क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में शामिल करने की जरूरत, बहुभाषी शिक्षा पर कॉन्क्लेव में मंत्री सुदिव्य ने दिए सुझाव
रांची में बहुभाषी शिक्षा पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कॉन्क्लेव का आयोजन किया गया है.

Published : January 7, 2026 at 6:00 PM IST
रांचीः झारखंड में खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और कुरमाली जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में सशक्त रूप से सम्मिलित करने की जरूरत है. ऐसा कहना है उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार का बहुभाषी शिक्षा पर होटल चाणक्य बीएनआर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में मंत्री सुदिव्य कुमार ने क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व बताते हुए विभागीय सचिव और मुख्यमंत्री से इस दिशा में विचार करने का आग्रह किया है.
राज्य में पांच जनजातीय और चार क्षेत्रीय भाषाएं
मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि बहुभाषी शिक्षा ही झारखंड की सांस्कृतिक पहचान, समावेशिता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आधारशिला है. उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि झारखंड भाषायी विविधता का जीवंत उदाहरण है. यहां 'कोस-कोस पर पानी बदले, दस कोस पर वाणी' की कहावत पूरी तरह साकार होती है. उन्होंने कहा कि राज्य में पांच जनजातीय और चार क्षेत्रीय भाषाएं हैं और 24 जिलों को किसी एक भाषा में नहीं पिरोया जा सकता.
जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं पर संकटः मंत्री सुदिव्य कुमार
मंत्री ने मातृभाषा आधारित शिक्षा के वैज्ञानिक और भावनात्मक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मां ही बच्चे की पहली शिक्षक होती है. इसी कारण ‘मदर टंग’ की अवधारणा शिक्षा का मूल आधार है. यदि बुनियादी शिक्षा सरल, रोचक और व्यावहारिक नहीं होगी तो वह केवल ब्लैकबोर्ड तक सीमित रह जाएगी और जागरूक नागरिकों का निर्माण नहीं कर पाएगी. उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आज जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं लुप्त होने की कगार पर हैं और बच्चों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षा देना ही इन भाषाओं के संरक्षण का पहला और सबसे सशक्त प्रयास है. खोरठा भाषा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा से ही भाषाओं की विशिष्ट ध्वनियां और पहचान जीवित रह सकती है.
पलाश परियोजना को 16 जिलों तक विस्तार की जरूरत
मंत्री सुदिव्य कुमार ने बताया कि वर्तमान में पलाश परियोजना राज्य के केवल 8 जिलों में संचालित है, जबकि इसे शेष 16 जिलों तक विस्तार देने की जरूरत है. इस मौके पर बहुभाषी शैक्षणिक सामग्रियों के निर्माण में योगदान देने वाली छात्राओं एवं शिक्षकों को सम्मानित करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य स्तर पर शिक्षकों को दिया गया सम्मान अन्य शिक्षकों के लिए प्रेरणास्रोत बनेगा. उन्होंने देश के अलग-अलग राज्यों से आए प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि इस दो दिवसीय राष्ट्रीय कॉन्क्लेव से मिलने वाला अनुभव झारखंड की स्कूली शिक्षा को नई दिशा प्रदान करने में मददगार साबित होगा.
कार्यक्रम में झारखंड के शिक्षा सचिव उमा शंकर सिंह, झारखंड के शिक्षा परियोजना निदेशक शशि रंजन समेत कई गणमान्य मौजूद थे. इस मौके पर संथाली भाषा की पुस्तकों के साथ-साथ आदिवासी और मूलवासियों द्वारा परंपरागत रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले सामानों की प्रदर्शनी भी लगाई गई.
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