जंगल टू जंगल 600 किमी सफर, बायसन को बसाने बांधवगढ़ चले आए वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट
जंगल में वन्य प्राणियों को बसाने बांधवगढ़ बना बड़ा मॉडल, देश के दूसरे राज्यों से पहुंच रहे लोग, बायसन के ट्रांसलोकेशन के जाने तरीके.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 13, 2026 at 3:46 PM IST
|Updated : February 13, 2026 at 3:55 PM IST
रिपोर्ट: अखिलेश शुक्ला
उमरिया: बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व देश के चुनिंदा बेस्ट टाइगर रिजर्व में से एक है. जहां बाघों के दिखने की गारंटी ज्यादा होती है. बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की पहचान भले ही यहां के बाघों के लिए होती है, लेकिन अब ये टाइगर रिजर्व वन्य प्राणियों को जंगल में बसाने को लेकर भी एक बड़ा मॉडल बनकर उभरा है. यही वजह है कि देश के अलग-अलग जगह से लोग इस मॉडल को देखने पहुंच रहे हैं और बहुत कुछ सीख रहे हैं. जिससे वो अपने इलाके में ऐसे ही वन्य प्राणियों को बसा सकें और उनकी संख्या को बढ़ा सकें.
वन्यप्राणी पुनर्स्थापना में बांधवगढ़ बना मॉडल
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय बताते हैं कि, ''बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व अब सफल वन्य प्राणी पुनर्स्थापना को लेकर देश का नया मॉडल बन रहा है. क्योंकि यहां पर कई वन्य प्राणियों को बसाने का सफल प्रोग्राम हो चुका है. जैसे 2011-12 में यहां पर बायसन लाये गए थे, कान्हा से उनकी संख्या अब अच्छी खासी बढ़ गई है. उन्हीं की नस्ल में और सुधार करने के लिए सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से भी 50 बायसन लाये जाने थे. जिसके तहत पहले फेस में 2025 में ही 23 बायसन लाये जा चुके हैं. 27 बायसन अब दूसरे फेस में अभी हाल ही जनवरी महीने में लाये गए हैं.''

क्षेत्र संचालक बताते हैं कि, ''बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में साल 2023-24 में 2 साल के दौरान टोटल 48 बारहसिंघा लाये गए थे. जिसमें से 26 मादा और 22 नर शामिल थे. उनके परिवार में अब इजाफा हो रहा है, अब इनकी संख्या बढ़कर 62 हो चुकी है. इन्हें भी अब जल्द ही बांधवगढ़ के स्वतंत्र जंगलों में एंक्लोजर से आजादी दी जाएगी.
इसके अलावा भी बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हाथियों के लिए मैनेजमेंट किया गया. जब हाथी यहां पर पहुंचे बहुत कम समय में हाथी मानव द्वंद जैसी स्थितियों पर काबू पा लिया गया. अब हाथी भी यहां बहुत अच्छे से दूसरे वन्य प्राणियों की तरह रहने लगे हैं. पर्यटक उन्हें देख पा रहे हैं. बाघों का मैनेजमेंट तो यहां का विश्व विख्यात है ही, इसके अलावा जरूरत पड़ने पर दूसरे टाइगर रिजर्व और जंगलों को भी बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व अक्सर वन्य प्राणी देता रहा है और वहां भी पुनर्स्थापना कराने में सहयोग करता रहा है.

