महाराजा जरासंध मुख्य रूप से चन्द्रवंशी समाज से संबंधित थे. वर्तमान में इस मंदिर पर चन्द्रवंशी समाज के दिलीप कुमार का कब्जा बताया जाता है.

मंदिर के पुजारी और जमीन: इस आंतरिक विवाद के कारण ही वर्तमान समय में इस ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण मंदिर के मुख्य द्वारों पर ताला लगा हुआ है. इस प्रसिद्ध जरासंध मंदिर के पूर्व मुख्य पुजारी स्वर्गीय सुखदेव पाठक थे, जिन्होंने लंबे समय तक यहां अपनी सेवाएं दी थीं. वर्तमान समय में इस मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में स्थानीय स्तर पर सीताराम पाठक का नाम सामने आता है. सरकारी राजस्व अभिलेखों के अनुसार मंदिर की जमीन का खतियान भी उन्हीं के नाम दर्ज है.
भव्य प्रतिमाएं और बनावट: इस जरासंध मंदिर के मुख्य हॉल में महाराजा जरासंध, भगवान श्री कृष्ण, वीर अर्जुन और महाबली भीम की प्रतिमाएं स्थापित हैं. पश्चिमी कक्ष में गणेश जी, सावित्री-सत्यवान, यमराज और शिवलिंग हैं, जबकि पूर्वी कक्ष में हनुमान जी की प्रतिमा है. इस प्रतिमा में वे अपने दोनों कंधों पर प्रभु राम और लक्ष्मण को उठाए हुए दिखाई देते हैं. इस अद्भुत प्रतिमा के निचले हिस्से में हनुमान जी पैरों के नीचे एक राक्षसी को दबाए हुए हैं.

चौहान ठाकुरबाड़ी और शबरी मंदिर: इस मंदिर का निर्माण आजादी के बाद हुआ था और इसके नाम पर लगभग 9 बीघा की बड़ी जमीन मौजूद है. ग्रामीणों के अनुसार इस पवित्र मंदिर की लगभग दो बीघा से अधिक जमीन पर कुछ लोगों द्वारा अतिक्रमण कर लिया गया है. वहीं मेसकौर निवासी साधु चौहान (पिता स्वर्गीय रामोतार चौहान) चौहान ठाकुरबाड़ी के पुजारी हैं, जहां राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान जी विराजमान हैं. माता शबरी मंदिर की नींव वर्ष 1993 में माउंटेन मैन दशरथ मांझी ने रखी थी.

चौधरी समाज और बिजली पासी: यह सुंदर मंदिर रामायण काल की परम भक्त माता शबरी की भगवान श्री राम के प्रति निश्छल भक्ति को दर्शाता है. इस अद्भुत गांव के भीतर स्थानीय चौधरी समाज का भी एक शिवलिंग मंदिर स्थित है, जहां चौधरी समाज के पुजारी पूजा करते हैं. इस समाज के तमाम लोग हर वर्ष धूमधाम से अपने पूर्वज ‘बिजली पासी’ के नाम पर भव्य जयंती मनाते हैं. इसके अलावा झुनकिया बाबा का पवित्र आश्रम भी प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है.
"माता शबरी मंदिर की नींव वर्ष 1993 में माउंटेन मैन दशरथ मांझी ने रखी थी, ये माता शबरी की भगवान राम के प्रति निश्छल प्रेम का प्रतीक है. आपने सुना होगा कि कैसे उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रेम में प्रभु राम ने शबरी माता के झूठे बेर भी खाए थे." - उपेंद्र राजवंशी, ग्रामीण

झुनकिया बाबा का आश्रम: इस आश्रम की देखरेख वर्तमान में कटघरा निवासी पुजारी अशोक सिंह उर्फ तनिक सिंह करते हैं, जो भूमिहार समाज से आते हैं. इस आश्रम की नींव आजादी से पहले सीतामढ़ी में पदस्थापित पुलिस सब-इंस्पेक्टर सीताराम सिंह द्वारा रखी गई थी. वैशाली के निवासी सीताराम सिंह राजपूत समाज से थे और उनके द्वारा स्थापित आश्रम को आज भूमिहार पुजारी संभाल रहे हैं. यह व्यवस्था भी इस गांव की उस महान सोच को दर्शाती है जहां जातियों की दीवारें टूट जाती हैं.

कबीर मठ और चमारिया दास: सीतामढ़ी थाना से महज 100 मीटर की दूरी पर चारों तरफ विभिन्न सामाजिक वर्गों की अपनी-अलग मंडियां भी स्थापित हैं. यह मंडियां इस पूरे ग्रामीण क्षेत्र की समृद्ध सामाजिक विविधता और आर्थिक आत्मनिर्भरता को सुंदर ढंग से प्रदर्शित करती हैं. यहीं कबीर मठ में रविदास समाज से संबंधित महान वैद्य बाबा चमारिया दास की प्रतिमा और समाधि स्थापित है. स्थानीय लोगों के अनुसार बाबा महान व्यक्तित्व के धनी थे और उनकी आयु 125 वर्ष बताई जाती है.
"बाबा चमारिया दास जी पेशे से वैद्य थे और लोगों का निःशुल्क उपचार किया करते थे. जड़ी-बूटियों से इलाज करते थे में उनकी पूरे मगध क्षेत्र में एक बहुत ही विशेष पहचान बनी हुई थी. उनके उपचार से कई निःसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति हुई थी. वर्तमान में इस कबीर मठ की लगभग 12 बीघा जमीन उनकी शिष्या बचिया दास के नाम पर दर्ज है." - उपेंद्र राजवंशी, ग्रामीण

दांगी समाज और बुनियादी अभाव: इसके साथ ही परिसर में दांगी समाज का भी मंदिर स्थित है, जिसमें भगवान हनुमान की प्रतिमा विराजमान है. बिहार सरकार द्वारा इस ऐतिहासिक सीतामढ़ी को आधिकारिक रूप से राजकीय मेले का महत्वपूर्ण दर्जा तो प्राप्त है. लेकिन इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां आज तक बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव बना हुआ है. इस पूरे गांव में न तो पीने के शुद्ध पानी की व्यवस्था है और न ही नल-जल योजना का लाभ मिला है.
बदहाल जीवन और डीएम को गुहार: इस प्रशासनिक लापरवाही के कारण इस ऐतिहासिक गांव के स्थानीय ग्रामीण आज भी बदहाल जीवन जीने को मजबूर हैं. इस पेयजल संकट को लेकर ग्रामीण पवन कुमार और पुजारी सीताराम पाठक सहित कई लोगों ने नवादा जिलाधिकारी को अवगत कराया है. लेकिन प्रशासन से लगातार गुहार लगाने के बावजूद आज तक इस जनसमस्या का कोई ठोस समाधान नहीं निकला है.
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