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मध्य प्रदेश में लगातार सूख रहीं सहायक नदियां, महाकुंभ से पहले 22 नदियां पैदा कर सकती हैं संकट

क्षिप्रा के साथ कई नदियां खो रहीं प्राकृतिक जलभराव, पर्यावरण असंतुलन का बड़ा खतरा, सहायक नदियों को भी बचाना जरूरी.

Rivers drying up in madhya pradesh
मध्य प्रदेश में लगातार सूख रहीं सहायक नदियां (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : June 1, 2026 at 4:35 PM IST

9 Min Read
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उज्जैन: मध्य प्रदेश में सहायक नदियों पर बड़ा संकट मंडरा रहा है, ये संकट और भी बड़ा हो सकता है क्योंकि इन नदियों पर कई प्रमुख नदियां निर्भर होती हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहण मालवा की जीवनदायनी क्षिप्रा और उसकी सहायक नदियां हैं. पहले जहां क्षिपा कई सहायक नदियों पर निर्भर रहती थी, वहीं, समय के साथ-साथ सहायक नदियों के विलुप्त होने और केवल बारिश पर निर्भर होने से क्षिप्रा सूखने की कगार पर पहुंच गई थी. इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार ने क्षिप्रा में नर्मदा नदी को लिंक करके पुनर्जीवित किया. लेकिन छोटी नदियों पर अब भी संकट बरकरार है.

Dangers of rivers drying up in madhya pradesh
नदी तंत्र कमजोर होने से क्या होता है? (Etv Bharat)

लगातार सूख रहीं नदियां, पर्यावरण असंतुलन का बड़ा खतरा

मालवा क्षेत्रा में चंद्रभागा, स्वात:, गंडकी, कालियादह, लखेरी, पिपलिया सहित 22 सहायक नदियां कभी पूरे क्षेत्र की जल व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती थीं. समय के साथ इनमें से अधिकांश नदियां अतिक्रमण, जलस्त्रोतों के क्षरण और अनियमित वर्षा के कारण या तो विलुप्त हो गईं या फिर मौसमी नालों में तब्दील होकर रह गईं. जो नदियां आज अस्तित्व में हैं, वे भी भीषण गर्मी के चलते लगभग पूरी तरह सूख चुकी हैं. इस स्थिती ने न केवल किसानों की चिंता बड़ाई बल्कि ग्रामीण और कुछ शहरी क्षेत्रों के पेयजल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन का खतरा भी बड़ा दिया है.

reasons behind drying up of rivers in madhya pradesh
नदियों के सूखने के प्रमुख कारण (Etv Bharat)

क्षिप्रा की सहायक नदी चंद्रभागा, गर्मी में सूखी

ETV भारत से चर्चा में मोहनपुर गांव के किसान दशरथ पटेल ने बताया, '' हमारे गांव के पास क्षिप्रा नदी की सहायक चंद्रभागा नदी है. इसका गहरीकरण जनसहयोग से लगभग चार साल पहले हुआ, जिसकी वजह से कम से कम हम 300 से 350 किसानों को खेती, सिंचाई के लिए फायदा होता है. फरवरी महीने के आखरी तक हमें इस नदी से पानी मिलता है. लेकिन गर्मी आते ही ये पूरी तरह सूख गई है. इन दिनों परेशानी का सामना करना पड़ता है, लेकिन क्षिप्रा की इस सहायक नदी से हमार क्षेत्र का भूमिगत जलस्तर बढ़ा है और यहां मौजूद ट्यूबवेल से हम गर्मी के सीजन में मक्का व सब्जी की फसल पैदा कर पाते हैं. इसलिए इस नदी का भी संरक्षण बेहद जरूरी है.''

how to save drying rivers in madhya pradesh
नदियों को सूखने से बचाने के उपाय (Etv Bharat)

22 सहायक नदियों का संरक्षण बेहद जरूरी

नदियों के संरक्षण के लिए कार्य करने वाले समाजसेवी प्रीतम सिंह मेवाड़ा ने बताया, '' क्षिप्रा की 22 सहायक नदियां है और 22 सहायक नदियों में से कई पर हमने काम किया, जैसे चंद्रभागा, नरवर गंगा, चंदेसरी क्षेत्र में काम हुआ है. एक सहायक नदी से 250 से 300 किसान को लाभ मिलता है. हजारों ग्रामीणों की प्यास बुझती है. किसान आगे आ जाएं और सब लोग अगर मिलकर प्रयास करें तो 22 ही सहायक नदियां जीवित हो सकती हैं. सरकार को भी इस और ध्यान देना चाहिए. ये 22 सहायक नदियां हमारे पास लिस्टेड हैं, जो शहर के देवास रोड के ग्रामीण इलाके से, कुछ आगर रोड, कुछ अंबोदिया, कुछ कानीपुरा मार्ग पर से होकर गुजरती हैं, जिसमें कई गांव शमिल हैं.''

