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हिमाचल का व्यवस्था परिवर्तन, ब्यूरोक्रेसी की तीन टॉप कुर्सियां, तीनों के बॉस एडहॉक पर

हिमाचल प्रदेश में टॉप के 3 अफसर अतिरिक्त कार्यभार के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. ये मामला अब राजभवन भी पहुंच गया है.

हिमाचल ब्यूरोक्रेसी की तीन टॉप कुर्सियां के बॉस एडहॉक पर
हिमाचल ब्यूरोक्रेसी की तीन टॉप कुर्सियां के बॉस एडहॉक पर (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : October 25, 2025 at 6:10 PM IST

8 Min Read
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शिमला: किसी राज्य की सरकार चलाने में मुख्य सचिव की सबसे अहम भूमिका होती है. मुख्य सचिव ब्यूरोक्रेसी का टॉप बॉस होता है. वहीं, कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसी पुलिस का मुखिया भी सरकार की आंख व कान होता है. पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में वनों का महत्व सभी जानते हैं. यहां के जंगल देश के फेफड़े कहलाते हैं. ऐसे में इस विभाग के मुखिया की अहमियत आसानी से समझी जा सकती है. अब यहां एक अचरज भरी बात दर्ज की जाती है. हिमाचल में सरकार के तहत से तीनों पावरफुल कुर्सियों पर स्थाई अफसर नहीं हैं. यानी इन तीनों पदों का कार्यभार अतिरिक्त रूप से सौंपा गया है.

मुख्य सचिव संजय गुप्ता

मुख्य सचिव संजय गुप्ता के पास इस पद का अतिरिक्त कार्यभार है. पुलिस प्रमुख अशोक तिवारी के पास भी इस पद का अतिरिक्त कार्यभार है. वहीं, वन विभाग के प्रमुख यानी हेड ऑफ फॉरेस्ट्स के पद पर संजय सूद के पास भी अतिरिक्त कार्यभार है. यानी तीनों पदों पर स्थाई नियुक्ति नहीं है. अभी ये भी तय नहीं है कि आने वाले समय में इन पदों पर स्थाई नियुक्ति होती है या नहीं. आइए, देखते हैं सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू के व्यवस्था परिवर्तन के आलोक में इस अतिरिक्त कार्यभार वाली संस्कृति के क्या मायने हैं.

मुख्य सचिव संजय गुप्ता
मुख्य सचिव संजय गुप्ता (ETV Bharat)

प्रबोध सक्सेना को मिला था सेवा विस्तार

हिमाचल में संजय गुप्ता को मुख्य सचिव का अतिरिक्त कार्यभार मिलने से पहले आईएएस अधिकारी प्रबोध सक्सेना मुख्य सचिव थे. सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने 31 मार्च 2025 को प्रबोध सक्सेना को सेवा विस्तार दिया था. छह माह के सेवा विस्तार के बाद प्रबोध सक्सेना इसी साल सितंबर माह में रिटायर हो गए. जब कांग्रेस सत्ता में आई तो प्रबोध सक्सेना अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी थे और उनके पास वित्त विभाग का जिम्मा था. कांग्रेस के सबसे बड़े वादे ओपीएस को धरातल पर उतारने में प्रबोध सक्सेना की अहम भूमिका रही. वित्त संबंधी मामलों की गहरी समझ रखने के कारण ही सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने प्रबोध सक्सेना को मुख्य सचिव के पद की जिम्मेदारी दी थी. प्रबोध सक्सेना को 31 दिसंबर 2022 में मुख्य सचिव पद की जिम्मेदारी दी गई थी. उन्होंने पहली जनवरी 2023 को कार्यभार संभाला. वर्ष 1990 बैच के आईएएस अफसर प्रबोध सक्सेना को अब सरकार ने राज्य बिजली बोर्ड का अध्यक्ष बनाया है.

