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सिप्रा, शिप्रा या फिर क्षिप्रा के नाम को लेकर इतना कन्फ्यूजन क्यों? मालवा की मोक्षदायिनी के नाम का सस्पेंस खत्म

मालवा की मोक्षदायिनी नदी सिप्रा, शिप्रा या फिर क्षिप्रा का नाम समय अनुसार बदलता रहा लेकिन अब इसके नाम को लेकर क्यों छिड़ी है बहस. मोहन यादव ने दूर किया कन्फ्यूजन. सरकारी दस्तावेजों में अब क्षिप्रा की जगह लिखा जाएगा शिप्रा नदी.

SIPRA SHIPRA KSHIPRA CORRECT NAME
क्या है सही नाम सिप्रा, शिप्रा या फिर क्षिप्रा (ETV Bharat GFX)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : July 5, 2026 at 6:15 PM IST

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Updated : July 5, 2026 at 8:23 PM IST

9 Min Read
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उज्जैन: मालवा के पठार से निकलने वाली एक ऐसी नदी जिसके कई घाटों पर हर रोज हजारों श्रद्धालुओं का स्नान, दान और पुण्य के लिए तांता लगा रहता है, जो मालवा की मोक्षदायिनी कही जाती है, जहां हर 12 साल में दुनिया का सबसे बड़ा महापर्व सिंहस्थ महाकुंभ का आयोजन होता है, ऐसी अति प्राचीन नदी के सही नाम और उसके उच्चारण को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ी है.

सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन स्थित मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी अपने नाम को लेकर चर्चा में आ गई. इसका कारण गुरुवार को भोपाल में हुई एक बैठक है, जिसमें एक अधिकारी द्वारा फाइल में नदी का नाम क्षिप्रा शब्द लिखने पर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने आपत्ति जताई. इसके बाद उन्होंने धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए मध्य प्रदेश के सरकारी दस्तावेजों में अब क्षिप्रा की जगह नदी का नाम शिप्रा लिखने के निर्देश दिए.

ज्योतिषाचार्य पंडित अक्षत व्यास ने दिया स्कंद महापुराण का हवाला (ETV Bharat)

क्या है मालवा की मोक्षदायिनी का सही नाम सिप्रा, शिप्रा या फिर क्षिप्रा

मालवा की मोक्षदायिनी के नाम को लेकर लोगों के अलग-अलग मत है. अब जब इसके सही नाम और उच्चारण को लेकर बहस हो रही है तो ईटीवी भारत ने भी धर्म नगरी उज्जैन के वैदिक विद्वानों और साहित्यकारों से चर्चा की तो 3 नाम निकलकर सामने आए. सिप्रा, शिप्रा और क्षिप्रा. समय के अनुसार ये नाम बदलते रहे और पुराणों के अलावा कई प्राचीन धर्मग्रंथों में अलग-अलग उल्लेख मिलता है तो कई जगह शिप्रा और क्षिप्रा भी एक साथ लिखा गया है.

संस्कृत नाम है क्षिप्रा

वास्तव में देखा जाए तो इस नदी का प्राचीन नाम क्षिप्रा ही है और यह संस्कृत नाम है. संस्कृत में क्षिप्रा शब्द का अर्थ तेज या तेज गति से बहने वाली होता है. प्राचीन समय में दिया गया यह नाम नदी के मूल स्वरूप को बताता है. यह एक तेज और स्वच्छ प्रवाह धारा के रूप में बहती थी. पुराणों और वैदिक साहित्य सहित प्राचीन ग्रंथों में क्षिप्रा नाम का व्यापक रूप से प्रयोग किया गया है.

SKANDA MAHAPURAN AVANTI KHAND SHLOK
पुराणों में मिलता है दोनों शब्द शिप्रा और क्षिप्रा का उल्लेख (ETV Bharat)

धीरे-धीरे क्षिप्रा नाम का उल्लेख कम हो गया और यह बोलते-बोलते शिप्रा हो गया. दोनों नाम क्षिप्रा नदी और शिप्रा नदी एक ही जलमार्ग को दर्शाते हैं. क्षिप्रा नाम आज मध्य प्रदेश और पूरे भारत में व्यापक रूप से प्रचलित है. लेकिन कई बार लोग अभी भी इसे शिप्रा कहकर बुलाते हैं और लिखते भी हैं. यह गलत कहीं से भी नहीं है क्योंकि क्षिप्रा संस्कृत नाम है.

