बांधवगढ़ में सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से लाए जा रहे 'जंगल के इंजीनियर', तादाद बढ़ाने की तैयारी
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से 27 बायसन लाए जाएंगे बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, 21 जनवरी से बढ़ेगी जंगली इंजीनियरों की संख्या.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : January 11, 2026 at 5:36 PM IST
उमरिया: बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व पर्यटकों के लिए खास है क्योंकि यहां बाघ और हाथी के अलावा दूसरे वन्य प्राणियों की भी भरमार है. टाइगर रिजर्व में वन्य प्राणियों को स्वस्थ और हेल्दी रखने के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं. उसी के तहत सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से नए बायसन लाए जा रहे हैं. जिन्हें जंगल का इंजीनियर भी कहा जाता है, इंजीनियरों की संख्या बढ़ाने के लिए बांधवगढ़ में लगातार प्रयास हो रहे हैं.
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से लाए जा रहे इंजीनियर
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के उपसंचालक पीके वर्मा बताते हैं कि "सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से 27 बायसन लाने की तैयारी की जा रही है. जिसके लिए टीम का गठन कर दिया गया है. 17 से 18 जनवरी तक ये टीम सतपुड़ा टाइगर रिजर्व पहुंच जाएगी और 20 और 21 तारीख से बायसन की सप्लाई शुरू हो जाएगी.
फरवरी 2025 में पहले फेज में वहां से 23 बायसन लाए गए थे. 50 बायसन सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से लाने का प्लान है. जिसमें से 23 पहले ही आ चुके हैं. बाकी 27 बायसन दूसरे फेज में आएंगे. इस तरह से अब सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के 50 बायसन बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में नजर आएंगे."
बांधवगढ़ में क्या है तैयारी?
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से जो बायसन लाए जा रहे हैं उन्हें रखने के लिए क्या तैयारी है? इसे लेकर उप संचालक पीके वर्मा ने बताया कि "बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के कल्लवाह एनक्लोजर में उन्हें रखा जाएगा. इसी एनक्लोजर में पिछली बार पहले फेज में लाए गए 23 बायसन को रखा गया था. अब इस बार वहीं पर इन्हें भी रखा जाएगा. सुरक्षा के इंतजाम पूरे कर लिए गए हैं और एनक्लोजर को पूरी तरह से तैयार कर लिया गया है. उन्हें लाने के लिए हमारी टीम भी तैयार है."

एनक्लोजर में कब तक रखे जाएंगे ?
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के उप संचालक ने बताया कि "पिछली बार 23 बायसन लाए गए थे उन्हें एनक्लोजर में कुछ दिनों के लिए रखा गया था. मॉनिटरिंग करने के बाद सब कुछ सही पाए जाने पर उन्हें खुले जंगल में छोड़ दिया गया था. हालांकि अभी भी नियम के अनुसार उनकी मॉनिटरिंग लगातार हो रही है, उन पर बारीकी से नजर रखी जा रही है.
दूसरे फेज में आने वाले 27 बायसन को भी कल्लवाह एनक्लोजर में एक महीने लगभग रखा जाएगा और मॉनिटरिंग की जाएगी. सब कुछ सही पाए जाने पर इन्हें भी खुले जंगल में विचरण के लिए छोड़ दिया जाएगा. पहले फेज में लाए गए बायसन पूरी तरह से स्वस्थ हैं और अपने-अपने क्षेत्र में घूम रहे हैं. उनकी लगातार मॉनिटरिंग भी हो रही है, उन्हें बांधवगढ़ का जंगल बहुत रास आ रहा है."

