केवलादेव बना अंतरराष्ट्रीय पाठशाला, 16 देशों के 20 विशेषज्ञों ने सीखा प्राकृतिक धरोहर संरक्षण का मॉडल
प्रतिभागियों ने बदलती परिस्थितियों के बीच महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर का संरक्षण कैसे किया जाता है, इसको नजदीक से जाना.

Published : August 24, 2026 at 7:39 PM IST
भरतपुर: केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान सोमवार को अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्राकृतिक धरोहर संरक्षण की पाठशाला बन गया. भारतीय वन्यजीव संस्थान (डबल्यूआईआई) के कैटेगरी-2 सेंटर के तहत ट्रेनिंग कोर्स इन नेचुरल हेरिटेज मैनेजमेंट में 16 देशों के 20 विशेषज्ञों ने केवलादेव का भ्रमण कर यहां की वेटलैंड की संरक्षण व्यवस्था, प्रबंधन पद्धतियों और प्राकृतिक धरोहर को बचाने की चुनौतियों को जमीनी स्तर पर समझा. कार्यक्रम का उद्देश्य अलग-अलग देशों के प्रतिभागियों को प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण और प्रभावी प्रबंधन की व्यावहारिक जानकारी देना रहा.
उद्यान एसीएफ रेखा वर्मा ने बताया, यह प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल किसी एक संरक्षित क्षेत्र के भ्रमण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका फोकस अलग-अलग देशों के अधिकारियों और प्राकृतिक धरोहर से जुड़े विशेषज्ञों को प्राकृतिक विरासत के संरक्षण और उसके प्रभावी प्रबंधन की व्यावहारिक समझ देना रहा. प्रतिभागियों ने केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में अपनाई जा रही विभिन्न मैनेजमेंट प्रैक्टिसेज को देखा और यह समझने का प्रयास किया कि बदलती परिस्थितियों के बीच एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर का संरक्षण किस तरह किया जाता है.
16 देशों के 20 प्रतिभागी: एसीएफ रेखा ने बताया, कार्यक्रम में कुल 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया. ये 16 देशों से आए. इनमें केन्या, कजाकिस्तान, मॉरीशस, मंगोलिया, कतर, सेशेल्स, तंजानिया, ट्यूनीशिया, कंबोडिया, चिली, इक्वाडोर, इथोपिया, फिजी, गुयाना, इंडोनेशिया, जमैका आदि देश के प्रतिभागी शामिल हुए. इनमें सरकारी अधिकारियों के साथ प्राकृतिक धरोहर, संरक्षण क्षेत्र और संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञ शामिल रहे.
प्रशिक्षण का उद्देश्य: प्रतिभागियों को भारत की प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण और प्रबंधन से परिचित कराना है. इसके साथ ही उन्हें यह समझाने पर जोर दिया गया कि किसी प्राकृतिक धरोहर को संरक्षित रखने के लिए केवल वन्यजीवों की सुरक्षा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके पूरे पारिस्थितिक तंत्र, आवास, जल व्यवस्था और ह्यूमन एक्टिविटी के प्रभाव को समझना भी जरूरी है. प्रतिभागियों के लिए यह भ्रमण इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि केवलादेव एक ऐसा संरक्षित क्षेत्र है, जहां पक्षियों, जलाशय आधारित पारिस्थितिकी और वेटलैंड मैनेजमेंट का आपस में सीधा संबंध है. इस दौरान अधिकारियों और विशेषज्ञों के साथ संवाद भी हुआ. इससे विभिन्न देशों में प्राकृतिक धरोहर संरक्षण के अनुभवों को साझा करने का अवसर मिला.
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अनुभव किए साझा:कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न देशों के प्रतिभागियों के बीच अनुभवों का आदान-प्रदान भी रहा. अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों और प्राकृतिक संसाधनों वाले देशों से आए विशेषज्ञों ने संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए.
धर्म और शिकार में संबंध रोचक: कंबोडिया के पर्यावरण मंत्रालय से आईं प्रतिभागी दालिन ने केवलादेव की संरक्षण व्यवस्था को अपने देश के लिए महत्वपूर्ण सीख बताया. उन्होंने कहा, केवलादेव में धर्म को समुदाय से जोड़कर शिकार जैसी गतिविधियों को रोकने का तरीका उन्हें खास लगा. संरक्षण को धार्मिक भावनाओं और स्थानीय समुदाय से जोड़ने का यह मॉडल कंबोडिया में भी प्रभावी साबित हो सकता है. उन्होंने उम्मीद जताई कि केवलादेव से मिली इस सीख और पद्धति को अपने देश में लागू किया जा सकेगा.
छोटे क्षेत्र में इतनी विविधता वाले पक्षी: भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के अनुरंजन रॉय ने बताया कि विदेश मंत्रालय के कार्यक्रम के तहत 16 देशों के 20 विदेशी प्रशिक्षु केवलादेव पहुंचे. दो सप्ताह के प्रशिक्षण में पहला सप्ताह देहरादून में क्लासरूम ट्रेनिंग का रहा. केवलादेव प्रशिक्षण का फील्ड कंपोनेंट है. प्रतिभागियों ने पार्क प्रबंधन और डीसीएफ चेतन कुमार से बातचीत कर समझा कि सीमित क्षेत्र में इतनी विविध पक्षी प्रजातियों वाले इस विश्व धरोहर स्थल का प्रबंधन कैसे किया जाता है?. उन्होंने बताया कि दुनिया में ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं, जहां छोटे से क्षेत्र में इतनी विविधता वाले पक्षी मिलते हैं और देश-विदेश से आने वाले प्रवासी पक्षियों के लिए केवलादेव बेहद महत्वपूर्ण है.

