मध्य प्रदेश में सत्ता की पहचान रहा हाथी, म्यूजियम में रखा 5 लाख साल पुराना ब्रेन फॉसिल
शैलचित्रों, जीवाश्मों, मंदिरों, सिक्कों और राजचिह्नों में सहेजी गई गज परंपरा, बांधवगढ़ के गौतम हाथी से लेकर गणेश आराधना तक मध्य प्रदेश में हाथियों का इतिहास पुराना. उज्जैन से राहुल सिंह राठौड़ की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : August 23, 2026 at 5:37 PM IST
उज्जैन: मध्य प्रदेश की पहचान सिर्फ बाघ, जंगल और नदियों तक सीमित नहीं है. मध्य प्रदेश की धरती अपने भीतर हाथियों के अस्तित्व की ऐसी लंबी कहानी भी समेटे हुए है, जिसकी कड़ियां लाखों वर्ष पुराने जीवाश्मों से लेकर प्रागैतिहासिक शैलचित्रों, बौद्ध स्तूपों, मंदिर स्थापत्य, राजकीय मुद्राओं, लोकगाथाओं और आज के वन्यजीव संरक्षण तक जुड़ती है. नर्मदा घाटी से मिले 5 लाख साल पुराने प्रागैतिहासिक हाथी के मस्तिष्क का जीवाश्म इसका मूल आधार है. जबकि भीमबैठका और अन्य शैलाश्रयों के चित्र बताते हैं कि मानव समाज ने हजारों साल पहले ही गज को अपनी दृश्य और सांस्कृतिक स्मृति में दर्ज कर लिया था.
पद्मश्री पुराविद डॉ नारायण व्यास ने ETV भारत को बताया "इसी व्यापक विरासत को सामने लाने के लिए प्रोजेक्ट गजलोक ने मध्य प्रदेश में हाथी से जुड़ी गाथाओं, युद्ध में उसकी भूमिका, कला संस्कृति, लोकपरंपराओं और ऐतिहासिक संदर्भों का दस्तावेजीकरण शुरू कर दिया है. बीते विश्व एलीफेंट दिवस पर राजधानी भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में इस पहल के माध्यम से प्रदेश की गज विरासत को राष्ट्रीय स्तर के अभिलेख का हिस्सा बनाने की भी अपील की गई थी."
5 लाख साल पुराना हाथी का मस्तक उज्जैन में
मध्य प्रदेश की गज विरासत की सबसे रोमांचक कड़ी नर्मदा घाटी है. उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं पुराविद डॉ. रमण सोलंकी ने ETV भारत को बताया "नर्मदा तट केवल मानव सभ्यता और पुरातात्विक अवशेषों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यहां प्रागैतिहासिक जीव जंतुओं के जीवाश्म भी मिले हैं. नरसिंहपुर क्षेत्र के बरमान घाट देवाकछार से पद्मश्री विष्णु श्रीधर वाकणकर के खोज अभियान के दौरान विशाल प्रागैतिहासिक हाथी के मस्तिष्क का जीवाश्म ढूंढा गया था. जिसे 1979 में उज्जैन लाया गया और सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के संग्रहालय में केमिकल ट्रीटमेंट कर सुरक्षित एक विशाल बॉक्स में पैक कर रखा गया है.
यह जीवाश्म Palaeoloxodon Namadicus से संबंधित माना जाता है, जिसे भारतीय उपमहाद्वीप के प्रागैतिहासिक हाथियों की महत्वपूर्ण प्रजाति बताया गया है. वैज्ञानिक साहित्य में इस प्रजाति के अवशेष मध्य भारत और नर्मदा घाटी से जुड़े हैं. जनता इसे जल्द ही आगामी 3 माह बाद देख सकेगी अभी संग्रहालय के जीर्णोद्धार का काम चल रहा है.

करोड़ों वर्ष का इतिहास, लेकिन हाथियों के जीवाश्म लाखों वर्ष पुराने
डॉ रमण सोलांकी ने कहा मध्य प्रदेश का भूगर्भीय इतिहास करोड़ों वर्ष पुराना है. मालवा और नर्मदा क्षेत्र की धरती ने अलग-अलग भूवैज्ञानिक कालों में समुद्री और स्थलीय परिवर्तनों को देखा है, लेकिन हाथियों से जुड़े जिन प्रमुख जीवाश्मों की चर्चा आज होती है, वे मुख्यतः प्लीस्टोसीन काल के हैं, यानी लाखों साल पुराने. इसलिए करोड़ों वर्ष पुरानी गज विरासत को मध्य प्रदेश की करोड़ों वर्ष पुरानी भूगर्भीय पृष्ठभूमि और लाखों वर्ष पुराने हाथी जीवाश्मों को जोड़कर समझना ज्यादा साइंटिफिक होगा."

