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सामूहिक वन अधिकार पत्र की मांग, कलेक्ट्रेट पहुंचे 18 गांवों के आदिवासी

नारायणपुर जिले के 18 गांवों के आदिवासी कलेक्ट्रेट पहुंचे और वर्षों से लंबित सामूहिक वन अधिकार पत्र की मांग की.

COLLECTIVE FOREST RIGHTS
नारायणपुर में सामूहिक वन अधिकार पत्र की मांग (ETV BHARAT)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : December 29, 2025 at 9:42 PM IST

5 Min Read
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नारायणपुर: जिला कलेक्ट्रेट नारायणपुर पहुंचे आदिवासियों की सामूहिक वन अधिकार (CFR) पत्र की मांग है. ग्रामीणों ने जिला प्रशासन पर फाइल गायब करने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए. वहीं नारायणपुर के अपर कलेक्टर वीरेंद्र बहादुर पंचभाई ने कहा कि अब तक नियम के मुताबिक कोई भी दस्तावेज नहीं मिलने की वजह से कार्यवाही नहीं हुई है.

अपर कलेक्टर से मिले ग्रामीण

कलेक्टर के नहीं मिलने पर उन्होंने अपर कलेक्टर वीरेंद्र बहादुर पंचभाई से मुलाकात की. ग्रामीणों ने कहा कि उनके गांवों को जल, जंगल और जमीन से जुड़ा अधिकार पत्र सौंपा जाए, जिससे वे अपने पारंपरिक संसाधनों पर कानूनी अधिकार के साथ संरक्षण और उपयोग कर सकें.

नारायणपुर में ग्रामीणों की मांग (ETV BHARAT)

हम लोगों को सिर्फ घुमाया जा रहा है. अब बोल रहे हैं कि फाइल ही जमा नहीं है. 18 गांव की फाइल गई कहां, हमें जवाब जाहिए-यशोदा पोटाई, ग्रामीण महिला

जदर्शन और सुशासन तिहार में भी हम आवेदन दे चुके हैं. हमें कहा गया कि प्रक्रिया जारी है. हमको लग रहा है कि सीधी बात न बताकर गुमराह किया जा रहा है. ऐसा करते रहेंगे तो हम आंदोलन करेंगे और गांव में अधिकारी को घुसने नहीं देंगे- दशा राम कोर्राम-ग्रामीण

जल्द निराकरण की मांग

ग्रामीणों ने बताया कि वे पिछले कई वर्षों से यह मांग प्रशासन के सामने रख रहे हैं, लेकिन अब तक कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश या स्वीकृति नहीं मिली है. ग्रामीणों ने बताया कि विश्व आदिवासी दिवस से पहले भी इसी मांग को लेकर ज्ञापन और जरूरी दस्तावेज की फाइल कलेक्टर को दी गई थी लेकिन अब पूछे जाने पर विभागीय अधिकारी किसी भी प्रकार की फाइल नहीं होने की बात कहते हैं. ग्रामीणों का यह भी कहना है कि विभाग आज फाइल गायब कर रहा है, कल हमसे हमारे अधिकार को ही गायब कर दिया जाएगा.

धीरे धीरे 2 साल हो गए. प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं किया है. अपर कलेक्टर ने कहा है कि फाइल हम तक नहीं पहुंच पाया है. हमने फाइल जमा करने का सबूत दिया है. उन्होंने कहा कि जांच करेंगे. हमने कहा कि आपके विभाग में ही फाइल जमा है, उसे निकालकर निराकरण करिए-मनोज कुमार करंगा, ग्रामीण

उग्र आंदोलन की चेतावनी

आदिवासियों का कहना है कि उनका संघर्ष केवल कागज पर अधिकार पाने का नहीं है, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपरा, जंगल और जीविका की रक्षा का है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अब भी उनकी मांगों पर कोई कार्यवाही नहीं होती तो वे वन मंत्री से मुलाकात कर अपनी बात रखेंगे या फिर उग्र आन्दोंलन भी करेंगे.

क्या कहते हैं अधिकारी

नारायणपुर अपर कलेक्टर वीरेंद्र बहादुर ने बताया कि सामूहिक वन अधिकार पत्र चार चरणों में कार्यवाही के बाद दिया जाता है.

⦁ सबसे पहले सामूहिक वन अधिकार पत्र के लिए ग्राम सभा से पारित आवेदन, वनाधिकार समिति को उपलब्ध कराया जाना होता है.

⦁ वनाधिकार समिति स्थल जांच के बाद जानकारी के पारित प्रस्ताव को सब डिविजनल कमेटी को सौंपेगी.

⦁ सब डिविजनल कमेटी प्रस्तावित कर आगे जिला स्तरीय कमेटी को प्रस्ताव भेजती है.

⦁ जिला स्तरीय कमेटी मामले पर जांच कर जरूरत पड़ने पर सामूहिक वनाधिकार पत्र जारी करती है.

अपर कलेक्टर ने कहा कि इस मामले में अब तक प्रक्रिया कहां तक पहुंची है, इसकी स्पष्ट जानकारी किसी को नहीं है. इस मामले से जुड़ी फाइल मंगाई गई है, जल्द निराकरण हो पाएगा.

क्या है सामूहिक वन अधिकार (CFR)?

सामूहिक वन अधिकार (CFR) यानी Community Forest Rights भारत के वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act - FRA) के तहत दिया जाने वाला एक अधिकार है, जो आदिवासी और परंपरागत वनवासियों को पूरे समुदाय के रूप में उनके पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले वनों पर मिलता है. यह व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) से अलग है, क्योंकि इसमें पूरा ग्रामसभा या समुदाय मालिकाना हक और प्रबंधन का अधिकार रखता है, न कि कोई अकेला व्यक्ति।

CFR के मुख्य बिंदु

1. अधिकार किसे मिलता है

अनुसूचित जनजाति (ST) के लोग

अन्य परंपरागत वनवासी (OTFD) जो कम से कम 75 वर्ष से उस क्षेत्र में रह रहे हैं

2. अधिकार का दायरा

जंगल की जमीन, घास के मैदान, जल स्रोत, पहाड़, नदी-नाले का सामूहिक उपयोग

लकड़ी, लघु वनोपज (जैसे तेंदूपत्ता, महुआ, सालबीज, लाख, शहद) इकट्ठा करना, बेचना

जंगल का संरक्षण, प्रबंधन और पुनर्जीवन (Regeneration) का अधिकार

शिकार, चराई, मछली पकड़ने जैसी परंपरागत गतिविधियां (जहां वैधानिक रूप से अनुमति हो)

3. उद्देश्य

स्थानीय समुदाय को जंगल पर निर्णय लेने का अधिकार देना

वनों की रक्षा और सतत उपयोग सुनिश्चित करना

सरकार और ठेकेदारों के बजाय ग्रामसभा को वनों का मालिकाना और नियंत्रण देना

4. निर्णय प्रक्रिया

ग्रामसभा के माध्यम से जंगल का प्रबंधन और उपयोग के नियम तय होते हैं

कोई भी वनों से जुड़ा निर्णय ग्रामसभा की सहमति के बिना लागू नहीं किया जा सकता

5. लाभ

आर्थिक: लघु वनोपज की बिक्री से आय

पर्यावरणीय: जंगलों का बेहतर संरक्षण

सामाजिक: समुदाय की एकजुटता और स्वावलंबन

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