ETV Bharat / state

2025 में आस्था से सराबोर हुई देवभूमि: शांत की दिव्यता, भुंडा की भव्यता और चालदा महाराज की यात्रा से यादगार बना ये साल

हिमाचल के लिए 2025 धार्मिक दृष्टि से भक्तिमय रहा. इस साल भुंडा,शांत जैसे महायज्ञ हुए. चालदा महाराज की यात्रा के ग्वाह भी लोग बने.

2025 में आस्था से सराबोर हुई देवभूमि
2025 में आस्था से सराबोर हुई देवभूमि (GFX)
author img

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : December 29, 2025 at 7:32 PM IST

11 Min Read
Choose ETV Bharat

शिमला: देवभूमि हिमाचल प्रदेश के लिए साल 2025 धार्मिक दृष्टि से दिव्य और भव्य रहा है. हिमालय की गोद में फल फूल रही पहाड़ी सभ्यता ने साल भर धार्मिक और संस्कृत विरासत को अनुभव किया है. ईटीवी भारत आपको साल 2025 के उस दैवीय सफर पर ले जा रहा है जहां पारंपरिक देव संस्कृति की दिव्यता आधुनिक दौर में भव्यता से मिलती नज़र आती है. साल की शुरुआत में भुंडा महायज्ञ के दिव्य आयोजन ने जहां हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का काम किया. वहीं, साल के आखिर में चालदा महाराज की अलौकिक हिमाचल यात्रा ने हिमाचल और उत्तराखंड के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक सेतु बांधने का काम किया.

रोहड़ू की स्पैल वैली में हुआ भुंडा महायज्ञ

जनवरी 5 साल 2025, हिमाचल प्रदेश जिला शिमला के रोहड़ू उपमंडल में स्थित स्पैल वैली में आस्था का सैलाब उमड़ पाड़ा. स्पैल वैली के दलगांव में देवता बकरालू जी महाराज के मंदिर में भुंडा महायज्ञ समापन हुआ. इस बड़े धार्मिक अनुष्ठान के दौरान स्थानीय देवताओं की पूजा-अर्चना से पूरे क्षेत्र में धार्मिक माहौल बना रहा. 4 दिनों तक चले इस आस्था के महापर्व में प्रदेश भर से अनुमानित 5 लाख लोगों ने दलगांव पहुंच कर देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त किया. इस महायज्ञ का बजट 100 करोड़ रुपये के आस पास आंका गया. इस भुंडा महायज्ञ में सबसे बढ़िया आकर्षण का केंद्र बेड़ा रहा. जहां रस्सी पर झूलते हुए एक व्यक्ति को घास की रस्सी पर करनी होती है. इस महायज्ञ में बेड़ा सूरत राम ने मुंजी नाम की घास से बनी विशेष रस्सी पर 9वीं बार मौत की घाटी को पार किया. भुंडा महायज्ञ अपनी भव्यता के चलते आज हिमाचल की समृद्ध और प्राचीन संस्कृति का प्रतीक माना जा रहा है.

भुंडा यज्ञ
भुंडा यज्ञ (ETV Bharat)

39 साल बाद हुआ भुंडा महायज्ञ

देवता बकरालू जी की भूमि स्पैल घाटी में पले-बढ़े अभय प्रताप सिंह हाटू कहते हैं 'इस भुंडा महायज्ञ का आयोजन और इसका खर्च पूर्ण रूप से देवता बकरालू जी की ओर करवाया गया था. मुख्य रूप से इस महायज्ञ का आयोजन इलाके की तीन बड़ी शक्तियां देवता साहेब बकरालू, देवता जी महेश्वर और बोंद्रा देवता की ओर किया जाता है. इसके अलावा देवता मोहरिश इस महायज्ञ में फेर का दायित्व निभाते हैं. रामपुर की सीमा से लेकर रोहड़ू तक लगभग 80 गांव इन तीनों प्रमुख शक्तियों को मानते हैं. बकरालू महाराज के मंदिर में लगभग 39 साल बाद भुंडा महायज्ञ का आयोजन किया गया. इससे पहले 1985 में भुंडा महायज्ञ का आयोजन किया गया था.'

