हरियाणा में हरियाली तीज पर बहनों को भाई देते हैं 'कोथली', आखिर क्या है इसका विशेष महत्व ?
हरियाणा में सावन के महीने में तीज के मौके पर कोथली देने की परंपरा है जिसे बेहद खास माना जाता है.

Published : August 15, 2026 at 7:51 PM IST
|Updated : August 15, 2026 at 8:19 PM IST
कुरुक्षेत्र : हरियाणा की लोक-संस्कृति में त्योहारों का अपना एक अलग ही रंग और उत्साह होता है. सावन का महीना आते ही चारों ओर हरियाली और खुशहाली छा जाती है. इसी पावन महीने में मनाया जाने वाला हरियाली तीज का त्योहार हरियाणा की महिलाओं के लिए बेहद खास होता है. ये पर्व केवल मौसम के बदलाव का उत्सव नहीं है, बल्कि ये भाई-बहन के अटूट प्रेम, मायके के स्नेह और सांस्कृतिक मिठास का सबसे बड़ा प्रतीक है.
"कोथली" मायके के प्यार का प्रतीक : हरियाणा में तीज के अवसर पर बहन को 'कोथली' भेजने की एक बेहद पवित्र और पुरानी परंपरा है. जब भाई अपनी विवाहित बहन के घर कोथली लेकर पहुंचता है, तो ये केवल उपहार देने की रस्म नहीं होती, बल्कि ये इस बात का अहसास कराती है कि बहन के लिए उसके मायके के दरवाजे और दिल हमेशा खुले हैं. ये परंपरा परिवार के स्नेह को गहरा करती है और भाई-बहन के रिश्ते को आदर व सम्मान की डोर से मजबूती से बांधती है.
कोथली की खास सामग्रियां : कोथली में बहन और उसके ससुराल वालों के लिए विशेष चीजें भेजी जाती हैं. इसमें पारंपरिक पकवान घेवर, फिरनी, बिस्किट, मटर और सवाली और बहन के लिए नए कपड़े, श्रृंगार का सामान भेंट किये जाते हैं.

पुंडरी की फिरनी : दुकानदार महिपाल ने बताया कि तीज की कोथली में घेवर के साथ-साथ पुंडरी की फिरनी का एक विशेष स्थान है. कैथल जिले के पुंडरी की फिरनी न केवल हरियाणा और भारत में, बल्कि विदेशों में भी अपनी खास पहचान बना चुकी है. सावन के महीने में विशेष रूप से तैयार की जाने वाली इस फिरनी को 'महादेव की मिठाई' भी कहा जाता है. शुद्ध देसी घी में बनने वाली यह फिरनी कम मीठी, लच्छेदार और बेहद स्वादिष्ट होती है. सावन के दिनों में लोग इसे खासतौर पर पुंडरी से मंगवाते हैं. तीज के इस सीजन में कुरुक्षेत्र जैसे धार्मिक और ऐतिहासिक शहरों में भी पुंडरी के कारीगर विशेष स्टॉल लगाते हैं, जहां लोग इसे बड़े चाव से खरीदते हैं.

तीज का उत्सव: तीज का दिन महिलाओं के लिए उमंग और उल्लास लेकर आता है. इस दिन बुजुर्गों से लेकर नवविवाहिताएं सज-धजकर तैयार होती हैं. कुछ महिलाएं इस दिन समृद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत भी रखती हैं. गांव और शहरों में महिलाएं एक जगह इकट्ठा होकर नीम या बरगद के पेड़ों पर पींग (झूला) डालती हैं, झूला झूलती हैं और पारंपरिक सावन के लोकगीत गाती हैं.

बदलते दौर में भी कायम है मिठास : समय के साथ तीज मनाने के तरीकों में थोड़ा बदलाव जरूर आया है. बुजुर्ग महिला सीमा भट्ट बताती हैं कि उनके समय में तीज के सभी पकवान घर पर ही शुद्धता के साथ बनाए जाते थे. आज के आधुनिक दौर में लोग मिठाइयों की दुकानों से फिरनी और घेवर खरीदना पसंद करते हैं. भले ही पकवान बनाने का तरीका बदला हो, लेकिन दुकानदार महिपाल जैसे कारीगर आज भी पुंडरी की उसी पारंपरिक मिठास को लोगों तक पहुंचा रहे हैं. तरीका चाहे जो भी हो, त्योहार का मूल भाव और अपनों के प्रति प्यार आज भी उतना ही गहरा है.


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