उधम सिंह नगर में ग्रीष्मकालीन धान की खेती पर रोक, संकट में 15 हजार से ज्यादा किसान, जानें पूरा मामला
उधम सिंह नगर जिला प्रशासन ने ग्रीष्मकालीन धान की खेती पर रोक लगा दी है. ये खेती 20 हजार हेक्टेयर भूमि पर होती थी.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : January 18, 2026 at 10:57 AM IST
रुद्रपुर: उत्तराखंड का 'अन्न का भंडार' कहे जाने वाले उधम सिंह नगर में प्रशासन ने बेमौसमी धान की खेती पर पूरी तरह से रोक लगा दी है. यह फैसला भूजल संरक्षण के लिहाज से जरूरी बताया गया है. इस फैसले से हजारों किसानों के लिए यह रोजी-रोटी का संकट बनकर सामने आया है. हालांकि, सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों उधम सिंह नगर में ही ये रोक लगाई गई? इस फैसले से कितने किसान प्रभावित होंगे? किसानों को कितना नुकसान होगा? आइए आगे जानते हैं.
फूड बाउल के नाम से मशहूर उधम सिंह नगर जिले में अब बेमौसम (ग्रीष्मकालीन) धान की खेती पर जिला प्रशासन ने पूर्ण रूप से रोक लगा दी है. यानी किसान 01 फरवरी से 30 अप्रैल तक धान की खेती नहीं कर पाएगा. पिछले कुछ वर्षों से यहां रबी और खरीफ की फसल के अलावा गर्मियों में भी धान की खेती की जाती थी, जिसे बेमौसमी या ग्रीष्मकालीन धान कहा जाता है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जिले में करीब 20 से 22 हजार हेक्टेयर जमीन पर बेमौसमी धान की खेती की जा रही थी. जिससे 15 हजार से ज्यादा किसान जुड़े हुए हैं. लेकिन इसी खेती ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी. दरअसल, धान ऐसी फसल है, जिसमें सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होती है. बेमौसमी धान की सिंचाई के लिए किसानों को लगातार नलकूपों से पानी निकालना पड़ा, जिससे जिले का भूजल स्तर तेजी से नीचे चला गया.
इतना ही नहीं, बेमौसमी धान के बाद होने वाली धान की फसल पर बीमारियों का प्रकोप ज्यादा देखने को मिल रहा था. जिस कारण किसानों की फसल बर्बाद हो रही थी.
पिछले साल किसानों के अनुरोध पर खेती करने की छूट दी गई थी. लेकिन इस बार बेमौसमी धान की खेती पूर्ण रूप से प्रबंधित कर दी है. अगर कोई किसान जिले में बेमौसमी धान की खेती करता हुआ पाया गया तो उसके खिलाफ जिला प्रशासन कार्रवाई करेगा.
- डॉ नवीन जोशी, कृषि रक्षा अधिकारी, कृषि विभाग -
प्रशासन ने दी वैकल्पिक फसल: जिले में बेमौसमी धान की खेती में पूर्ण रूप से प्रतिबंध के बाद अब किसानों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है. हालांकि, प्रशासन द्वारा किसानों को वैकल्पिक फसल के लिए मक्का, शुगर केन (गन्ना) सहित मिंट (पुदीना) की खेती करने के सुझाव दिए जा रहे हैं. कृषि विभाग इसके लिए किसानों को जागरूक भी कर रहा है, ताकि किसानों की आमदनी में फर्क न आए.
फरवरी माह से किसानों को हाइब्रिड मेज (मक्का) का बीज भी उपलब्ध कराया जाएगा. पिछले साल जिले में 6 हजार हेक्टेयर जमीन में किसानों द्वारा मक्का की खेती की गई थी, जबकि इस बार 9 हजार हेक्टेयर में किसानों द्वारा मक्का की खेती करने का लक्ष्य रखा गया है.
- डॉ. नवीन जोशी, कृषि रक्षा अधिकारी, कृषि विभाग -
किसान परेशान: जिले में बेमौसमी धान की खेती में रोक लगने के बाद किसानों के चेहरे में मायूसी दिखाई दे रही है. किसान नेता तेजेंदर सिंह वृक ने बताया कि पिछले साल प्रशासन से कुछ शर्त पर किसानों को बेमौसमी धान की खेती के लिए कुछ किसानों को छूट दी थी. लेकिन कई क्षेत्रों में किसानों से मक्का का उत्पादन भी कराया गया था. लेकिन फसल होने के बाद किसानों को मक्का का दाम नहीं मिल पाया.
गिरता भू जल चिंता का विषय है, लेकिन किसान को फसल का उचित दाम न मिल पाना भी चिंता का विषय है. अगर दलहन की खेती किसान करता है तो गुणवत्ता का बीज नहीं मिलता. मक्का की फसल उगाता है तो किसानों को उसकी लागत नहीं मिलती.