साहित्यकार ने कहा शिप्रा नाम ही सही

पद्म श्री से सम्मानित साहित्यकार डॉ भगवती लाल राजपुरोहित कहते हैं, "इस पवित्र नदी को तीन नामों से जाना गया है, सिप्रा, शिप्रा और क्षिप्रा. ये तीनों नाम सही हैं और समय अनुसार नदी के स्वरूप और क्षेत्रीय भाषा के अनुसार नाम बदलते गए. अलग-अलग जगहों पर इस नदी के नाम का उल्लेख अलग-अलग मिलता है. अगर वास्तविक नाम की बात आती है तो शिप्रा इसका मूल नाम है लेकिन वर्तमान समय में संस्कृत नाम क्षिप्रा ज्यादा प्रचलित है."

SKANDA MAHAPURAN AVANTI KHAND
मालवा की मोक्षदायिनी के नाम का सस्पेंस खत्म (ETV Bharat)

'मालवा में कहा गया सिप्रा'

साहित्यकार डॉ भगवती लाल राजपुरोहित कहते हैं, "सिप्रा नाम दरअसल मालवा में श को स उद्बोधन के कारण किया जाता है. मालवा में इस नदी का नाम 'सपरा' पड़ा जिससे मालवी बोली में सिप्रा समझा गया. इसका महाकवि कालिदास ने भी एक जगह उपयोग किया है लेकिन बात जब शिप्रा शब्द की आती है तो महाकवि कालिदास ने अपने ग्रंथ मेघदूतम में शिप्रा शब्द वर्णन किया है. वहीं बात यदि क्षिप्रा शब्द की होती है तो समय अनुसार जब जब नदी वर्षा काल में अपने तांडव स्वरूप में देखी गई तो इसका नाम क्षिप्रा कहा जाने लगा क्योंकि क्षिप्रा का अर्थ है तेज प्रवाह."

'पुराणों में मिलता है दोनों शब्दों का उल्लेख'

ज्योतिषाचार्य पंडित अक्षत व्यास कहते हैं, "इसमें किसी प्रकार से भ्रमित होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है. यदि हम पारंपरिक रूप से पुराण का अध्ययन करें तो स्कंद महापुराण के अवंती खंड में इस नदी का उल्लेख है. जिसमें पूरे उज्जैन के महत्व को बताया गया है. इसके अलावा यहां दोनों ही शब्द शिप्रा और क्षिप्रा का उल्लेख मिलता है."

UJJAIN MALWA RIVER CORRECT NAME
ज्योतिषाचार्य पंडित अक्षत व्यास ने बताए सही नाम (ETV Bharat)

पंडित अक्षत व्यास कहते हैं, "स्कंद महापुराण के अवंति खंड में जितने श्लोक हमें प्राप्त होते हैं, लगभग सभी में शिप्रा और क्षिप्रा का उल्लेख मिलता है. इसलिए दोनों ही शब्दों में भेद नहीं किया गया है. आप चाहे शिप्रा कहें या क्षिप्रा कहें, दोनों ही स्थिति में आप उस मां को ही संबोधित कर रहे हैं."

ज्योतिषाचार्य अक्षत व्यास बताते हैं, "साहित्यिक रूप से महाकवि कालिदास अपने ग्रंथों में सिप्रा और शिप्रा का वर्णन करते हैं. वहीं अगर हम परंपरागत तीर्थ पुरोहितों की बात करें जो कई पीढ़ियों से नदी के घाट किनारे तर्पण पूजन करवा रहे हैं तो उनके पास पूर्वजों के हस्तलिखित अगर हम कोई भी पुस्तक या कोई भी मंत्र आदि देखते हैं या कोई भी कर्म कराने की विधि देखते हैं तो उसमें मां शिप्रा का जो नाम लिखा है वह क्षिप्रा लिखा हुआ है."

