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मैट्रिक फेल, लेकिन 5 भाषाओं का ज्ञान; बनारसी भुईया से 'आलम' बनने वाले कलाकार की कहानी

बनारसी आलम मैट्रिक तक पढ़ाई नहीं की, लेकिन इन्हें पांच भाषा आता है. समाज के हेय दृष्टि से बचने के लिए नाम बदल लिया था.

Unique People of Bihar banarsi alam
बनारसी आलम (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : July 4, 2026 at 5:26 PM IST

8 Min Read
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गया: बिहार के गया के बनारसी आलम की कहानी जानकर हैरान रह जाएंगे. यह पढ़े-लिखे कम हैं, मैट्रिक भी पास नहीं है, लेकिन इनकी बातों को सुनने वाला अचंभित रह जाता है. इन्होंने अपना नाम इसलिए बदल दिया, ताकि उन्हें कोई हेय दृष्टि से ना देखें. दरअसल, बनारसी आलम वास्तव में बनारसी भुईया हैं.

इसलिए बदलना पड़ा नाम: मुसहर जाति से आने वाले बनारसी आलम गया जिले के मोहनपुर प्रखंड के हमजापुर गांव से सटे लय गांव के रहने वाले हैं, जो कि गया मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है. बताते हैं, कि भुईया जाति में पहले जो नाम रखे जाते थे, उसमें बढनवा, शुकरा, शुकना, शनिचरा आदि होते थे. इन नाम को समाज में काफी हेय दृष्टि से देखा जाता था कोई सम्मान नहीं मिलता था ऐसे में उन्हें इससे निपटने का इससे बेहतर आइडिया नहीं सूझा और फिर उन्होंने अच्छे-अच्छे नाम रखना शुरू कर दिए.

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ईटीवी भारत GFX (ETV Bharat)

नाम बदलने का असर: खुद की समाज में पहचान बनारसी आलम की बना ली. आज बनारसी आलम के नाम से प्रसिद्ध है. वहीं, कुछ लोग उन्हें बनारसी यादव भी कह देते हैं. कुछ बनारसी बाबू, बनारसी भैया भी कहते हैं, तो यह नाम बदलने का कमाल है. नाम से भी कहीं न कहीं असर पड़ता है. वही, बनारसी आलम ने अपने बच्चों के नाम भी बढ़ना, शुकरा के बजाए अलग-अलग धर्म से मिलते जुलते नाम रखें.

"बड़े बेटे का नाम शब्बीर रखा. छोटे बेटे का नाम श्रवण रखा. बड़ी बेटी का नाम मरियम रखा, छोटी बेटी का नाम रवीना रखा. नाम भले ही अलग-अलग धर्म से मिलते जुलते हो. किंतु धर्म नहीं छोड़ा है. मुसहर जाति से हैं. केवल मुसलमान जाति के नाम से जुड़े हुए हैं." -बनारसी आलम

बनारसी आलम की कहानी (ETV Bharat)

राजनीतिक मैदान का अनुभव: बनारसी आलम कहते हैं कि सब कुछ समाज से ही चलता है, जो मुसहर मानता है, वह भी मानते हैं, लेकिन थोड़ी सोच बदली है और यही वजह रही, कि हमने पूरे परिवार के नाम में परिवर्तन किया. बनारसी की सोच काफी ऊंची है. बनारसी आलम पूर्व में एमएलए का चुनाव भी लड़ चुके हैं. चुनाव जो लड़ा, तो उसमें अपना नाम लिखा बनारसी भुईया उर्फ़ बनारसी आलम नाम दिया था

दाढ़ी रखने का दिलचस्प कारण: इनकी पूरी प्रसिद्धी बनारसी आलम के रूप में है, तो उन्होंने एमएलसी चुनाव में उतरे जरूर, लेकिन कुछ खास कर नहीं सके. बनारसी कहते हैं, कि हम मांझी थे, तो मांझी ही रहेंगे. हमने सिर्फ नाम अपनाया है. धर्म का दृष्टिकोण नहीं बदला. नाम के दृष्टिकोण को सिर्फ बदला है. वही, मुस्लिम की तरह दाढ़ी रखने का कारण भी यह बताते हैं.

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बच्चों को पढ़ाते बनारसी आलम (ETV Bharat)

"दाढ़ी मुसलमानों की तरह जरूर दिखती है, लेकिन मैं एक गायक हूं. कोलकाता में गीत गाने के दौरान लोग साड़ी पहनकर नाच करने के लिए कहते थे तो इसलिए इस तरह की दाढ़ी बढ़ा ली ताकि महिलाओं के कपड़े पहनकर नाच नहीं करना पड़े." -बनारसी आलम

गायन कला: बनारसी आलम बताते हैं कि वे निर्गुण गा लेते हैं. इसके अलावा नाटक का मंचन भी बेहतरीन कर लेते हैं. लोकगीत की परंपरा से भी जुड़े हैं. बनारसी आलम की सबसे बड़ी खासियत यह है, कि वह किसी भी टॉपिक पर तुरंत गा देते हैं. सिर्फ विषय बताएं और वह चंद समय लेते हैं और फिर गाना शुरू कर देते हैं. ईटीवी भारत ने उनसे विविध विषयों पर गाने को कहा, तो उन्होंने गाकर सुनाया भी.

