साइंटिस्ट्स खोज रहे हाथियों की हिस्ट्री ज्योग्राफी, रिसर्च में बांधवगढ़ खोलेगा बिग एनिमल के छुपे राज
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया बांधवगढ़ रिजर्व में रिसर्च से बताएगा हाथियों की लाइफ स्टाइल. 3 साल की रिसर्च खोलेगा हरेक परत. अखिलेश शुक्ला की रिपोर्ट

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : September 2, 2026 at 7:43 PM IST
|Updated : September 4, 2026 at 7:54 AM IST
उमरिया : मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और संजय गांधी टाइगर रिजर्व में एक खास रिसर्च शुरू हो गई है. यहां हाथियों की मौजूदगी को देखते हुए, अब उन पर वैज्ञानिक शोध और अनुसंधान भी शुरू हो गए हैं. वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (WII) देहरादून के रिसर्चर इस पर काम कर रहे हैं. लगभग 3 सालों तक चलने वाले इस वैज्ञानिक शोध और अध्ययन में हाथियों के आवास, रहन-सहन, व्यवहार, मूवमेंट आदि से एशियाई हाथियों की ईकोलॉजी को और बेहतर तरीके से समझने का प्रयास किया जाएगा.

हाल ही में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के ताला ईको सेंटर में दिग्गज रिसर्चर्स के बीच इस रिसर्च को लेकर मंथन किया गया है, जिसमें कई अहम मुद्दों पर प्रेजेंटेशन भी दिया गया. हाथियों पर हो रही इस विशेष रिसर्च में कई अहम मुद्दों पर अध्ययन किया जा रहा है, जिसे हाथियों के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
WII देहरादून की टीम कर रही बांधवगढ़ में रिसर्च
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय बताते हैं, '' वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (WII) देहरादून के रिसर्चर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और संजय गांधी टाइगर रिजर्व के हाथियों पर रिसर्च कर रहे हैं. सेंट्रल इंडिया का जो एंट्री वाला रीजन है, उसमें पहले हाथी नहीं थे, लेकिन यहां बांधवगढ़ में हाथियों के आने से उनपर कई सारी रिसर्च की संभावनाएं अब बन रही हैं.''

हाथियों पर रिसर्च में क्या होगा?
रिसच में सबसे पहले यह तय होगा कि हाथियों को यहां क्या पसंद आया? अगर आवास पसंद आया, तो आवास में क्या पोटेंशियल है. हाथी किस रीजन में और कहां रहता है? क्या खाता है? उसका दिन भर का मोमेंट कैसा रहता है? इन सब सवालों के जवाब ढूंढने का प्रयास किया जाएगा. जब इन पर रिसर्च होगी तो हाथियों के संरक्षण की दिशा में कई लाभ होंगे.
रिसर्च में होगा रेडियो कॉलर का इस्तेमाल
इस रिसर्च के दौरान 6 हाथियों को जिसमें से चार बांधवगढ़ और दो संजय गांधी टाइगर रिजर्व के हैं, उन 6 हाथियों को रेडियो कॉलर दिया जाएगा. जो फीमेल लीडर हथिनी होती है, जो अपने हर्ड की लीडर होती है, उनको रेडियो कॉलर किया जाएगा, जिससे उनके हर एक मोमेंट का पता चलेगा. ये किधर जाते हैं, कहां रहते हैं, कब किस तरह का मूवमेंट होता है, कितना चलते हैं, कहां रुकते हैं, कितना समय तक रुकते हैं, बांधवगढ़ से संजय गांधी टाइगर रिजर्व जाते हैं या संजय गांधी टाइगर रिजर्व से बांधवगढ़ आते हैं, इन सब चीजों पर स्टडी हो जाएगी.''

हाथियों के कॉरिडोर्स की मिलेगी जानकारी
रिसर्च में इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि कॉरिडोर्स में हाथी किस तरह के कॉरिडोर का इस्तेमाल करते हैं, उनका कॉरिडोर कौन सा है, और उस कॉरिडोर में इनको क्या-क्या दिक्कतें आती हैं, ये भी समझने का प्रयास किया जाएगा.
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मानव-हाथी संघर्ष को समझने का प्रयास करेंगे एक्सपर्ट
इसके अलावा हाथियों पर इस तरह के रिसर्च से ये भी पता चलेगा कि हाथियों का कॉन्फ्लिक्ट (मानव-हाथी संघर्ष) क्यों होता है, क्या यचे संघर्ष गांव में हो रहा है? अगर गांव में हो रहा है तो किस गांव में हो रहा है, इसके पीछे के कारण क्या हैं, गांव के जंगल से जुड़े होने की वजह से ये संघर्ष हो रहा है या गांव में लगी किसी खास फसल की वजह से ऐसा हो रहा है. इस तरह के हॉटस्पॉट और हाथियों व मानव संघर्ष की वजहों को जानने का प्रयास भी इस रिसर्च में किया जाएगा.

