हाईकोर्ट के दो बड़े फैसले: प्रबोधक भर्ती मामले में सरकार के आदेश पर रोक, महिला शिक्षिका को परिलाभ देने के निर्देश
हाईकोर्ट ने प्रबोधकों के सेवा परिलाभ वापस लेने और महिला शिक्षिका की सेवा गणना की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए फैसले दिए.

Published : December 31, 2025 at 8:47 PM IST
जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ही भर्ती में बाद में नियुक्त प्रबोधकों को दिए गए सेवा परिलाभ सहित अन्य नोशनल परिलाभों को वापस लेने के राज्य सरकार के आदेश पर रोक लगा दी है. इसके साथ ही अदालत ने मामले में शिक्षा सचिव, प्रारंभिक शिक्षा निदेशक और अलवर डीईओ सहित अन्य को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है. जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह आदेश लक्ष्मण सिंह राजपूत व अन्य की याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिए.
याचिका में अधिवक्ता रामप्रताप सैनी ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने प्रबोधक पद के लिए भर्ती निकाली थी, जिसमें कुछ अभ्यर्थियों को साल 2009 में नियुक्ति मिली थी. वहीं याचिकाकर्ताओं को कई साल बाद 2017 में नियुक्ति दी गई. साल 2018 में उन्हें अदालती आदेश की पालना में पूर्व में नियुक्त अन्य प्रबोधकों के समान सेवा परिलाभ व अन्य नोशनल परिलाभ दिए गए. याचिका में कहा गया कि गत 3 नवंबर को शिक्षा विभाग ने 2018 में दिए आदेश को वापस ले लिया और इस अवधि में दिए गए वेतन को अधिक बताकर उसकी रिकवरी निकाल दी.
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इसे अदालत में चुनौती देते हुए कहा गया कि एक ही भर्ती में अलग-अलग समय पर नियुक्त अभ्यर्थियों को समान वेतन परिलाभ और वरिष्ठता दी जाती है. विभाग ने अदालत के आदेश की पालना में उन्हें यह परिलाभ अदा किया था, ऐसे में विभाग उन्हें वापस नहीं ले सकता. इसके अलावा विभाग की ओर से आदेश वापस लेने से पूर्व याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का मौका भी नहीं दिया गया. ऐसे में विभाग की इस कार्रवाई को अवैध घोषित कर रद्द किया जाए, जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने परिलाभ वापस लेने के विभाग के आदेश पर रोक लगाते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है.
महिला शिक्षिका को परिलाभ देने के निर्देश: राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिए हैं कि वह दौसा जिले के महुआ ब्लॉक में साल 1997 में तैनात महिला शिक्षक के सेवाकाल की गणना उसकी प्रथम नियुक्ति तिथि से करते हुए उसे समस्त सेवा परिलाभ अदा करने को कहा है. जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह आदेश सरूपी बाई मीणा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए.
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याचिका में अधिवक्ता विजय पाठक ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति साल 1997 में तृतीय श्रेणी शिक्षक पद पर हुई थी. याचिकाकर्ता ने 4 मार्च 1997 को कार्यभार भी ग्रहण कर लिया था. बाद में राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता को ग्रीष्मावकाश का वेतन नहीं देने का निर्णय लिया और इस अवधि में उसकी सेवा ब्रेक मानी गई. इसके साथ ही उसे 1 जुलाई से सेवा में नियमित मानते हुए वार्षिक वेतन वृद्धि, चयनित वेतनमान और वरिष्ठता आदि का लाभ दिया.
याचिका में इसे चुनौती देते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति मार्च माह में ही हो गई थी, ऐसे में उसकी सेवा की गणना भी उसी तिथि से होनी चाहिए थी. राज्य सरकार की मनमानी से उसे सेवा परिलाभ देरी से दिए गए और इस कारण वह अपने साथी शिक्षकों से पिछड़ गई, इसलिए उसकी प्रथम नियुक्ति तिथि से ही सेवाकाल की गणना करते हुए समस्त परिलाभ दिए जाएं, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह याचिकाकर्ता को समस्त सेवा परिलाभ प्रथम नियुक्ति तिथि से गणना कर अदा करें.
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