दिल्ली में निजी स्कूलों के लिए न्यूनतम भूमि क्षेत्र की अनिवार्यता समाप्त, शिक्षा निदेशालय का बड़ा आदेश
बता दें कि पिछले एक दशक से शिक्षा क्षेत्र में भूमि की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी.

Published : September 1, 2026 at 8:49 AM IST
नई दिल्ली: दिल्ली में शिक्षा के विस्तार और निजी स्कूलों के संचालन को लेकर उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार ने अहम फैसला लिया है. शिक्षा निदेशालय, निजी स्कूल शाखा (दिल्ली सरकार) की ओर से इस संबंध में एक आधिकारिक आदेश जारी किया गया है, जिसके तहत मान्यता, मान्यता के विस्तार और स्कूलों के अपग्रेडेशन के लिए भूमि के न्यूनतम क्षेत्रफल की निश्चित अनिवार्यता को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है. इस निर्णय से विशेषकर घनी आबादी वाले और पुराने शहरी क्षेत्रों में नए स्कूल खोलने तथा मौजूदा स्कूलों का विस्तार करने की राह में आ रही बड़ी बाधाएं दूर हो गई हैं.
शिक्षा निदेशालय (निजी स्कूल शाखा) की निदेशक व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अंकिता आनंद द्वारा जारी आदेश के अनुसार, दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 3 के साथ पठित धारा 4 और इसी अधिनियम के नियम 43 तथा नियम 50 व 51 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए यह कदम उठाया गया है. इस आदेश को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है. इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद अब दिल्ली के मान्यता प्राप्त गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों के लिए भूमि के आकार को लेकर कोई कड़े और एकसमान पेचीदगियों वाले नियम लागू नहीं होंगे, जिन्हें पूरा करना कई प्रबंधन समितियों के लिए कठिन हो रहा था.
विभाग द्वारा स्पष्ट किया गया है कि शिक्षा निदेशालय द्वारा मान्यता प्रदान किए जाने का यह अर्थ कतई नहीं लगाया जाएगा कि संबंधित स्कूल को किसी संबद्ध बोर्ड या अन्य स्टेच्युटरी अथॉरिटी के नियमों से छूट मिल गई है. स्कूल को अपने बोर्ड की सभी औपचारिकताओं और भूमि मानकों को पूरा करना होगा, लेकिन निदेशालय स्तर पर मान्यता के लिए अब न्यूनतम वर्ग मीटर भूमि का पुराना दबाव नहीं रहेगा. इस कदम से विशेष तौर पर पुरानी और घनी बस्तियों में छोटे परिसरों में चलने वाले विद्यालयों को बड़ी राहत मिलेगी, जो अंतरिक्ष की कमी के कारण कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त करने में कठिनाई महसूस करते थे.
बता दें कि पिछले एक दशक से शिक्षा क्षेत्र में भूमि की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी. दिल्ली जैसे महानगर में, जहां जमीन के दाम अधिक हैं और भूखंडों का आकार सीमित है, वहां बड़े भूखंडों की अनिवार्यता के चलते कई बेहतरीन शिक्षण संस्थान औपचारिक मान्यता के दायरे में आने से वंचित रह जाते थे. इस नई नीति के तहत अब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और छात्रों के समग्र विकास को प्राथमिकता दी जाएगी. हालांकि, बाल अधिकार संरक्षण, सुरक्षा मानकों, खेलकूद के बुनियादी साधनों और आरटीई अधिनियम, 2009 के प्रावधानों का पालन करना स्कूलों के लिए अनिवार्य बना रहेगा.
शिक्षा निदेशालय के इस आदेश की प्रतियां उपराज्यपाल के प्रधान सचिव, मुख्यमंत्री के सचिव, शिक्षा मंत्री के सचिव, मुख्य सचिव, शिक्षा प्रधान सचिव तथा सभी जिला उप-शिक्षा निदेशकों को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेज दी गई हैं. साथ ही, निदेशालय की आईटी शाखा को निर्देश दिए गए हैं कि इस आदेश को तत्काल विभागीय वेबसाइट पर अपलोड किया जाए ताकि सभी संबंधित संस्थान और आम जनता इसकी जानकारी प्राप्त कर सकें. यह निर्णय दिल्ली की भौगोलिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया एक व्यावहारिक कदम है. इससे न केवल अनाधिकृत या संघर्षरत स्कूलों को पारदर्शी व्यवस्था में आने का मौका मिलेगा, बल्कि शिक्षा के अधिकार के तहत बेहतर शैक्षणिक माहौल सृजित करने में भी मदद मिलेगी.
मुख्य तथ्य
- न्यूनतम भूमि अनिवार्यता समाप्त: निदेशालय ने ताजा मान्यता, विस्तार या उच्चीकरण के लिए कोई तय न्यूनतम भूमि क्षेत्र निर्धारित नहीं किया है.
- बोर्ड के मानक लागू: एफिलिएशन से जुड़े भूमि संबंधी नियम अब संबंधित बोर्ड (जैसे सीबीएसई आदि) के दिशा-निर्देशों के तहत संचालित होंगे.
- कानूनी अनुपालन जरूरी: दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम और आरटीई अधिनियम, 2009 के अन्य सभी वैधानिक प्रावधान पहले की तरह सख्ती से लागू रहेंगे.
- पुराना आदेश निरस्त: 28 मई 2014 को जारी किया गया वह पुराना सर्कुलर तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया है जिसमें न्यूनतम भूमि के कड़े पैमाने तय थे.
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