सुविधा के बजाय पर्यटकों की दुविधा बन रही तकनीक! गूगल मैप की गड़बड़ी से बढ़ी परेशानी
पूर्व में सरिस्का टाइगर रिजर्व जाने वाले पर्यटकों को भी लोकेशन तकनीक की समस्या आई.

Published : December 31, 2025 at 11:43 AM IST
अलवर : नए साल का जश्न मनाने और शीतकालीन अवकाशों का लुत्फ उठाने अलवर आ रहे पर्यटकों को तकनीक गंतव्य तक आसानी से पहुंचने में सहायक बनने के बजाय उनके समक्ष दुविधा खड़ी कर रही है. कारण है कि इंटरनेट पर मैपिंग के गड़बड़ाने से पर्यटक ऐतिहासिक सिलीसेढ़ झील पर पहुंचने के बजाय आसपास के क्षेत्रों में भटकने को मजबूर हैं. पर्यटकों की यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि पहले भी टाइगर रिजर्व सरिस्का आने वाले टूरिस्टों को मैपिंग की गलती से सरिस्का गेट की जगह टहला गेट पर पहुंचना पड़ गया.
पर्यटकों की परेशानी बढ़ी : अलवर जिले में सरिस्का टाइगर रिजर्व, ऐतिहासिक सिलीसेढ़ झील समेत कई अन्य प्रमुख पर्यटन केन्द्रों की ख्याति दुनियाभर में है. यही कारण है कि न्यू ईयर सेलिब्रेशन एवं शीतकालीन अवकाशों में घूमने के लिए दूर दराज के क्षेत्रों से पर्यटक अलवर आ रहे हैं. वर्तमान इंटरनेट युग में बाहर से घूमने आने वाले लोग प्रमुख पर्यटन केन्द्रों तक पहुंचने के लिए मैपिंग तकनीक का सहारा ले रहे हैं, लेकिन कई बार मैपिंग की यह तकनीक गड़बड़ाने से पर्यटकों की परेशानी बढ़ रही है.
अलवर के सिलीसेढ़ लेक पर शीतकालीन अवकाश का आनंद लेने के लिए प्रतिदिन दो से ढाई हजार पर्यटक पहुंच रहे हैं, इनमें बाहरी राज्यों से आने वाले और विदेशी पर्यटक भी शामिल हैं. इनमें से ज्यादातर पर्यटक सिलीसेढ़ झील तक पहुंंचने के लिए इंटरनेट पर मैपिंग तकनीक का सहारा ले रहे हैं, लेकिन कई बार मोबाइल पर इंटरनेट तकनीक से सिलीसेढ़ की दिखाई जाने वाली लोकेशन पर्यटकों को सिलीसेढ़ झील पर ले जाने के बजाय आसपास के क्षेत्र बख्तपुरा, पैंतपुर, किशनपुर एवं अन्य गांवों से होकर झील के पीछे किनारे पर ले जाती है. यहां न तो बोटिंग की सुविधा है और न ही सिलीसेढ़ लेक पैलेस की सुविधा मिल पाती है. इन सुविधाओं के लिए पर्यटकों को सिलीसेढ़ लेक पैलेस के मुख्य द्वार से प्रवेश जरूरी है.
पर्यटक जब तकनीक के जरिए सिलीसेढ़ लेक पैलेस की लोकेशन डालते हैं तो वो झील पर लेक पैलेस होटल पहुंचते हैं, लेकिन जब केवल सिलीसेढ़ की लोकेशन डालते हैं तो मैप आसपास के गांवों से घुमाकर झील के पिछले किनारे पर पहुंचा देती है. कुछ पर्यटकों की ओर से यह समस्या बताई गई है, पर्यटकों की परेशानी दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं. : उत्तम शर्मा, मैनेजर, सिलीसेढ़ लेक पैलेस
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पर्यटकों की यह परेशानी : दिल्ली से घूमने आए दीपक ने बताया कि वह परिवार के साथ शीतकालीन अवकाश में सिलीसेढ़ घूमने आए हैं. जब उन्होंने तकनीक से लोकशन का सहारा लिया तो उन्हें मोबाइल पर सिलीसेढ़ की दूरी करीब 15 किलोमीटर बताई गई, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों से जब जानकारी ली तो चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर ही सिलीसेढ़ झील पर पहुंच गए. दिल्ली निवासी सुरभि ने बताया कि अवकाश में उन्होंने अलवर घूमने का प्लान बनाया, जिसमें वे भानगढ़, अलवर के बाला किला आदि कई पर्यटन केन्द्रों पर घूमे. उन्हें कहीं भी लोकेशन की समस्या नहीं आई, लेकिन सिलीसेढ़ झील पहुंचने के दौरान उन्हें लोकेशन के आधार पर पहुंचने में परेशानी हुई. ग्रेटर नोएडा के मधुर चौपड़ा ने बताया कि आजकल लोग गंतव्य तक पहुंचने के लिए तकनीक का सहारा लेते हैं. उन्होंने भी सिलीसेढ़ पहुंचने के लिए लोकेशन तकनीक का उपयोग किया, जिसमें उन्हें सिलीसेढ़ झील तक पहुंचने में कुछ परेशानी का सामना करना पड़ा.
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पहले भी कई बार आई समस्या : अलवर में तकनीक के माध्यम से गंतव्य तक पहुंचने में परेशानी का यह मामला पहला नहीं है. पूर्व में सरिस्का टाइगर रिजर्व जाने वाले पर्यटकों को भी लोकेशन तकनीक की समस्या आई. उस दौरान सरिस्का गेट पहुंचने की लोकेशन डालने पर पर्यटकों को सरिस्का का टहला गेट दिखाया, जबकि सरिस्का गेट व टहला गेट के बीच की दूरी 50 से ज्यादा किलोमीटर है. इसके अलावा कई प्रतियोगी परीक्षा के दौरान भी अभ्यर्थियों की ओर से परीक्षा केन्द्र की लोकेशन डालने पर दूसरे स्थानों को दिखाया गया, जहां तक पहुंचने में अभ्यर्थियों को पहुंचने में परेशानी हुई. कुछ अभ्यर्थी परीक्षा से भी वंचित रहे गए.
तकनीक विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक सेटेलाइट इमेज आधारित होती है. इसमें कई लोग जल्द पहुंचने के प्रयास में गलत टर्न लेते हैं, जिससे सेटेलाइट उसी अनुसार आगे का रास्ता बताती है. इससे कई बार गंतव्य की दूरी बढ़ने की आशंका रहती है. उन्होंने कहा कि तकनीक के सहायता के साथ ही लोगों को समय-समय पर स्थानीय लोगों से गंतव्य की जानकारी लेते रहना चाहिए.