लगातार सूख रहीं नदियां, पर्यावरण असंतुलन का बड़ा खतरा (Etv Bharat)

नदियों के तीन प्रकार, क्षिप्रा इस वजह से सूखी

साहित्यकार व नदियों के जानकार डॉ. विवेक चौरसिया बताते हैं, '' नदियां तीन तरह की होती हैं. एक वह जो ग्लेशियर से निकलती हैं, जैसे गंगा, यमुना नदी जिनमें पूरे 12 महीनों पानी रहता है. खासकर गर्मी के दिनों में क्योंकि ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उनमें लगातार पानी आता है. दूसरी पहाड़ी नदिया होती हैं, जो पहाड़ों से झरने बनकर निकलती हैं और उनके उद्गम स्थल इतने प्रबल होते हैं कि प्राकृतिक रूप से उनका बहाव निरंतर बना रहता है. मैं समझता हूं कि हम नर्मदा जी को पहाड़ी नदियों की इस श्रेणी में देख सकते हैं क्योंकि इस नदी का प्राकृतिक स्त्रोत बड़ा प्रबल है, बड़ा प्रभावी है.

लेकिन क्षिप्रा बरसाती नदियों में से है. क्षिप्रा में किसी जमाने में उसके उद्गम से जल स्रोत का निरंतर बहाव बड़ा प्रभावी रहा होगा, लेकिन इसमें पानी गर्मी के दिनों में कम हो जाता है. बारिश का पानी कुछ समय रहता है और इसकी कुछ सहायक नदियां जिनमें से अधिकांश का वर्णन पुराणों में या इतिहास में मिलता है, उनमें से ज्यादातर अब बरसाती नदियां ही हैं. इस वजह से क्षिप्रा सूखने लगी थी लेकिन नर्मदा उसे अविरल बहने में मदद मिली है.''

SUPPORTING RIVERS OF KSHIPRA
22 सहायक नदियों का संरक्षण बेहद जरूरी (Etv Bharat)

कभी पीने के उपयोग में आता था क्षिप्रा का पानी, अब प्रदूषित

डॉ. विवेक चौरसिया ने बताया, '' क्षिप्रा के मार्ग में उसके उद्गम से लेकर उसके बहाव क्षेत्र के बीच जितने अतिक्रमण हुए हैं, जितना प्रदूषण हुआ है, जितना जगह उसकी दुर्गति हुई है, उसका परिणाम यह है कि गर्मी के दिनों में ये नदी भीषण दुर्गति के स्तर पर पहुंच जाती है. मुझे याद है, आज से कोई 10 से 15 साल पहले तक क्षिप्रा नदी का पानी भी हमारे यहां प्रतिदिन पेयजल सप्लाई में इस्तेमाल होता था. लेकिन अब वह नहीं लिया जाता है. शायद इसलिए कि गंभीर डैम में पानी की उपलब्धता है या इसलिए भी कि क्षिप्रा का पानी इतना प्रदूषित है कि उसका ट्रीटमेंट करके जनता के लिए सप्लाई करना उचित नहीं.''

malwa kshipra supporting rivers
गर्मीयों में सूख जाती हैं सहायक नदियां, कई गांवों में बढ़ जाता है जल संकट (Etv Bharat)

10 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च

डॉ. विवेक चौरसिया ने यह भी कहा, '' अब किसान भाई क्या करें, क्योंकि वह क्षिप्रा की सहायक नदियों पर निर्भर रहते हैं, तो उनके लिए यह चुनौती तो बनेगी ही. किसानों को, पूरे समाज को और सरकार को भी इस पर कहीं ना कहीं विचार करना चाहिए. मध्य प्रदेश ने क्षिप्रा में पानी की निरंतरता बनाए रखने के लिए 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए हैं. लेकिन आज भी क्षिप्रा पर खतरा बरकरार है,ऐसे में जरूरत है उन सहायक नदियों के संरक्षण की भी, जो क्षिप्रा में जाकर मिलती हैं.''

