मुजफ्फरपुर में संस्कार की अनोखी मिसाल, 255 बरुआ ने एक साथ धारण किया जनेऊ
मुजफ्फरपुर में 255 बरुआओं ने एक साथ जनेऊ धारण कर उपनयन संस्कार पूरा किया. सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को जीवंत रखने का प्रतीक.

Published : February 27, 2026 at 2:39 PM IST
मुजफ्फरपुर : बिहार के मुजफ्फरपुर में सामाजिक‑धार्मिक परंपरा का एक बेहद रोचक और अनोखा नजारा देखने को मिला. गुरुवार 26 फरवरी को 255 बरुआ (यानी उपनयन संस्कार से पहले की अवस्था के युवा) ने एक साथ जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण कर पूरी उपनयन/संस्कार की परंपरा को जीवंत रूप से अपनाया.
अलग-अलग जिलों से आए लोगों ने धारण किया जनेऊ : कार्यक्रम का आयोजन धर्म समाज संस्कृत कॉलेज परिसर में किया गया. जहां राज्य के करीब एक दर्जन जिलों से आए बच्चों ने एक साथ जनेऊ धारण किया. इस विशेष अवसर पर वाराणसी और नेपाल से भी आचार्यों ने शिरकत की.

कार्यक्रम में 51 ब्राह्मणों की व्यवस्था थी : पूरे आयोजन में पूजा, मटकोर और यज्ञोपवीत संस्कार की सभी रस्में पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार निभाई गईं। संस्कार संपन्न कराने के लिए कुल 51 ब्राह्मणों की व्यवस्था की गई थी। आयोजन समिति की ओर से बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए ठहरने, भोजन और भोज की संपूर्ण व्यवस्था की गई थी। अभिभावकों को केवल बच्चों के वस्त्र लाने थे, शेष सभी व्यवस्थाएं समिति ने कीं।
सोसाइटी का 11वां सामूहिक संस्कार महोत्सव : सोसाइटी से जुड़े पंडित विनय पाठक ने बताया कि यह चाणक्य विद्यापति सोसाइटी का 11वां सामूहिक संस्कार महोत्सव है। अलग-अलग क्षेत्रों से आए बरुआ के लिए अलग-अलग आचार्यों की नियुक्ति की गई थी, ताकि शास्त्रीय विधि से संस्कार संपन्न हो सके।

धार्मिक परंपरा को सामूहिक स्वरूप में आगे बढ़ाया गया : संस्कार करा रहे आचार्यों ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि पूरे हर्षोल्लास और शुद्ध वैदिक परंपरा के साथ उपनयन संस्कार कराया गया. धार्मिक परंपरा को सामूहिक स्वरूप में आगे बढ़ाने की इस पहल की क्षेत्र में व्यापक सराहना हो रही है.
क्या है उपनयन संस्कार : उपनयन संस्कार हिंदू धर्म में एक प्राचीन संस्कार माना जाता है, जिसमें बच्चे को जनेऊ धारण कराया जाता है. यह जीवन के आध्यात्मिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों को स्वीकारने का एक प्रतीकात्मक चरण है. उपनयन संस्कार हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से एक है. जो बालक के विद्यारंभ (शिक्षा) और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत का प्रतीक है. 'उपनयन' का अर्थ है 'गुरु के पास ले जाना', अर्थात बालक को विद्या और ज्ञान के मार्ग पर ले जाना. इसमें बालक को जनेऊ धारण कराया जाता है और गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है.
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