भुंडा महायज्ञ में रस्सी चढ़ता बेढ़ा
भुंडा महायज्ञ में रस्सी चढ़ता बेढ़ा (ETV Bharat)

बेड़े की रस्म देखने एक दिन में डालगांव पहुंचे 3 लाख लोग

पौराणिक कथाओं के अनुसार हर 12 साल बाद भुंडा अलग अलग क्षेत्रों में आयोजित होता था, लेकिन अब इस धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन कई वर्षों में एक बार हो पता है. भुंडा महायज्ञ का मुख्य आकर्षण बेड़ा है. अभय प्रताप सिंह हाटू ने बताया कि 'एक विशेष समुदाय के लोग ही बेड़ा की रस्म निभाते हैं यह परिवार पहले कुल्लू के निरमंड में रहा करता था. बाद देवता साहब बकरालू ने इन्हें स्पैल घाटी में बसाया और अब रामपुर से लेकर मंडी क्षेत्र तक जहां भी बड़े होते हैं देवता साहब की इजाजत से यही परिवार बेड़े की रस्म निभाता है. अभय प्रताप का कहना है कि 4 दिन चलने वाले इस धार्मिक कार्यक्रम में तीसरे दिन बेड़े की रस्म निभाई जाती है. केवल इसी एक दिन करीब 3 लाख लोग दलगांव पहुंचे थे.'

रस्सी पार करता बेढ़ा
रस्सी पार करता बेढ़ा (ETV Bharat)

80 वर्षों के बाद कुल्लू दशहरा में पहुंचे नाग देवता

साल 2025 दिन 2 अक्टूबर, हर साल की तरह दशहरे के सुअवसर पर कल्लू के ढालपुर मैदान में दैवीय शक्तियों का कुंभ सजा. वैसे तो हर साल सैकड़ो की तादात में यहां देवता आकर भगवान रघुनाथ से मिलते हैं, लेकिन साल 2025 के कुल्लू दशहरे में एक विशेष अतिथि का आगमन हुआ. कुल्लू दशहरे के इतिहास में करीब 80 वर्षों के बाद मंडी के साथ लगते आउटर सिराज क्षेत्र से नाग देवता कुल्लू दशहरा में पहुंचे. साल 2025 दूसरा समूह का था जब नाग देवता ह्रिगुनाग ढालपुर मैदान पहुंचे. कुल्लू दशहरे की परंपरा को बेहद करीब से जानने वाले डॉ. सूरत ठाकुर कहते हैं 'कल्लू राज परिवार के राजा महेश्वर सिंह के विशेष आग्रह पर आउटर सिराज क्षेत्र के ये नाग देवता कुल्लू दशहरा में पहुंचे थे. ह्रिगुनाग देवता को जिला प्रशासन की ओर से भी पूरे सहयोग का श्वसन दिया गया था इसके बाद देवता ने कुल्लू दशहरा में भाग लिया.डॉ. सूरत ठाकुर का कहना है कि इस बार विभिन्न क्षेत्रों के 332 देवता कुल्लू दशहरे में पहुंचे.'

कुल्लू के नग्गर में तीसरी बार जुटी देव संसद

देवभूमि हिमाचल प्रदेश में लोकतंत्र की स्थापना से पहले एक समानांतर देवसत्ता चली आ रही है, जो आज भी विद्यमान है. पर्वतीय ढलनों पर बसी इन सभ्यताओं के स्थानीय देवता वहां के असल शासक भी हैं और न्यायाधीश भी. तारीख 30 नवंबर साल 2025, पहाड़ी प्रदेश हिमाचल के कुलूत देश में में देवसत्ता के होने का अनुभव करवाने वाली जगती बुलाई गई."जगती" यानि वह देव संसद जहां लगातार दो वर्षों से आपदा का दंश झेल रहे हिमाचल ने देवताओं का न्याय सुना. 30 नवंबर 2025 के दिन ये तीसरा मौका था जब नग्गर में देव संसद बुलाई गई. यहां कुल्लू के कई देवताओं ने पहुंच कर प्रदेश में आपदा से हो रहे नुकसान पर देवताओं ने अपना फैसला सुनाया.