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सहायक नदियों की चिंता करनी होगी

नदियों को लेकर काम कर रहे पुष्पेंद्र शर्मा ने ईटीवी भारत से कहा, '' नदियां हमारी संस्कृति है, नदी हमारी माता है, नदी केवल नदी नहीं है. नदी एक ऐसी धारा है जो हमें पोषित करती है, पल्लवित करती है. आज से 50 या 100 साल पहले के इतिहास में जब हम देखते हैं, तो हमारे पूर्वज जो किसान जो थे वे इस मौसम में अपने आसपास की सहयोगी नदियों से गारा लाते थे और अपने खेतों में डालते थे. उससे दो बातें होती थी, एक तो उन नदियों का गहरीकरण होता था और दूसरा खेतों में गारे से फसलों का उत्पादन बढ़ता था. लेकिन अब ऐसा नहीं होता, जिस वजह से बरसाती नदियां सूखने की कगार पर हैं. क्षिप्र का मतलब ही होता है तेजी से बह जाना. यानी क्षिप्र के समान जो बह जाती है, वही क्षिप्रा है और ऐसी क्षिप्रा नदी को अगर पुनः प्रवाहमान और पुनः हमेशा के लिए जलवान बनाना है तो हमें इसकी सहायक नदियों की चिंता पालना पड़ेगी.''

महाकुंभ से पहले सरकार को देना होगा ध्यान

पुष्पेंद्र शर्मा ने कहा, '' अगर हमें इस आने वाले 2028 के सिंहस्थ महाकुंभ में साधु, महात्माओं, संतों को क्षिप्रा जी के जल में स्नान कराना है तो मैं हमारे अति संवेदनशील मुख्यमंत्री बड़े भाई मोहन यादव जी से भी निवेदन करूंगा कि वह इन विलुप्त प्रायः विलुप्त नदियों की ओर ध्यान दें. और मैं समझता हूं कि एक या दो साल में तो बहुत अच्छा काम हो सकता है. हम अगले साल तक ही उन नदियों में पानी ला सकते हैं. यही मेरा आग्रह है.''

खेती और पेयजल का प्रमुख आधार

विशेषज्ञ बताते है बारिश के मौसम में यह सहायक नदियां क्षिप्रा में जल प्रवाह बढ़ाती हैं, इनके किनारे बसे हजारों किसान इन्हीं स्त्रोतों से सिंचाई करते हैं. नदी तंत्र के कारण भूजल स्तर भी रिचार्ज होता ह, जिससे कुंए, बावड़ियां और हैंडपंप लंबे समय तक पानी देते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों के कई गांव ऐसे हैं, जहां गर्मी के दिनों में पेयजल की जरूरतें भी इन्हीं नदियों और इनके प्रभाव से रिचार्ज हुए जल स्त्रोतों से पूरी होती है. लेकिन इस साल तेज गर्मी और कम जल प्रवाह के कारण अधिकांश स्थानों पर नदियां सूख चुकी हैं और ग्राउंड वॉटर लेवल भी नीचे चला गया है.

सहायक नदियों की बाढ़ नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका

विशेषज्ञों के अनुसार सहायक नदियां केवल पानी उपलब्ध करवाने का काम नहीं करतीं, बल्कि मॉनसून के दौरान अतिरिक्त वर्षा जल को अलग-अलग दिशाओं में वितरित कर बाढ़ नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. जब ये नदियां प्राकृतिक स्वरूप में होती हैं तब बारिश का पानी तेजी से बहने के बजाय अलग-अलग जलधाराओं में फैल जाता है लेकिन नदी मार्गों के अवरुद्ध होने और जलग्रहण क्षेत्रों के नष्ट होने से अचानक बाढ़ और जलप्रभाव कि घटनाओं की संभावनाए बढ़ जाती हैं.

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विशेषज्ञों के अनुसार क्षिप्रा की चंद्रभागा से लेकर लखेरी तक की सहायक नदियां केवल जलधाराएं नहीं है बल्कि हजारों किसान, ग्रामीणों और पर्यावरण की जीवनरेखा हैं. इनका सूखना भविष्य के बड़े जल संकट का संकेत है.