प्रबोध सक्सेना के बाद मुख्य सचिव पर अतिरिक्त व्यवस्था

प्रबोध सक्सेना मुख्य सचिव पद से विदा हुए तो इस टॉप सीट को हासिल करने के लिए बहुत रस्साकशी हुई. अंतत: बाजी संजय गुप्ता के हाथ आई, लेकिन उन्हें इस पद पर स्थाई नियुक्ति की जगह अतिरिक्त चार्ज दिया गया. संजय गुप्ता 1988 बैच के आईएएस अधिकारी हैं. वे मई 2026 में रिटायर होंगे. रिटायरमेंट से पहले उनकी सीट स्थाई होती है या नहीं, ये देखने वाली बात है. वैसे मुख्य सचिव पद के लिए 1993 बैच के आईएएस अफसर केके पंत के नाम की भी चर्चा थी. इसके अलावा हिमाचल से संबंध रखने वाले 1994 बैच के आईएएस ओंकार शर्मा का नाम भी काफी पहले सुर्खियों में था, लेकिन हिमाचल प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड के चीफ इंजीनियर विमल नेगी केस के बाद उनकी रिपोर्ट ने काम बिगाड़ दिया. फिलहाल, 1988 बैच के आईएएस संजय गुप्ता चीफ सेक्रेटरी तो जरूर हैं, लेकिन अतिरिक्त कार्यभार के रूप में ये जिम्मेदारी संभाल रहे हैं क्योंकि टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एंड हाउसिंग का जिम्मा भी उन्हीं के कंधों पर है.

हिमाचल के कार्यकारी डीजीपी अशोक तिवारी
हिमाचल के कार्यकारी डीजीपी अशोक तिवारी (ETV Bharat)

डीजीपी का कार्यभार भी अतिरिक्त तौर पर

हिमाचल पुलिस के डीजीपी का कार्यभार अशोक तिवारी के पास है, लेकिन ये व्यवस्था भी अतिरिक्त कार्यभार वाली है. जून 2025 को अशोक तिवारी ने डीजीपी पद का अतिरिक्त कार्यभार संभाला. वे डीजी विजिलेंस के पद पर थे, जब उन्हें डीजीपी के रूप में अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया. अभी तक ये व्यवस्था कायम है. डीजीपी पद पर नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार व यूपीएससी के तय नियमों के तहत नियुक्ति होती है और राज्य सरकार को समय पर प्रक्रिया पूरी करनी होती है. चूंकि हिमाचल सरकार ने समय पर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी नहीं की, इसलिए डीजीपी पद पर फिलहाल अतिरिक्त कार्यभार की व्यवस्था चल रही है.

अशोक तिवारी 1995 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. दिलचस्प बात है कि पावर कॉरपोरेशन के चीफ इंजीनियर विमल नेगी की संदेहास्पद मौत के मामले में हाईकोर्ट में पेश स्टेटस रिपोर्ट के विवाद में अतुल वर्मा की डीजीपी की कुर्सी गई थी. अतुल वर्मा रिटायरमेंट की दहलीज पर थे और उनकी लंबी सेवा से विदाई अप्रिय व कड़वी रही. अतुल वर्मा की जगह अशोक तिवारी डीजीपी बने, लेकिन व्यवस्था अतिरिक्त कार्यभार वाली है.

हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स का अतिरिक्त कार्यभार संजय सूद को सौंपा गया
हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स का अतिरिक्त कार्यभार संजय सूद को सौंपा गया (ETV Bharat)

संजय सूद को भी अतिरिक्त कार्यभार

हिमाचल प्रदेश वन विभाग के मुखिया HoFF यानी हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स का अतिरिक्त कार्यभार संजय सूद को सौंपा गया है. वे 31 अक्टूबर 2026 को रिटायर होंगे. उनसे पहले पवनेश कुमार को भी वन विभाग के मुखिया का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था. संजय सूद 1993 बैच के भारतीय वन सेवा यानी आईएफएस अधिकारी हैं.

