पलायन की मार झेलते पहाड़ से उठी पुकार, सालों पुराने मंदिरों को बचाने घर-घर पहुंच रहे होल्यार
पौड़ी गढ़वाल के नैनीडांडा में होल्यारों की टीम कर रही पुराने मंदिरों को बचाने की पहल

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : March 2, 2026 at 3:03 PM IST
रामनगर/पौड़ी गढ़वाल: होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि अपनों से जुड़ने और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने का माध्यम भी रहा है. एक दौर था, जब गांवों की होली, शहरों में बसे लोगों को पहाड़ वापस बुला लाती थी. लेकिन अब पलायन की मार ऐसी पड़ी है कि गांवों के घर ही नहीं, मंदिर भी सूने पड़ गए हैं. ऐसे में नैनीडांडा के होल्यार अब होली के जरिए अपने देवस्थलों को बचाने की मुहिम में जुटे हैं.
पौड़ी गढ़वाल जिले के नैनीडांडा के होल्यार इन दिनों उन इलाकों में होली गा रहे हैं, जहां पहाड़ से पलायन कर लोग बस गए हैं. होली के पारंपरिक गीतों के माध्यम से ये होल्यार अपने रक्षक देवी मां बुंगीदेवी मंदिर के करीब 400 साल पुराने मंदिर को बचाने की गुहार प्रवासी पहाड़ियों से लगा रहे हैं. रामनगर और आसपास के तमाम इलाकों में ये टीम ठेठ पहाड़ी अंदाज में घर-घर पहुंच रही है. होल्यार जहां अपनों को उनके बंद पड़े घरों की याद दिला रहे हैं. वहीं पहाड़ में बचे देवी-देवताओं के मंदिरों को सुरक्षित रखने की अपील भी कर रहे हैं.
दरअसल, इन होल्यारों का दर्द यह है कि पौड़ी जिले का नैनीडांडा क्षेत्र भी पलायन प्रभावित है. यहां के कई लोग कोटद्वार और रामनगर में बस गए हैं. गांवों में अब होली गाने और आयोजन करने वाले लोग ही नहीं बचे. कुछ साल पहले तक होली और रामलीला जैसे आयोजनों से धन एकत्र होता था, जिससे गांव के कई सामुदायिक कार्य पूरे किए जाते थे. लेकिन अब गांवों के कई घरों में ताले लटके हैं. हालांकि, पहाड़ से तराई में पहुंची ये होली टीमें युवा पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही हैं.

ढोल-नगाड़ों और वाद्य यंत्रों की थाप पर थिरके होल्यार: उधर, रामनगर के पीरूमदारा में पारंपरिक अंदाज में होली उत्सव का आयोजन किया जा रहा है. ढोल-नगाड़ों और कुमाऊंनी वाद्य यंत्रों की मधुर धुनों के बीच पूरा क्षेत्र रंग और उमंग में डूबा नजर आ रहा है. लोगों की पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में खास तौर पर पहाड़ी संस्कृति को जीवंत रखने पर जोर दिया जा रहा है. पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर जहां युवा और बुजुर्ग झूमते दिखे. वहीं बच्चों को भी अपनी लोक संस्कृति से परिचित कराने का विशेष प्रयास किया गया.

आयोजकों का कहना है कि आधुनिकता के इस दौर में नई पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है. ऐसे में इस तरह के आयोजन उन्हें अपनी परंपराओं से जोड़ने का माध्यम बनते हैं. कार्यक्रम के दौरान महिलाओं ने पारंपरिक झोड़ा और चांचरी गीत गाकर समां बांध दिया. रंग-बिरंगे परिधानों में सजी महिलाओं ने लोकगीतों की मधुर प्रस्तुति से माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया. ढोल और नगाड़ों की थाप पर सामूहिक नृत्य ने सभी का मन मोह लिया. स्थानीय लोगों ने इस आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम समाज में एकता और भाईचारे को मजबूत करते हैं.
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