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होली की रियासतकालीन परंपरा: दो दशक बाद सोनार दुर्ग से फिर निकली हजूरी समाज की गेर

हजूरी समाज के फाग गीत, चंग की गूंज और अबीर-गुलाल से सराबोर हुई स्वर्णनगरी.

Youth of Hazuri community during the procession of Hazuri community
हजूरी समाज की गेर के दौरान हजूरी समाज के युवा (ETV Bharat Jaisalmer)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : March 2, 2026 at 12:54 PM IST

3 Min Read
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जैसलमेर: स्वर्णनगरी अपनी अनूठी कला, स्थापत्य और जीवंत लोक परंपरा के कारण विश्व पटल पर अलग पहचान रखती है. यह शहर जब होली के रंग में रंगता है तो हर गली, हर चौक और प्राचीर इतिहास की धड़कनों के साथ झूम उठती है. यहां होली केवल त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है. इस बार यह उत्सव इसलिए भी खास रहा कि करीब 20 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद हजूरी समाज की पारंपरिक गेर की रियासतकालीन परंपरा फिर से जीवंत हो गई.

दो दशक पहले टूटी परंपरा: दो दशक बाद पुनः ​शुरू हुई इस परंपरा ने शहरवासियों में खास उत्साह भर दिया. हजूरी समाज के युवाओं ने संदेश दिया कि बदलते समय के साथ परंपराएं भुलानी नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाना चाहिए. इसी भावना के साथ होली की गेर सोनार दुर्ग से परंपरागत रूप से निकाली गई. ऐतिहासिक सोनार दुर्ग स्थित नगर आराध्य लक्ष्मीनाथजी मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा. मंदिर परिसर खचाखच भरा हुआ था. भगवान लक्ष्मीनाथ के समक्ष गुलाल और अबीर अर्पित कर पारंपरिक होली खेली गई. श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ वातावरण को भक्तिमय बना दिया.

हजूरी समाज की गेर (ETV Bharat Jaisalmer)

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हजूरी समाज के मीडिया प्रभारी भीमसिंह पंवार ने बताया कि चंग की थाप के साथ गेर ने दुर्ग से प्रस्थान किया तो पूरा किला रंगों की छटा से सराबोर हो गया. पारंपरिक वेशभूषा में सजे हजूरी समाज के लोग हाथों में गुलाल लिए आगे बढ़े. चंग, ढोल और फाग गीतों की गूंज ने स्वर्णनगरी के माहौल को पूरी तरह होलीमय बना दिया. गैर जैसे-जैसे शहर के मुख्य मार्गों से गुजरती गई, लोग अपने घरों और दुकानों से बाहर निकल आए।

पंवार ने बताया कि यह गेर सोनार दुर्ग से निकलकर मुख्य बाजार, चौक-चौराहों से होती गांधी चौक आई. यह कारवां गांधी चौक पहुंचा तो उत्सव अपने चरम पर नजर आया. समाजजनों ने रियासत काल से चले आ रहे प्राचीन फाग गीत गाए. चंग की थाप पर थिरकते गेरिए और उड़ते अबीर-गुलाल ने पूरे चौक को रंगों से भर दिया.

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फाग गाती टोलियां आकर्षण का केंद्र: टेसू के फूलों का प्राकृतिक रंग, पिचकारियों से निकलती रंगधार और फाग गीत गाती टोलियां आकर्षण का केंद्र बनी रहीं. गेरियों पर छतों से पुष्प वर्षा की गई. बच्चों ने रंग उड़ाए. बुजुर्गों ने आशीर्वाद दिया. समाज के युवाओं ने जिम्मेदारी संभाली. उनका कहना है कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब नई पीढ़ी उन्हें अपनाती है.

Chang playing on Holi in Jaisalmer
जैसलमेर में होली पर चंग वादन (ETV Bharat Jaisalmer)

इसलिए खास: जानकार बताते हैं कि स्वर्णनगरी में अब होली का रंग पूरी तरह जमने लगा है. विभिन्न समाज अपने-अपने तरीके से होली मना रहे हैं, लेकिन हजूरी समाज की गेर विशेष महत्व रखती है. यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता का भी संदेश देती है. होली पर 20 वर्षों बाद पुनर्जीवित हुई हजूरी समाज की गैर जैसलमेर की सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत उदाहरण है.

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