कुल्लू में जगती का आयोजन
कुल्लू में जगती का आयोजन (ETV Bharat)

जगती में देवताओं ने सुनाए ये फैसले

कल्लू की समृद्धि संस्कृति के जानकार डॉ. सूरत ठाकुर कहते हैं 'मैंने अपने जीवन में अब तक केवल पांच बार देवसंसद का आयोजन देखा है. जगती की परंपरा केवल कुल्लू में है और समाज को प्रभावित करने वाले किसी भी बड़े विषय पर जगती बुलाई जाती है. पिछले दो वर्षों में भारी बरसात ने कुल्लू में भयंकर तबाही मचाई. इसी विषय पर इस बार नग्गर में जगती बुलाई गई थी. सभी देवताओं ने एक मत से प्रकृति और देवस्थानों के साथ छेड़छाड़ न करने का संदेश दिया. देवताओं समाज को बांधने वाले पुराने रीति रिवाज को बनाए रखने और गोवंश को आवारा न छोड़ने का फैसला सुनाया.'

देवताओं ने ऐसे नग्गर पहुंचाया था जगती पट

डॉ. सूरत ठाकुर कहते हैं देव संसद यानी जगती का अर्थ है जगत कल्याण के लिए देवता का कथन. परंपरा के मुताबिक देवताओं के आदेश पर कल्लू के राजा सभी देवताओं को जगाती में आने का न्योता देते हैं. भगवान रघुनाथ की अध्यक्षता में कुल्लू या नग्गर में इसका आयोजन होता है. डॉ. सूरत ठाकुर पौराणिक मान्यता का जिक्र करते हुए कहते हैं नग्गर में 8 फीट लंबी 5 फीट चौड़ी और करीब 8 इंच मोटी विशाल शीला स्थापित है जिसे जगती पट कहा जाता है. मान्यता है कि कल्लू के देवताओं ने मधुमक्खियां बन कर इस जगती पट को नग्गर में स्थापित किया था. तभी से ये विशाल शीला धर्म और न्याय पटल बनी हुई है. इसी जगती के माध्यम से देवताओं ने बलि प्रथा और कुल्लू में स्की ग्लेजिंग के विरोध जैसे कई विषयों पर अपने फैसले सुनाए हैं.

54 वर्षों के बाद नागेश्वर महाराज की भूमि पर हुआ महायज्ञ शांत

साल 2025 के आखिरी महीने दिसंबर की सर्दियों में भी आस्था की गर्माहट बनी रही. साल 2025 के दिसंबर महीने की 4,5 और 6 तारीख को शिमला के जुब्बल क्षेत्र में देव आस्था का एक और बड़ा उत्सव मनाया गया. आधी सदी के बाद देवता साहेब नागेश्वर महाराज की धरती झड़ग में शांत महायज्ञ संपन्न हुआ. शांत महायज्ञ को पहाड़ों पर विकसित हो रही सभ्यता की मूल सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ दैवीय शक्तियों के आशीर्वाद का अनुष्ठान माना जाता है. पांच दशक बाद हुए इस भव्य आयोजन में लोग हजारों की तादात में पहुंचे और यज्ञ प्रसाद पाया.

शांत महायज्ञ
शांत महायज्ञ (ETV Bharat)

देव प्रांगण के साथ साथ घरों में भी उत्सव का माहौल

ऊपरी शिमला के जुब्बल क्षेत्र में आने वाले झड़ग गांव में 4 दिसंबर से इस महा आयोजन का शुभारंभ हुआ. झड़ग निवासी सुंदर सिंह चौहान बताते हैं कि '54 साल के बाद देवता साहेब नागेश्वर महाराज के शांत महायज्ञ का आयोजन हुआ. तीन दिनों तक चलने वाले शांत महायज्ञ की तैयारी तो बहुत पहले शुरू हो जाती हैं. देव प्रांगण के साथ साथ घरों में भी उत्सव का माहौल रहता है. तीन दिनों तक चले इस कार्यक्रम में करीब 1 लाख के आसपास लोग इस महायज्ञ का हिस्सा बने. सफलतापूर्वक किस कार्यक्रम का आयोजन किया गया और प्रशासन की ओर से भी उन्हें पूर्ण रूप से सहायता मिली.'