- तजेंद्र सिंह वृक, किसान नेता -

धान की खेती में पानी की अधिक मात्रा चिंता का विषय तो है ही, लेकिन अन्य फसल मक्का को बेचने में किसानों को काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है. साथ ही उसका दाम भी नहीं मिल पाता. जिस कारण किसान मक्का और अन्य फसलों से मुंह मोड़ रहा है. पिछले साल भी उनके द्वारा मक्का की फसल बोई गई थी. लेकिन जैसे ही फसल तैयार होकर फैक्ट्री में भेजी गई तो नमी के कारण काफी नुकसान हुआ था. चूंकी मक्के की फसल जून माह में तैयार होती है. इसलिए बारिश के कारण नमी की दिक्कत आती है. अगर कृषि विभाग इस बार ड्रायर उपलब्ध करता है तो इसका फायदा किसानों को होगा. इसके अलावा, जिस तरह से धान में नमी के अनुसार कटौती की जाती है. उसी प्रकार से मक्के की नमी की कटौती कर फसल को खरीदा जाए तो किसानों की लागत को और कम किया जा सकता है और किसानों को एमएसपी का लाभ मिल सकेगा. -विक्रमजीत सिंह, किसान
वहीं, किसानों द्वारा उचित दाम न मिल पाने के सवाल पर कृषि विभाग ने जवाब दिया कि,
पिछले वर्ष मार्केटिंग और मक्के की फसल की हार्वेस्टिंग के नमी की प्रतिशत ज्यादा होना पाया गया था. इस बार कृषि विभाग द्वारा नमी की मात्रा 25 प्रतिशत से कम 15 प्रतिशत करने के लिए ऑर्टिफिशियल ड्रायर किसानों को छूट या समूह में उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि इथेनॉल प्लांट हो या अन्य कंपनियां, किसानों से मक्का की खरीद बिना रुकावट के खरीद सकें.
केवल उधम सिंह नगर में ही बैन क्यों? दरअसल, उधम सिंह नगर में 20 से 22 हजार हेक्टेयर में बेमौसमी धान की खेती होती है, यानी कि 49,400 एकड़ भूमि के लगभग धान की खेती होती है. कृषि विभाग के अनुसार, चूंकि धान की खेती में पानी की मात्रा ज्यादा होती है और केवल उधम सिंह नगर जनपद में ही लगातार भू-जल में गिरावट देखने को मिल रही थी. भविष्य को ध्यान में रखते हुए बेमौसमी धान की खेती में रोक लगाई गई है.
रोक लगाने के अन्य कारणों को लेकर कृषि विभाग ने बताया कि, इसलिए भी रोक लगाई गई है कि अगर किसान ग्रीष्मकालीन धान की खेती के बाद खरीब की फसल के दौरान भी दोबारा उन्हीं खेतों में धान की खेती करता है तो जो बीमारी के लार्वा या प्यूपा होते हैं वो अगली धान की फसल में आ जाते हैं, जिससे धान की खेती में काफी प्रभाव देखने को मिल रहा था.
तीसरा कारण ये भी है अगर किसान ऐसी फसल बार-बार लेता है जो जमीन से ज्यादा न्यूट्रेंस पोषक तत्व लेते हैं तो भूमि में पोषक तत्वों की कमी होने लगती है. अगर बैक टु बैक फसल ली जा रही है तो भूमि में जल धारण और पोषक तत्वों को धारण करने की क्षमता कम होने लगती है और भूमि क्षरीय होने लगती है.
पिछले साल भी जिला प्रशासन द्वारा बेमौसमी धान की खेती में रोक लगाई गई थी, लेकिन जनपद के कुछ किसानों द्वारा धान की पौध को उगाया गया था, जिसके बाद मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद जनपद में ऐसे किसानों को बेमौसमी धान की खेती करने की परमिशन दे दी गई थी. बेमौसमी धान के कारण बीमारियों का सर्कल टूट नहीं पा रहा था, जिस कारण इस बार सख्ती से ये फैसला लिया गया है.
9000 हेक्टेयर का लक्ष्य: कृषि विभाग के मुताबिक, पिछले वर्ष बेमौसमी धान की जगह 6000 हेक्टेयर में मक्का की फसल बोई गई थी. इस वर्ष भी जनपद में 9 हजार हेक्टेयर पर मक्के की फसल उगाने का टारगेट रखा गया है. जिसमें जसपुर और काशीपुर ब्लॉक में 15-1500 हेक्टेयर में मक्का का उत्पादन किया जाएगा, जबकि अन्य ब्लॉक में एक-एक हजार हेक्टेयर में मक्का का उत्पादन करने का टारगेट रखा गया है.
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