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कौन था थारन्टन स्मिथ ? जिसके नाम की जंजीर को तोड़ना चाहते हैं मितौली के ग्रामीण

लखीमपुर खीरी के इस गांव के लोग पिछले 30 साल से नाम बदलने की लड़ रहे लड़ाई.

यूपी के थारन्टन स्मिथ गांव की कहानी.
यूपी के थारन्टन स्मिथ गांव की कहानी. (Photo Credit; ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 26, 2026 at 8:16 PM IST

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Updated : February 26, 2026 at 8:22 PM IST

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रिपोर्ट: मयंक त्रिवेदी

लखीमपुर खीरी: करीब 2 हजार की आबादी वाली ग्राम पंचायत. कच्चे रास्ते-मकान और आसपास जंगल का इलाका. कहीं से भी आधुनिकता इसे छू तक नहीं गई है. फिर गरीबी भी यहां डेरा डाले बैठी है. एक नजर में यह किसी भी तरह आज के समय के साथ कदम बढ़ाता नहीं दिखता. लेकिन, आप इसका नाम सुनेंगे तो चौंक जाएंगे. नाम है, थारन्टन स्मिथ. गांव वालों के सामने वैसे तो कई समस्याएं हैं, लेकिन पिछले कई सालों से यह नाम ही उनके लिए फांस बना है. वे इस नाम से छुटकारा चाहते हैं, मगर सारे प्रयासों के बावजूद विफल ही रहे. गांववालों को नहीं मालूम कि यह नाम कब और क्यों पड़ा? मितौली ब्लॉक की इस ग्राम पंचायत के लोगों को इस नाम के कारण क्या परेशानी आ रही है? उन्होंने नाम बदलने के लिए क्या-क्या उपाय किए? और आखिर यह थारन्टनस्मिथ था कौन? इसी पर प्रकाश डालती ईटीवी भारत की खास रिपोर्ट...

गुमनाम अफसर के नाम पर बसा गांव. (Video Credit; ETV Bharat)

ऐसे शुरू हुई नाम बदलने की लड़ाई: मितौली ब्लॉक के जंगलों के बीच कठिना नदी के किनारे यह गांव बसा है. गांव का मुख्य मार्ग भी जंगल से होकर जाता है. यहां नदी के किनारे एक शिव मंदिर है, जिसे भाभदा नाथ के नाम से जाना जाता है. वैसे तो गांव का नाम थारन्टन स्मिथ होने से लोग यहां हमेशा से ही परेशान थे, लेकिन नाम बदलने का प्रयास पिछले करीब 30 साल पहले शुरू हुआ. तहसील दिवस जैसे आयोजनों में भी गांव के लोगों ने आवेदन दिए, लेकिन नाम नहीं बदला जा सका. गांव के बाहर लगे बोर्ड पर भी थारन्टन स्मिथ ही लिखा है. इसके अलावा स्कूल, पंचायत घर, आंगनबाड़ी केंद्र से लेकर पीडब्ल्यूडी विभाग के दफ्तर तक, हर जगह थारन्टन स्मिथ ही लिखा मिलेगा. ये बात और है कि इस नाम को लेने में गांव के लोगों की जुबान लड़खड़ा जाती है. कोई पूछे तो सीधे बता भी नहीं पाते.

थारन्टन स्मिथ गांव के बारे में जानिए
थारन्टन स्मिथ गांव के बारे में जानिए (Photo Credit; ETV Bharat)

बोलचाल में गांव का नाम कुछ और: वैसे तो बार-बार के आवेदनों के बाद भी थारन्टन स्मिथ का नाम नहीं बदला जा सका. गांव के लोगों की भाभदा नाथ पर श्रद्धा है, इसलिए बोलचाल में ही नाम बदल दिया है. लोग पूछने पर गांव का नाम भाभदा ग्रंट बताने लगे हैं. हालांकि, लिखापढ़ी में यह नहीं चलता. किसी भी तरह के आवेदन, योजना के लाभार्थी के तौर पर, पहचान पत्र में लोगों को लिखना थारन्टन स्मिथ ही पड़ता है. कुछ लोगों का मानना है कि यह नाम गुलामी की याद दिलाता है, इसलिए भी इसे बदलना जरूरी है. एक और परेशानी बच्चों को लेकर है. बच्चे थारन्टन स्मिथ नाम ले ही नहीं पाते. लिखने में भी गलती कर ही देते हैं.