शैलचित्रों ने हजारों वर्ष पहले लिख दी थी गज की कहानी
पद्मश्री पुराविद डॉ. नारायण व्यास बताते हैं कि "हाथियों का भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रहा है. मध्य प्रदेश के अलग-अलग शैलाश्रयों में हाथियों के चित्र इस सांस्कृतिक निरंतरता का महत्वपूर्ण प्रमाण है. रायसेन के निकट हाथी टोल शैलाश्रय, मंदसौर के भानपुरा क्षेत्र के चिब्बड़ नाला, भोपाल के आसपास भीमबैठका सहित अनेक शैलाश्रयों में हाथियों के चित्र मिलते हैं. इन चित्रों के माध्यम से यह संकेत मिलता है कि प्राचीन मानव समाज हाथी को देखता, पहचानता और अपनी कलात्मक स्मृति में संरक्षित करता था."
सांची के तोरणों से लेकर विदिशा के हाथीदांत कारीगरों तक
पुराविद प्रोफेसर डॉ रमण सोलांकी ने यह भी बताया "मध्य प्रदेश की गज विरासत का अगला अध्याय सांची में दिखाई देता है. विश्व प्रसिद्ध सांची स्तूप के तोरण द्वारों पर हाथियों के अनेक सुंदर अंकन मिलते हैं. विदिशा प्राचीन काल में हाथीदांत कारीगरी के लिए भी प्रसिद्ध था और हाथीदांत के कारीगरों से जुड़े उल्लेख सांची के स्थापत्य से संबंधित अभिलेखीय परंपरा में मिलते हैं.

सांची के तोरणों पर हाथियों का बार बार चित्रण इस बात का प्रमाण है कि बौद्ध कला में भी हाथी का गहरा प्रतीकात्मक महत्व था. बौद्ध साहित्य में छदंत जातक हाथी से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपरा प्रस्तुत करता है. यानी मध्य प्रदेश में हाथी का इतिहास सिर्फ जंगल में विचरण करने वाले पशु का इतिहास नहीं है, यह धर्म, दर्शन, कला और स्थापत्य का भी इतिहास है.
गोंड राजचिह्न से धार की मुद्रा तक मध्य प्रदेश में सत्ता की पहचान रहा गज
मध्य प्रदेश के इतिहास में हाथी का संबंध केवल धर्म से नहीं, सत्ता से भी रहा. राजाओं की मुद्राओं पर गज शक्ति और समृद्धि का प्रतीक रहा है. गोंड राजसत्ता से जुड़े राजकीय प्रतीकों में हाथी की मौजूदगी और धार राज्य की मुद्रा पर हाथी का अंकन बताते हैं कि गज को शक्ति और प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया. गढ़ा मंडला और गिन्नौरगढ़ से जुड़ी राजकीय पहचान इस लंबी परंपरा की अलग-अलग कड़ियां हैं.

प्राचीन भारतीय शासकों ने भी हाथी को अपनी राजनीतिक और आर्थिक पहचान बनाया. उज्जैन और मालवा की ऐतिहासिक परंपरा में हाथी राजकीय वैभव और समृद्धि के प्रतीक के रूप में दिखाई देता है. अलग-अलग कालखंडों की मुद्राओं पर हाथी के अंकन इस बात की पुष्टि करते हैं कि गज सिर्फ धार्मिक प्रतीक नहीं था, बल्कि राजसत्ता, सामर्थ्य और समृद्धि का प्रतीक भी था."
मंदिरों की नींव से शिखर तक गज बना स्थापत्य का प्रहरी
भारतीय मंदिर स्थापत्य में हाथी की उपस्थिति अत्यंत व्यापक है. मंदिरों के अधिष्ठान और आधार पर हाथियों की कतारें कई स्थापत्य परंपराओं में दिखाई देती हैं. पुराविद डॉ. नारायण व्यास बताते हैं कि "भारतीय मंदिर स्थापत्य में हाथियों की श्रृंखला का सबसे प्रभावशाली उदाहरण महाराष्ट्र के एलोरा स्थित कैलाश मंदिर में दिखाई देता है, जहां हाथियों की आकृतियां ऐसा दृश्य बनाती हैं, मानो वे विशाल कैलाश को अपने कंधों पर संभाले हुए हों. मध्य प्रदेश में महेश्वर के घाट और अहिल्याबाई होलकर द्वारा निर्मित धार्मिक स्थापत्य में भी हाथियों की श्रृंखलाएं दिखाई देती है. यहां गज को समृद्धि, शक्ति और शुभता से जोड़कर देखा गया."

