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Save Aravalli: वो पुरानी दीवार जो रेगिस्तान को रोकती है, लेकिन अब खुद खतरे में है

हिमालय से भी पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली आज खनन और नई कानूनी परिभाषा के कारण खतरे में है.

खतरे में अरावली
खतरे में अरावली (ETV Bharat GFX)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : December 21, 2025 at 7:03 AM IST

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भरतपुर: बात कर रहे हैं एक बहुत पुरानी दीवार की, जो करोड़ों साल से खड़ी है. ये दीवार सिर्फ पत्थरों की नहीं बनी है, बल्कि इसमें जीवन भी है. पेड़, पशु-पक्षी, नदियां और लोगों की आस्थाएं हैं, ये दीवार है अरावली पर्वत श्रृंखला. दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, जो गुजरात से दिल्ली तक फैली हुई है और राजस्थान के दिल से गुजरती है. थार का रेगिस्तान एक तरफ है, जो हर साल आगे बढ़ना चाहता है और दूसरी तरफ हरे-भरे मैदान वाला अरावली पर्वत इन दोनों के बीच खड़े होकर कहता है, इसके आगे नहीं.

लेकिन आज इस दीवार पर संकट है. खनन की मशीनें, निर्माण की भूख और अब एक नई कानूनी परिभाषा सब मिलकर इसे कमजोर करना चाह रहे हैं. पर्यावरणविद डॉ. सत्यप्रकाश मेहरा की आवाज में चिंता साफ झलकती है. डॉ. मेहरा, जो वर्षों से पक्षियों, जंगलों और पानी की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं, वे कहते हैं, "अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, ये हमारी सांस है, हमारा पानी है, हमारी संस्कृति है, अगर इसे सिर्फ ऊंचाई से नापा जाएगा, तो हम अपनी जड़ें ही काट लेंगे."

खतर में अरावली पर्वत (ETV Bharat Bharatpur)

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पानी की रखवाली करने वाली चट्टानें: डॉ. मेहरा बताते हैं कि अरावली की चट्टानें बहुत खास हैं. ये कठोर हैं, लेकिन इनमें दरारें हैं जो बारिश के पानी को अंदर सोख लेती हैं. जैसे एक बड़ा स्पंज. उत्तर-पश्चिम भारत में भूजल का बड़ा हिस्सा इसी अरावली से भरता है. यहां से एक महत्वपूर्ण 'वॉटर डिवाइड लाइन' गुजरती है, यानी बारिश का पानी किस नदी की तरफ बहना है, ये अरावली तय करती है.

नए कानून के बाद अगर इन छोटी-बड़ी पहाड़ियों को समतल कर दिया जाएगा, तो पानी कहां जाएगा? सीधे बहकर रेगिस्तान में मिल जाएगा. डॉ. सत्यप्रकाश मेहरा कहते हैं कि भरतपुर का उदाहरण ही ले लीजिए, कभी यहां बाढ़ आती थी, लेकिन अब पानी की कमी है. कैनाल बनाएंगे तो पानी कहां से आएगा? अगर अरावली कमजोर हुई, तो थार का रेगिस्तान गांगेय मैदानों तक पहुंच सकता है. सूखा बढ़ेगा और रेगिस्तानीकरण तेज हो जाएगा होगा.

खतरे में अरावली पर्वत
खतरे में अरावली पर्वत (ETV Bharat GFX)

छोटी पहाड़ियां, बड़ा जीवन: डॉ. मेहरा ने बताया कि लोग सोचते हैं अरावली मतलब सिर्फ ऊंची-ऊंची चोटियां. लेकिन डॉ. मेहरा कहते हैं, "ये गलत है." भारतीय वन सर्वेक्षण के पुराने आकलन बताते हैं कि 20-30 मीटर ऊंची पहाड़ियां, जिनका ढलान सिर्फ 5 डिग्री है, वो भी बहुत महत्वपूर्ण हैं. इन पर तरह-तरह के पेड़-पौधे उगते हैं, जो पक्षियों और जानवरों को घर देते हैं. कभी अरावली एक पूरा 'इकोलॉजिकल कॉरिडोर' थी. बड़े जंगली बिल्ली जैसे तेंदुए एक जगह से दूसरी जगह घूमते थे. लेकिन अब खनन, सड़कें और निर्माण ने इसे टुकड़ों में बांट दिया है.

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ऊंचाई से नापी जा रही प्रकृति?: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की एक नई परिभाषा स्वीकार की है. अब सिर्फ वो पहाड़ियां 'अरावली' कहलाएंगी जो स्थानीय स्तर से 100 मीटर ऊंची हों. इससे 90% से ज्यादा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है. डॉ. मेहरा चेताते हैं, "प्रकृति को इंसानी सुविधा से नहीं नापा जा सकता. अगर छोटी पहाड़ियां गईं, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में पड़ जाएगा." खनन कंपनियां खुश हैं, लेकिन पर्यावरणविद दुखी. राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में विरोध हो रहा है. खनन से पहाड़ियां गायब हो रही हैं, धूल उड़ रही है, पानी सूख रहा है.

आस्था और संस्कृति की जड़ें: अरावली सिर्फ जंगल नहीं, ये संस्कृति का हिस्सा है. बृज की कृष्ण लीला से जुड़े स्थल, प्राचीन मंदिर – सब इन पहाड़ियों में बसे हैं. डॉ. मेहरा कहते हैं, "इन्हें तोड़ना मतलब हमारी विरासत को मिटाना है."

डॉ. मेहरा की आवाज में उम्मीद भी है. वो कहते हैं, "ये लड़ाई प्रकृति बनाम इंसान की नहीं, बल्कि समझदारी बनाम लालच की है." हमें अरावली को बचाना होगा, क्योंकि ये हमारा भविष्य है. अगर ये दीवार गिरी, तो रेगिस्तान हमारे दरवाजे पर आएगा. पानी सूख जाएगा, हवा जहरीली हो जाएगी, और हमारी आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी – "आपने वो पुरानी दीवार क्यों गिरने दी?" अरावली चुपचाप खड़ी है, लेकिन अब उसकी आवाज हम सबको सुनाई दे रही है. सुनेंगे हम?

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