जैसलमेर में अति दुर्लभ बीमारी 'स्टोन मैन सिंड्रोम' का मरीज मिला, पूरे विश्व में 700 से 800 मामले
इस बीमारी में शरीर में दूसरी तरह का अस्थि ढांचा बनने लगता है. मांसपेशियां और सॉफ्ट टिश्यू कठोर होकर हड्डी का रूप लेने लगते हैं.

Published : March 12, 2026 at 2:55 PM IST
|Updated : March 12, 2026 at 3:26 PM IST
जैसलमेर : सीमावर्ती जिला जैसलमेर में पहली बार एक अति दुर्लभ बीमारी एफओपी (Fibrodysplasia Ossificans Progressiva) का मरीज चिह्नित किया गया है. ये मरीज 9 साल का बालक है और जैसलमेर का रहने वाला है. चिकित्सा जगत में यह बीमारी इतनी दुर्लभ मानी जाती है कि पूरी दुनिया में इसके बहुत कम मामले दर्ज हैं. जैसलमेर में सामने आया यह मामला डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग के लिए भी चर्चा का विषय बन गया है. इस बीमारी को आम बोलचाल में 'स्टोन मैन सिंड्रोम' भी कहा जाता है.
जैसलमेर के राजकीय जवाहिर अस्पताल के वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. दिनेश जांगिड़ ने बताया कि हाल ही में 10 मार्च को जैसलमेर के मेडिकल कालेज में जोधपुर के एम्स अस्पताल से आई टीम की ओर से एक महत्वपूर्ण जागरूकता कार्यशाला आयोजित की गई थी. इस कार्यशाला का उद्देश्य राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति 2021 की पृष्ठभूमि और उत्कृष्टता केंद्रों के कामकाज को समझना था. इस कार्यशाला में बड़ी संख्या में विभिन्न रोगों से ग्रसित मरीजों ने डॉक्टर्स से परामर्श लिया. उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला में आए एक 9 वर्षीय मरीज की रिपोर्ट्स आदि देखने के बाद एफओसी चिन्हित किया गया. यह अति दुर्लभ बीमारी है और अभी पहला केस ही सामने आया है. इसका इलाज भारत में अभी सम्भव नहीं है. ऐसे में संबंधित विभाग की ओर से दिल्ली में उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर इसके बारे में जानकारी दी गई है. इस कार्यशाला में मुख्य रूप से यह भी महसूस किया गया कि जैसलमेर जैसे सीमावर्ती क्षेत्र में भी दुर्लभ बीमारियों के कई मरीज हो सकते हैं, जिनका गहन मूल्यांकन आवश्यक है.
'स्टोन मैन सिंड्रोम' क्या है : डॉ. दिनेश जांगिड़ ने बताया कि FOP एक आनुवांशिक और अत्यंत दुर्लभ रोग है, जिसमें शरीर की मांसपेशियां, लिगामेंट और टिश्यू धीरे-धीरे हड्डियों में बदलने लगते हैं. इसी वजह से मरीज का शरीर धीरे-धीरे जकड़ता चला जाता है और उसकी सामान्य गतिविधियां प्रभावित होने लगती हैं. इस बीमारी में शरीर के अंदर दूसरी तरह का अस्थि ढांचा बनने लगता है. मांसपेशियां और सॉफ्ट टिश्यू धीरे-धीरे कठोर होकर हड्डी का रूप लेने लगते हैं, जिससे मरीज के शरीर की गतिशीलता कम होती चली जाती है.
नहीं है कोई स्थाई इलाज : उन्होंने बताया कि यह बीमारी अक्सर बचपन में ही दिखाई देने लगती है. कई बच्चों में जन्म के समय ही इसके शुरुआती संकेत देखे जा सकते हैं, जैसे पैर के बड़े अंगूठे की असामान्य बनावट या टेढ़ापन. समय के साथ शरीर के अलग-अलग हिस्सों में सूजन या दर्द के साथ छोटी-छोटी गांठें बनने लगती हैं और बाद में ये हिस्से हड्डियों में बदलने लगते हैं. डॉक्टरों के अनुसार इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसका अभी तक कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है. चिकित्सा विज्ञान में अभी केवल इसके लक्षणों को नियंत्रित करने और मरीज को सावधानी के साथ जीवन जीने की सलाह दी जाती है. कई मामलों में मामूली चोट, सर्जरी या बार-बार दिए जाने वाले इंजेक्शन भी शरीर में नई हड्डी बनने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं. यही कारण है कि ऐसे मरीजों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है.
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डॉ. जांगिड़ ने बताया कि इस बीमारी की सही पहचान करना भी कई बार चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि शुरुआती लक्षण सामान्य सूजन या गांठ की तरह दिखाई देते हैं. कई बार मरीज को सही बीमारी का पता चलने में काफी समय लग जाता है, इसीलिए अगर बच्चों में बार-बार सूजन, दर्द या असामान्य गांठ जैसी समस्या दिखाई दे तो विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराना जरूरी होता है. डॉक्टरों का मानना है कि ऐसे मामलों की जानकारी सामने आने से लोगों में जागरूकता बढ़ती है और समय रहते मरीजों को उचित सलाह व देखभाल मिल सकती है.
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पूरे विश्व में 700-800 मामले : विशेषज्ञों का कहना है कि FOP दुनिया की सबसे दुर्लभ बीमारियों में से एक है. अनुमान के अनुसार यह बीमारी लगभग 15 से 20 लाख लोगों में से केवल एक व्यक्ति में पाई जाती है. वैश्विक स्तर पर अब तक इसके लगभग 700 से 800 मामलों की ही पुष्टि हुई है. भारत में भी इसके बहुत कम केस सामने आए हैं और अधिकतर मामलों की जानकारी मेडिकल रिसर्च या अस्पतालों की रिपोर्ट के माध्यम से ही सामने आती है.