राजभवन ने मांगा जवाब

वहीं, इस मसले पर एक आरटीआई एक्टिविस्ट की तरफ से राजभवन को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की गुहार लगाई गई थी. राजभवन ने भी इस पर सरकार को स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा है. राजभवन की तरफ से जारी आधिकारिक पत्र में मुख्य सचिव को संबोधित करते हुए टॉप पोस्टों पर एडहॉक नियुक्तियों यानी अतिरिक्त कार्यभार को लेकर सरकार से कमेंट मांगे गए हैं. इसमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव पद के अतिरिक्त कार्यभार को लेकर भी जिक्र किया गया है.

Himachal Raj bhawan
राजभवन तक पहुंचा मामला (Himachal Raj bhawan)

क्या है नफा-नुकसान ?

पूर्व वित्त सचिव व आईएएस अधिकारी केआर भारती इस व्यवस्था को लेकर कहते हैं, "इट्स नॉट इन गुड टेस्ट. अतिरिक्त कार्यभार की व्यवस्था में हमेशा एक तलवार लटकी रहती है. वो नाम के लिए मुखिया होता है, लेकिन उसे भी मालूम है कि ये अतिरिक्त कार्यभार है. अधीनस्थ अधिकारी व कर्मचारी भी असमंजस में रहते हैं. मुखिया कोई भी बोल्ड स्टेप उठाने से पहले सौ बार सोचता है. वहीं, सरकार भी इस विचार में रहती है कि अतिरिक्त व्यवस्था वाला किस्सा कभी भी खत्म किया जा सकता है. ऐसी व्यवस्था का नफा तो कोई नहीं, अलबत्ता नुकसान अधिक है. अतिरिक्त कार्यभार का अफसर को हटाना आसान होता है जबकि परमानेंट पोस्टिंग से हटाना चुनौतीपूर्ण होता है और इससे सरकार के साथ-साथ संबधित डिपार्टमेंट की कार्यप्रणाली पर भी असर पड़ता है. अफसर के स्टाफ और टीम का मोरल पर भी असर पड़ता है."

इस मामले पर अब हिमाचल में सियासत भी हो रही है और बीजेपी सरकार को इस मोर्चे पर घेर रहा है. हालांकि इस मसले पर सरकार की अपनी दलील है.

भाजपा के प्रदेश मीडिया संयोजक कर्ण नंदा कहते हैं, "हिमाचल में ऐसा पहली बार हुआ है कि ऊंचे पदों पर अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है ये भ्रष्टाचार को संरक्षण देने जैसा है. ऐसी कार्यप्रणाली से सरकारी कामकाज पर नकारात्मक असर पड़ता है. ऐसा प्रतीत होता है कि ये सरकार अतिरिक्त कार्यभार की व्यवस्था वाली सरकार है."

कैबिनेट मंत्री हर्षवर्धन चौहान का कहना है कि किस पद और किसे कौन सा चार्ज देना है ये सीएम का विशेषाधिकार है और सीएम अपने अधिकार व विवेक का प्रयोग कर इम मामलों में फैसला लेते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार धनंजय शर्मा कहते हैं कि "अतिरिक्त कार्यभार पहले भी दिए जाते रहे हैं, लेकिन टॉप पोस्टों पर ऐसी व्यवस्था हैरत में तो डालती है. सरकार को स्थाई नियुक्ति का रास्ता ही अपनाना चाहिए. वैसे हिमाचल में मुख्य सचिव के लिए बेशक सीनियोरिटी को नजरअंदाज कर और सुपरसीड कर जूनियर अफसर को मुख्य सचिव का पद दिया जाता रहा है. उदाहरण के लिए वीसी फारका तो अपने से पहले वाले बैच के कई अफसरों को सुपरसीड कर सीएस बनाए गए थे, लेकिन एक साथ तीन प्रमुख पदों पर अतिरिक्त कार्यभार वाली व्यवस्था असहज करने वाली है".

पेंशनर्स की मुखर आवाज वरयाम सिंह बैंस का कहना है, "सरकार के फैसले भी एडहॉक लग रहे हैं. सरकार में मुख्य सचिव सबसे अधिक प्रभाव रखते हैं. टॉप ब्यूरोक्रेसी पर तैनात लोग नियमित होने चाहिए. एडहॉक व्यवस्था कभी भी अच्छी नहीं मानी जा सकती".

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