कहां-कहां से आये लोग
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के कल्लवाह बीट के रेंजर महावीर बताते हैं कि, ''बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में अभी हाल ही में झारखंड के पलामू टाइगर रिजर्व से टीम आई हुई थी, जिन्होंने यहां पर पूरा भ्रमण किया है. कैसे गौर की पुनर्स्थापना की गई, कैसे उन्हें रिलीज किया गया, इसकी जानकारी ली. इसी साल जनवरी में दक्षिण भारत के तमिलनाडु से निलगिरी वन मंडल और मुदुमलाई टाइगर रिजर्व की कंबाइन टीम आई हुई थी. इन्होंने तो सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से ही गौर कैपचरिंग से लेकर प्लान तैयार और बांधवगढ़ में सॉफ्ट रिलीजिंग तक पूरी प्रक्रिया को देखा समझा. इसके अलावा नवंबर 2025 में आंध्र प्रदेश के नागार्जुनसागर-श्रीशैलम टाइगर रिजर्व की भी एक विशेष टीम बांधवगढ़ पहुंची थी.
साल 2025 में उड़ीसा की देब्रिगढ़ वन्य जीव अभ्यारण की भी एक विशेष टीम बांधवगढ़ पहुंची थी. एक छत्तीसगढ़ की भी टीम आई हुई थी. यहां का टूरिज्म मैनेजमेंट कैसे किया जाता है, बाघों का मैनेजमेंट कैसे किया जाता है, कैसे वन्य प्राणियों की पुनर्स्थापना की गई, इन सभी को देखा.'' रेंजर महावीर कहते हैं कि, ''जो टीमें यहां गौर पुनर्स्थापना को देखने पहुंचती हैं, वह यहां आने पर दूसरे वन्य प्राणियों के पुनर्स्थापना को भी देखती हैं. बारहसिंगा पुनर्स्थापना, बाघों का मैनेजमेंट, उनका एंक्लोजर कैसे बनाया गया है इन सब के बारे में भी देखते हैं.''

गौर को दूसरे जंगल में शिफ्ट करना कठिन कार्य
रेंजर महावीर बताते हैं कि, ''वैसे तो जितनी भी टीमें अभी आ रही हैं वह गौर पुनर्स्थापना को देखने के लिए आ रही हैं. क्योंकि यह प्रक्रिया आसान नहीं होती है. गौर एक मेगा हरबिवोर है और इसे कैप्चर करना, रिलीज करना, कैसे इसको जंगल में सरवाइव कराना है, इसकी पूरी प्लानिंग तैयार होती है. इस पर कई विशेषज्ञों की बड़ी टीम काम करती है. जैसे गौर को पुनर्स्थापित करना है तो जहां से लाना है कैसे इनको कैप्चर करना है. कितना दवाइयां का इस्तेमाल कर सकते हैं, फिर 500-600 किलोमीटर कैसे इनको सफर करना है. क्योंकि गौर को एक जंगल से दूसरे जंगल में शिफ्ट करना बहुत कठिन कार्य है. जो पूरे प्लानिंग से ही की जा सकती है. कहीं एक छोटी सी चूक बड़ी भूल हो सकती है.''

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बांधवगढ़, वन्यप्राणी पुनर्स्थापना में क्यों सफल?
आखिर वन्य प्राणी पुनर्स्थापना बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में क्यों सफल रहा? इसे ऐसे समझा जा सकता है कि जब 90 के दशक में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से बायसन पूरी तरह से विलुप्त हो चुके थे, उसके बाद इन्हें फिर से बसाने की तैयारी की गई. फिर साल 2011 से लाने का प्लान तैयार किया गया. साल 2011 में कान्हा टाइगर रिजर्व से 50 बायसन लाये गए. जिनकी संख्या अब बढ़ते-बढ़ते लगभग 200 पार चली गई है. लगातार इनकी संख्या बढ़ती जा रही है.
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से नए बायसन लाकर बसाए जा रहे हैं, जिससे उनकी नस्ल में भी सुधार हो सके. क्योंकि 1993-94 के समय में बांधवगढ़ से यह बायसन पूरी तरह से विलुप्त हो चुके थे. उनके ऐतिहासिक प्रमाण मिले थे कि यहां पर गौर पाए जाते हैंस इसीलिए इनको फिर से पुनर्स्थापित किया गया. बांधवगढ़ में बारहसिंगा को भी अब एंक्लोजर से खुले जंगलों में छोड़ने की तैयारी चल रही है, यह भी एक सफल पुनर्स्थापना है.