क्यों लाए जा रहे बायसन ?
आखिर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से बायसन क्यों लाए जा रहे हैं, क्या बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बायसन नहीं है, इसे लेकर उपसंचालक पीके वर्मा बताते हैं कि "बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में पहले भी साल 2010-11 में 50 बायसन कान्हा से लाए गए थे और इन बायसन की संख्या इतने सालों में लगातार बढ़ी है और अब इनकी संख्या 200 से अधिक हो गई है.
मतलब बायसन की संख्या लगातार बांधवगढ़ में बढ़ रही है, लेकिन सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से बायसन लाने की वजह यह है कि अलग-अलग जगह से जब बायसन आएंगे तो उनकी ब्रीड चेंज होगी, नस्ल चेंज होगी, जिससे ये बायसन हेल्दी रह सकेंगे. कम बीमार होंगे इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी और लंबे समय तक ये टाइगर रिजर्व में सरवाइव कर पाएंगे. इस वजह से ब्रीड बदलने के लिए अलग-अलग नस्ल के बायसन लाए जा रहे हैं."
कड़ी निगरानी में एनक्लोजर
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के जिस कल्लवाह एनक्लोजर में बायसन को रखा जाना है, वो लगभग 20 हेक्टेयर रकबे में फैला हुआ है. इसका निर्माण इस तरह से किया गया है कि यहां हाथी, बाघ और तेंदुआ जैसे अन्य जंगली जानवर ना पहुंच सके. यहां करीब 8 फीट ऊंची सोलर फेंसिंग लगाई गई है, जहां पर बायसन को शिफ्ट करना है, शिफ्टिंग के बाद से 24 घंटे इन पर निगरानी रखी जाती है, तीन-तीन सुरक्षा श्रमिकों की ड्यूटी लगी रहती है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि हर समय एक वाहन उनके लिए उपलब्ध रहता है. अलग क्षेत्र में ऊंचाई पर मचान बनाए गए है, रेंजर एसडीओ से लेकर स्वयं डिप्टी डायरेक्टर और डायरेक्टर प्रतिदिन सुबह-शाम मॉनिटरिंग कर उसकी समीक्षा करने पहुंचते हैं.

जंगल का इंजीनियर है बायसन!
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर अनुपम सहाय बताते हैं कि "बायसन जंगल का इंजीनियर होता है. इसे ईकोसिस्टम इंजीनियर भी माना जाता है, दरअसल जो बायसन होते हैं, वो जंगल के माहौल को इस तरह से चेंज करते हैं कि दूसरे शाकाहारी जानवरों के रहने के मुफीद बन जाता है, जैसे बायसन जिसे गौर भी कहा जाता है. वह भारी मात्रा में घास को खाते हैं, झाड़ियों को भी खाते हैं, जिससे घास की ऊपरी परत को खाने के बाद उसे छोटा रखते हैं."
बायसन जंगल का करता है विस्तार
उन्होंने आगे बताया कि "इससे फायदा यह होता है कि घास के मैदान में ताजा घास होती है और जब यह छोटी घास होती हैं. जो चीतल, सांभर और हिरण के लिए भोजन का मुख्य स्रोत बन जाता है. इसके अलावा बायसन जंगल के दूसरे क्षेत्रों में जहां-जहां तक भ्रमण करते हैं, वहां तक गोबर के माध्यम से बीजों का फैलाव होता है. गोबर प्राकृतिक खाद का काम करता है और बीज से जंगल का विस्तार भी होता है."
छोटे जलीय जीव के लिए बेहतर आवास
इसके अलावा बायसन जो भारतीय गौर होते हैं इनका वजन काफी भारी भरकम होता है, ये जहां से भी गुजरते हैं. वहां झाड़ियां और जंगलों के बीच उनके खुरों से पगडंडी बन जाती है, जमीन दब जाती है. इसके अलावा वनस्पतियों से भी रास्ते बन जाते हैं. उनके पैरों से जो निशान बनते हैं. वहां बारिश का पानी रुकता है. जो छोटे-छोटे जलीय जीव कीड़े, मेंढक जैसे जीवों के लिए बेहतर आवास उपलब्ध कराता है. साथ ही घने जंगल में जो पगडंडी बन जाती है उनके चलने छोटे जानवरों के आने-जाने के लिए सुगम रास्ता का भी काम करता है.
मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है
बायसन जब जंगल में घूमते हैं तो मल मूत्र त्यागते हैं. इससे मिट्टी में नाइट्रोजन और कई अन्य खनिज को वापस लौटाते हैं जो जंगल के मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखता है. जिससे जंगल का पूरा ईको सिस्टम स्वस्थ रहता है. इसलिए इन्हें जंगल का इंजीनियर कहा जाता है.
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बायसन में एक खास बात यह भी है कि जहां बायसन रहते हैं वहां बाघों के लिए भी बेहतर माहौल रहता है, क्योंकि बाघ एक मांसाहारी जीव है और इसे सरवाइव करने के लिए काफी तादाद में मांस चाहिए. बायसन भारी भरकम होते हैं एक बार एक बायसन का शिकार अगर बाघ कर लेता है तो उसके पूरे परिवार को कई दिनों तक का भोजन मिल जाता है. इसलिए माना जाता है कि जहां बायसन होते हैं वहां बाघों की प्रजनन दर भी बेहतर होती है.