कला जगत में मिले बड़े पुरस्कार: इन्हें कई तरह के पुरस्कार संगीत नाटक के क्षेत्र में मिल चुके हैं. जिला स्तरीय या राज्य स्तरीय पुरस्कार विभिन्न संगठनों के द्वारा इन्हें दिया गया है. कौमुदी महोत्सव के अलावा अन्य कई संगीत से जुड़े बेहतर कलाओं को लेकर इन्हें पुरस्कार दिया गया है. ये थोड़ी बहुत शायरी भी कर लेते हैं. वही, नाटक का मंचन भी अच्छा करते हैं.

सामाजिक जागरूकता के प्रयास: इन्होंने नाटक मंडली बना रखी है. इस तरह विभिन्न टॉपिक पर गाना गाकर यह हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं. पलायन पर हो, शिक्षा पर हो, या अन्य किसी विषय पर, यह तुरंत इन बिंदुओं पर गाना गाकर सुना देते हैं. सबसे बड़ी बात यह भी है, कि वह बच्चों को संगीत गाकर पढ़ने को प्रेरित भी करते हैं.

पांच भाषाओं पर बेजोड़ पकड़: अपने महादलित समाज के लिए भी इस तरह का गाना गाकर जागरुकता लाने की कोशिश भी करते हैं. संगीत में रुचि होने के कारण ये कई राज्यों में गए हैं और वहां रह भी चुके हैं. वही, बनारसी आलम पांच भाषाओं में बातें भी करते हैं. यह रहते हैं मगही वाले क्षेत्र में, किंतु यह भोजपुरी ताबड़तोड़ बोलते हैं.

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पेड़-पौधा दिखाते बनारसी आलम (ETV Bharat)

प्रवास के दौरान सीखा अद्भुत भाषाई ज्ञान: मगही भी सटीक बोल लेते हैं. इसके अलावा यह मैथिली भी काफी अच्छा खासा बोलते हैं. उनका कहना है, कि वह मैथिली जहां बोली जाती है, उस क्षेत्र में रहे. इसी कारण मैथिली बोलना सीख लिया. इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में रहे तो बांग्ला बोलना सीख लिया. वह अच्छी खासी बांग्ला बोल लेते हैं.

70 की उम्र में कल्पनाशक्ति का जादू: इसके अलावा वे मामूली रूप से एक दो और भाषाओं पर उनकी पकड़ है, लेकिन कॉन्फिडेंस नहीं है, लेकिन यह पांच भाषाओं भोजपुरी, हिंदी, मगही, मैथिली और बांग्ला बोलने में अपनी अच्छी पकड़ रखते हैं. इस तरह से नन मेट्रिक पास एक 70 वर्ष की उम्र का यह शख्सियत न सिर्फ विभिन्न विषयों पर गाने की कल्पना कर उसे गा देता है.

"निर्गुण, सामाजिक गीत, अंधविश्वास के खिलाफ गीत, नाटक करने में भी काफी रुचि रखते हैं. इंसान का परिवर्तन विचार से होता है. मैंने महादलित समाज के लिए काफी कुछ किया है. महादलित को जमीन दिलाने के लिए काफी संघर्ष किया." -बनारसी आलम

जेपी आंदोलन के प्रति अगाध श्रद्धा और विचार: जेपी आंदोलन के प्रणेता जयप्रकाश नारायण के प्रति काफी श्रद्धा भी रही है. बनारसी यादव कम पढ़े-लिखे ज़रूर है. किंतु उन्हें क्या करना है, और क्या नहीं करना, यह जरूर पता है. यह बताते हैं, कि वह प्रकृति से काफी प्रेम करते हैं. यही वजह है कि वह प्रतिदिन बागवानी करते हैं. उनके फूस के झोपड़े की सजावट बागवानी से है.

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अवार्ड दिखाते बनारसी आलम (ETV Bharat)

प्रकृति प्रेम और समाज में मिलने वाली इज्जत: दर्जों प्रकार के फूल पौधे उन्होंने लगा रखे हैं, जिससे घर की खूबसूरती बनी रहती है. इसके अलावा पर्यावरण को लेकर अलग-अलग स्थान पर पेड़ पौधे भी लगाते हैं. महादलित समाज से जुड़ा यह शख्स अपने अजूबे कामों और नाम के लिए प्रसिद्ध है. बनारसी आलम वास्तविक रूप में मुसहर है, लेकिन इनकी इज्जत हर समाज के लोग करते हैं, कई तो इनके शिष्य भी बने हैं.

पारिवारिक विरासत और भिखारी ठाकुर से नाता: बनारसी बताते हैं कि कभी जमाने में विदेशिया का खूब नाम था, भिखारी ठाकुर खूब चर्चा में थे, तो हमारा नाम बनारसी रखा और मेरे भाई का नाम भिखारी. हमारे पिताजी सारंगी वादक थे. उस समय विदेशिया का खूब नाम था. वही, भिखारी ठाकुर भी चर्चा में थे, तो इसी को लेकर उन्होंने मेरा नाम बनारसी रखा और मेरे भाई का नाम भिखारी भुईया रखा.

"शुरू से ही हम अकेला चलते रहे हैं. आज भी एकला ही चल रहे हैं. हमारा मानना है, कि मानव- मानव एक समान है. किसी पर जुल्म मत करो. हम भी अपनी बिरादरी के लिए कुछ न कुछ हमेशा सोचते रहते हैं. इस बीच मैं किशोरावस्था से संगीत में रुचि रखनू शुरू कर दी. किंतु मैट्रिक पास नहीं कर सका." -बनारसी आलम

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