नाम के पीछे रोचक कहानी.
नाम के पीछे रोचक कहानी. (Photo Credit; ETV Bharat)

नाम के पीछे की क्या है कहानी: थारन्टन स्मिथ नाम के पीछे अंग्रेजी काल जुड़ा बताया जाता है. नामकरण ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के एक अधिकारी के नाम पर माना जाता है. लखीमपुर खीरी जिला 1858 के बाद ब्रिटिश प्रशासन के पूर्ण नियंत्रण में आया था. उस दौरान कई क्षेत्रों या अनुदानों (Grants) के नाम ब्रिटिश अधिकारियों पर रखे गए थे. सरकारी दस्तावेजों और जनगणना के आंकड़ों में इस गांव को "थारन्टन स्मिथ ग्रांट" के रूप में दर्ज किया गया है. 'ग्रांट' शब्द यह दर्शाता है कि यह भूमि किसी विशिष्ट व्यक्ति (संभवतः थारन्टन स्मिथ नामक अधिकारी) को ब्रिटिश शासन द्वारा पट्टे के तहत दी गई होगी.

नाम बदलने की लड़ाई.
नाम बदलने की लड़ाई. (Photo Credit; ETV Bharat)

क्या कहते हैं ग्राम प्रधान: ग्राम प्रधान प्रोग्राम लाल बताते हैं कि यह गांव ठेठ भाषा में भाभदा ग्रंट कहा जाता है, लेकिन लिखापढ़ी में नहीं. कहा कि थारन्टन स्मिथ नाम बहुत अजीब लगता है. चाहते हैं कि इस अंग्रेजी नाम को हटा दिया जाए. गांव के प्रधानाध्यापक अजय कुमार ने बताया जब यहां पोस्टिंग हुई और आया तो यह नाम बहुत अजीब सा लगा. परेशानी यह है कि कहीं भी सरकारी कागज बनवाने जाते हैं तो ग्रामीण से लेकर अधिकारी तक गांव का नाम लिखने में गलती कर जाते हैं. यही पता चला है कि कोई अंग्रेज अफसर यहां आया था, वही यह नाम रखकर चला गया.

स्कूल के बाहर गांव के लोग.
स्कूल के बाहर गांव के लोग. (Photo Credit; ETV Bharat)

नाम बदले और विकास भी हो: इस गांव के लोग सिर्फ नाम ही नहीं बदलना चाहते, वे अपने इलाके में विकास भी चाहते हैं. नाम तो गांव का अंग्रेजी है, लेकिन दशा किसी पिछड़े क्षेत्र से भी खराब. उनका कहना है कि गांव बहुत ही पिछड़ा है. सुधार की आवश्यकता है. बड़ी आबादी मुख्य धारा से कटी हुई है. विकास भी बहुत कम हुआ है. गांव के जंगल से सटा होने के कारण भी बहुत असुविधा हो रही है. इस गांव तक आने के लिए मात्र एक रास्ता है.

अगर जंगल के रास्ते आया जाए तो जंगली जानवरों का भी खतरा रहता है. गांव की एक बुजुर्ग महिला राजकुमारी कहती हैं कि यह अंग्रेजी नाम हटना चाहिए. गांव का नाम भाभदा रखा जाना चाहिए. अब देखना यह है कि किसी अंग्रेज के नाम पर बसा यह गांव आखिर कब अपनी पहचान पा सकेगा?

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Last Updated : February 26, 2026 at 8:22 PM IST