इंद्र के ऐरावत से गणेश तक धर्म में गज की सबसे लंबी यात्रा
प्रो. पुराविद डॉ रमण सोलांकी के अनुसार "हाथी का धार्मिक महत्व भारतीय परंपरा में अत्यंत गहरा है. पौराणिक परंपरा में इंद्र का वाहन ऐरावत है. वहीं गणेश आराधना ने हाथी के स्वरूप को भारतीय धार्मिक चेतना का स्थायी हिस्सा बना दिया. गजलक्ष्मी के रूप में भी हाथी समृद्धि और शुभता का प्रतीक बनता है. बौद्ध और जैन परंपराओं में भी हाथी से जुड़े प्रतीक और कथाएं मिलती हैं. इस दृष्टि से गज की यात्रा बेहद असाधारण है, प्रागैतिहासिक जीवाश्म से पौराणिक ऐरावत तक, शैलचित्र से मंदिर तक और राजमुद्रा से लोकविश्वास तक."

और फिर आता है बांधवगढ़ का गौतम
प्रागैतिहासिक हाथियों की कहानी के बाद मध्य प्रदेश का आधुनिक अध्याय बांधवगढ़ से जुड़ता है. बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व का गौतम हाथी प्रदेश में हाथियों की वर्तमान उपस्थिति का एक जाना पहचाना नाम है. बांधवगढ़ में हाथियों के व्यवहार, आवाजाही और संरक्षण पर वैज्ञानिक निगरानी भी बढ़ी है. 2025 में बांधवगढ़ के जंगली हाथियों का फोटो डॉसियर जारी किया गया. जिसमें शुरुआती चरण में 24 अलग-अलग हाथियों की पहचान की गई थी. इस तरह प्रदेश में गज की कहानी अब सिर्फ पुरातत्व तक सीमित नहीं है, यह आधुनिक वन्यजीव विज्ञान और संरक्षण तक पहुंच चुकी है.
एमपी में हाथियों की वापसी, अब विरासत के साथ संरक्षण की चुनौती
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आता है. हाथी मध्य प्रदेश के अधिकांश हिस्सों के लिए पारंपरिक रूप से वैसा व्यापक वन्यजीव नहीं रहा है, जैसा असम, कर्नाटक, केरल, ओडिशा या झारखंड जैसे राज्यों में है, लेकिन पिछले सालों में मध्य प्रदेश के पूर्वी और दक्षिण पूर्वी वन क्षेत्रों में हाथियों की मौजूदगी और आवाजाही बढ़ी है. भारत सरकार की हालिया SAIEE 2021-25 रिपोर्ट के अनुसार "मध्य भारत एवं पूर्वी घाट परिदृश्य में प्रदेश में हाथियों की अनुमानित संख्या 97 बताई गई है, जबकि 2017 के आंकड़े में यह संख्या 7 दर्ज थी. यह तुलना हाथियों की बढ़ती उपस्थिति की ओर महत्वपूर्ण संकेत देती है.

भारत दुनिया के जंगली एशियाई हाथियों का लगभग 60 प्रतिशत संभालता है
मध्यप्र देश की गज विरासत को वैश्विक संदर्भ में देखने पर तस्वीर और बड़ी हो जाती है. भारत में दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत जंगली एशियाई हाथी पाए जाते हैं. 2021 से 2025 की नवीन वैज्ञानिक आबादी आंकलन प्रक्रिया में भारत में जंगली हाथियों की संख्या 22,446 आंकी गई है. देश में 33 Elephant Reserves और 150 चिन्हित हाथी कॉरिडोर हैं. यानी भारत हाथियों के वैश्विक संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है और इस भारतीय परिदृश्य में मध्य प्रदेश का महत्व केवल वर्तमान हाथियों की संख्या से तय नहीं किया जा सकता. यहां की विशेषता इसकी पुरातात्विक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक निरंतरता है.
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प्रोजेक्ट गजलोक राष्ट्रीय दस्तावेज में बदलने की कोशिश
यही वह बिंदु है जहां प्रोजेक्ट गजलोक महत्वपूर्ण हो जाता है. INTACH भोपाल चैप्टर पिछले एक साल से मध्य प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में हाथियों से जुड़ी कहानियों, लोकगाथाओं, युद्धों में उनकी भूमिका, कला, संस्कृति और ऐतिहासिक प्रमाणों का दस्तावेजीकरण कर रहा है. कार्यक्रम में Gaja-Lok Wild Sacred Eternal फिल्म का विमोचन भी किया गया. इस पहल का उद्देश्य केवल हाथियों के संरक्षण की बात करना नहीं है, बल्कि हाथी से जुड़ी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत कहानियां, स्मृतियां, लोकविश्वास, चित्र, स्थापत्य, राजचिह्न और स्थानीय इतिहास को भी दर्ज करना है.
INTACH ने लोगों से भी अपील की है कि उनके पास हाथियों से संबंधित कोई पुरानी कथा, तस्वीर, दस्तावेज, लोक कहानी, स्थान विशेष की जानकारी या ऐतिहासिक प्रमाण हो तो उसे साझा किया जाए, ताकि उसे राष्ट्रीय अभिलेख का हिस्सा बनाया जा सके.