सुंदर सिंह चौहान कहते हैं कार्यक्रम का पहला दिन संघेड़ा कहा जाता है. ये मेहमान देवताओं और ख़ूदों के स्वागत का कार्यक्रम है. इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से देवता साहेब धौलू महाराज तांदली, देवता गुडारू छुपाड़ी, हाटकोटी से हाटेश्वरी माता इस महायज्ञ में सम्मिलित हुए. इसके अलावा जागा माता जोउटा, जागा माता अढ़ाल, परशुराम पारस और बकरोदा शलान खुन्दो ने शिरकत की. उन्होंने बताया कि शांत महायज्ञ में अधिक महत्व ख़ूदों का ही रहता है. शांत महायज्ञ के दूसरे दिन शिखा फेर का आयोजन हुआ जिसमें अनुमानित 50 हज़ार से ज्यादा लोग पहुंचे थे. तीसरे दिन उछड़ पाछड़ यानि देवताओं की विदाई हुई.

चालदा महाराज की अलौकिक हिमाचल यात्रा

14 दिसंबर 2025 को इतिहास में पहली बार चालदा महासू महाराजा टौंस नदी को पार कर सिरमौर पहुंचे. इस पल ने हिमाचल और उत्तराखंड की देव संस्कृति को एक सेतु से बांध दिया. यूं तो सिरमौर के इन इलाकों में पहले से चालदा महासू महाराज स्थापित हैं. लेकिन ये पहला मौका था जब चालदा महासू मुख्य पालकी और छत्र के साथ सिरमौर की धरती पर पधारे. 15 दिसंबर की सुबह 3:00 आस्तिकों के सैलाब के बीच चालदा महासू महाराज सिरमौर जिला के पश्मी गांव पहुंचे. पुष्प वर्षा के साथ उनका भव्य स्वागत हुआ और अगले 1 वर्ष तक अब चालदा महासू पश्मी के नव निर्मित देउठी में निवास करेंगे.

सिरमौर पहुंचे चालदा महाराज
सिरमौर पहुंचे चालदा महाराज (ETV Bharat)

5 साल पहले सिरमौर के पश्मी आना तय कर चुके थे न्याय के देवता

चालदा महासू महाराज उत्तराखंड के बावर-जौनसार और हिमाचल के जिला सिरमौर और शिमला जिला के उत्तराखंड से सटे क्षेत्र के आराध्य देव हैं. चालदा महाराज यानी वो देव जो चलते हुए राज करते हैं. चालदा महाराज का कोई एक तय स्थान नहीं हैं. ये देवता सदा भ्रमण पर रहते हैं. चालदा महासू चार भाई महासू में सबसे छोटे भाई हैं. सबसे बड़े बाशिक महासू फ़िर बोठा महासू और पवासी महासू देवता हैं. महासू देवता को न्याय का देवता कहा जाता है. कहते हैं जिसकी कहीं सुनवाई नहीं होती महासू देवता उसके साथ न्याय करते हैं. स्थानीय लोग बताते हैं करीब 5 साल पहले चालदा महासू ने सिरमौर के पश्मी गांव आना तय किया था. तभी से पश्मी में चालदा महासू महाराज के आगमन की तैयारियां शुरू हो गई थी.

सिरमौर की धरती पर चालदा महासू का अभिनन्दन

चालदा महासू महाराज एक साल के लिए सिरमौर जिला पहुंचे हैं मगर उनकी आभा राजधानी शिमला तक महसूस तक जा सकती है. चालदा महासू के आगमन पर हिमाचल सरकार में उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान चालदा महाराज के आगमन पर खुद उनके स्वागत के लिए पहुंचे, तो मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी सोशल मीडिया के जरिए चालदा महाराज स्वागत करते नजर आए. गुजरते हुए साल के अंत में चालदा महासू कि इस भव्य और अलौकिक हिमाचल यात्रा ने वर्ष 2025 को हिमाचल के लिए अधिक दैवीय बनाया और आस्था से भर दिया.

ये भी पढ़ें: जानें कौन हैं चालदा महाराज, 2 करोड़ में मंदिर हुआ तैयार

ये भी पढ़ें: उत्तर भारत की इस प्रसिद्ध दिव्य सिद्ध पीठ में अब श्रद्धालुओं को मिलेगी बोटिंग सुविधा, नए साल में होगी शुरुआत