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक कहते हैं, '' बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हाथियों को सुरक्षित आवास व स्थानीय समुदायों के साथ सह अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए, वैज्ञानिक अध्ययन व उसके आधार पर प्रभावी प्रबंधन रणनीति, बहुत महत्वपूर्ण है.''
हाथियों पर रिसर्च, किन बिंदुओं पर फोकस
बांधवगढ़ और संजय गांधी टाइगर रिजर्व के हाथियों पर चलने वाले वैज्ञानिक शोध एवं अनुसंधान पर होने वाले इस मंथन में WII देहरादून के रिसर्चर शिवम शर्मा ने प्रेजेंटेशन दिया,जो कि इस रिसर्च के प्रोजेक्ट एसोसिएट भी हैं, हाथियों पर होने वाले इस रिसर्च को लेकर वो बताते हैं :-
- यह शोध एवं अनुसंधान परियोजना मध्य प्रदेश के परिदृश्य में, विशेष रूप से बांधवगढ़-संजय गांधी टाइगर रिजर्व लैंडस्केप में, एशियाई हाथियों की पारिस्थितिकी, उनके विचरण व्यवहार और आवास उपयोग को समझने पर केंद्रित है.
- चूंकि हाथी मध्य प्रदेश के पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय समुदायों दोनों के लिए एक नया और उभरता हुआ विषय हैं, इसलिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह प्रजाति इस परिदृश्य में कैसे अनुकूलित हो रही है, इसका उपयोग कैसे कर रही है और लोग इसकी उपस्थिति पर किस तरह से प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
- यह अध्ययन हाथियों के आवास उपयोग, मौसमी विचरण पैटर्न, होम-रेंज डायनामिक्स और कॉरिडोर के उपयोग का आंकलन करेगा, विशेष रूप से संरक्षित क्षेत्रों, वन क्षेत्रों और कृषि परिदृश्यों के बीच हाथियों की आवाजाही का.
- जीपीएस टेलीमेट्री, रिमोट सेंसिंग और जीआईएस आधारित स्थानिक विश्लेषण का उपयोग करते हुए, यह शोध महत्वपूर्ण विचरण मार्गों, आवास उपयोग पैटर्न, खंडित आवासों और हाथियों की आवाजाही में संभावित बाधाओं की पहचान करेगा.
- हाथियों की पारिस्थितिकी के साथ-साथ, यह परियोजना हाथियों के प्रति लोगों की धारणाओं, अंतःक्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का भी परीक्षण करेगी, जिससे हाथियों के इस परिदृश्य में विस्तार के मानवीय आयाम को समझने में मदद मिलेगी.
- इस प्रकार यह अध्ययन हाथियों के विचरण पारिस्थितिकी, आवास गतिशीलता, कॉरिडोर कनेक्टिविटी, कृषि इंटरफेस और मानव-वन्यजीव अंतःक्रियाओं को एक साथ लाकर यह समझने का प्रयास करेगा कि हाथी इस परिदृश्य का उपयोग कैसे कर रहे हैं.
- इसके निष्कर्ष महत्वपूर्ण आवासों और कॉरिडोर, उभरते संघर्ष वाले हॉटस्पॉट और प्रबंधन प्राथमिकताओं की पहचान करने में मदद करेंगे, जो अंततः साक्ष्य-आधारित संरक्षण योजना का समर्थन करेगा और हाथियों एवं स्थानीय समुदायों के बीच स्थायी सह-अस्तित्व को बढ़ावा देगा.
- यह शोध भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की एक विशेष टीम के साथ 3 वर्षों (2026-28) की अवधि के लिए किया जा रहा है.
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रिसर्च से पहले मंथन में क्या रहा खास ?
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हाथियों की गतिविधियों और मानव-हाथी संघर्ष के वैज्ञानिक प्रबंधन के संबंध में हाथी कॉरिडोर, उनके आवास उपयोग व संघर्ष हॉटस्पॉट पर 3 साल तक चलने वाले वैज्ञानिक शोध व अनुसंधान पर मंथन किया गया है. इस मौके पर भारतीय वन्यजीव संस्थान WII देहरादून के शिवम शर्मा ने विस्तृत प्रेजेंटेशन भी दिया, अध्ययन दल में अरुण गोराटी, ब्रायन थॉम्पसन एवं वर्मा विशाल रविकांत भी शामिल रहे.