उद्गम और ऐतिहासिक महत्व

मध्य प्रदेश के इंदौर और धार जिले में स्थित विंध्याचल पर्वत की काकड़ी टेकड़ी नामक पहाड़ी से शिप्रा नदी का उद्गम होता है. यह नदी प्रदेश के देवास, उज्जैन, रतलाम और मंदसौर शहर से होकर गुजरती है. यह लगभग 195 किलोमीटर का सफर तय कर मंदसौर के पास चंबल नदी में मिल जाती है.

यह भारत की एकमात्र उत्तर-वाहिनी नदी है जो दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बहती है. इस नदी के किनारे उज्जैन शहर में हर 12 साल में प्रसिद्ध सिंहस्थ कुंभ मेला आयोजित होता है.

धार्मिक और पौराणिक महत्व के कारण इसे मालवा की गंगा और मालवा की मोक्षदायिनी भी कहा जाता है. यह मध्य प्रदेश में बहने वाली एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक नदी है. ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस नदी में अमृत की बूंदें गिरी थीं, इस कारण इसके जल में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

कई पुराणों में है शिप्रा नदी की महिमा का उल्लेख

महाभारत, शिव पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में इस नदी की महिमा का गुणगान है. संस्कृत साहित्य के महान कवि कालिदास ने अपने महाकाव्य मेघदूत में भी इस नदी का वर्णन किया है. यहीं पर स्थित ऋषि सांदीपनि के आश्रम में भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा ने अपनी शिक्षा ग्रहण की थी. उज्जैन में महाकाल मंदिर के पास क्षिप्रा (शिप्रा) नदी बहती है. यह पवित्र नदी मंदिर से बहुत ही कम दूरी पर स्थित है. इसके प्रमुख घाट जैसे रामघाट महाकाल मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर है.

मोहन यादव ने कैसे दूर किया शिप्रा और क्षिप्रा का संशय?

सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन स्थित मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी अपने नाम को लेकर चर्चा में आ गई. इसका कारण हाल ही में भोपाल में हुई एक बैठक है, जिसमें एक अधिकारी द्वारा एक फाइल में नदी का नाम क्षिप्रा शब्द लिखने पर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने आपत्ति जताई थी. इसके बाद अब मध्य प्रदेश के सरकारी दस्तावेजों में अब क्षिप्रा की जगह नदी का नाम शिप्रा लिखा जाएगा.

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की आपत्ति और यजुर्वेद और कालिदास के ग्रंथों के रेफरेंस के बाद गुरुवार को मंत्रालय में आयोजित नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) की एक महत्वपूर्ण उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने यह दिलचस्प और बड़ा फैसला लिया.

इस बैठक के दौरान अधिकारियों द्वारा मुख्यमंत्री के सामने एक डिजिटल प्रेजेंटेशन पेश किया जा रहा था. इस प्रेजेंटेशन में जब स्क्रीन पर नदी का नाम क्षिप्रा लिखा हुआ सामने आया था. इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सरकारी अधिकारियों की गलती को सनातन ग्रंथों के संदर्भ के साथ एआई का हवाला देकर उसे ठीक करवाया.

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बैठक में तुरंत अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे एआई से दोबारा पूछें. इस बार एआई से कालिदास के ग्रंथों और यजुर्वेद के रेफरेंस के आधार पर सवाल किया गया. एआई ने इन धार्मिक और ऐतिहासिक ग्रंथों के आधार पर तुरंत अपनी पहले दी गई जानकारी को गलत माना. एआई ने इस बार स्पष्ट किया कि प्राचीन यजुर्वेद में ‘शिप्रे: अवे: पत्र:’ कहकर ऋषियों ने इस पवित्र नदी का स्मरण किया है. इसके अलावा महाकवि कालिदास के इंदुमती स्वयंवर के प्रसंग में भी ‘शिप्रातरंगानिलकम्पि तासु’ लिखकर इसका उल्लेख किया गया है. इसके अलावा कालिदास के ही मेघदूत में ‘शिप्रावातः प्रियतम इवं प्रार्थनाचाटुकारः’ कहकर शिप्रा नदी से उठने वाली पावन और शीतल पवन का जिक्र किया गया है.

Last Updated : July 5, 2026 at 8:23 PM IST