सूरजकुंड मेले में आकर्षण का केंद्र बने धान से तराशे गए गहने, कारीगर पुतुल दास मित्रा से जानिए खासियत
सूरजकुंड मेले में धान की ज्वेलरी महिलाओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. इस ज्वेलरी की खासियत इस रिपोर्ट में जानें.


Published : February 13, 2026 at 4:41 PM IST
|Updated : February 13, 2026 at 6:01 PM IST
फरीदाबाद: हरियाणा के फरीदाबाद में सूरजकुंड मेले में सोने-चांदी-हीरे या आर्टिफिशियल ज्वेलरी नहीं, बल्कि आज हम बात करेंगे धान से बनाए गए गहनों की. जी हां, लोग सुनकर ही हैरान हो रहे हैं कि आखिरी धान से गहने कैसे बन सकते हैं. मेले में लगे गेहूं की धान के गहनों की स्टॉल लोगों को आकर्षित कर रही है. जहां धान के दानों से बने हार, झुमके और टॉप्स सजे हुए हैं. पहले लोग इन गहनों को देखकर चौंकते हैं. फिर नजदीक जाकर इन्हें छूकर महसूस करते हैं. यही सवाल सबके मन में उठता है क्या ये सच में धान से बने हैं.
सालों साल खराब नहीं होते गहने: दरअसल, धान से बने गहने अनोखा, ईको-फ्रेंडली और हैंडमेड फैशन विकल्प है, जो धान के दानों का उपयोग करके बनाया गया है. पश्चिम बंगाल की कारीगर पुतुल दास मित्रा जैसी कारीगर 26 वर्षों से इस कला को संजोए हुए हैं. खास बात ये है कि ये गहने केमिकल-फ्री और पानी प्रतिरोधी होते हैं, जो बहुत वर्षों तक खराब भी नहीं होते.
आखिरी कैसे बनती है धान की ज्वेलरी: कोलकाता की पुतुल दास मित्रा इस अनोखी ज्वेलरी की कारीगर हैं. ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान पुतुल ने बताया कि "यह ज्वेलरी पूरी तरह से धान के दानों से बनाई जाती है. खास बात यह है कि ज्वेलरी को धोकर भी पहना जा सकता है. रोजमर्रा में जो धान हम खाते हैं, वही खास प्रोसेस से गुजरकर इन गहनों का रूप लेता है. पहले ये केमिकल प्रोसेसिंग से गुजरता है फिर हैरलडाइज करके एक-एक दाना जोड़कर ज्वेलरी बनाई जाती है. इस प्रक्रिया में जो रंग इस्तेमाल किए जाते हैं, वे पानी से खराब नहीं होते. जिससे लोग इसे बिना किसी चिंता के पहन सकते हैं".

महिलाओं को दिया रोजगार: पुतुल ने बताया कि "हर डिजाइन उनका अपना होता है. हर गहने को अपना एक नाम दिया है. हार, झुमके, टॉप्स हर प्रकार की जूलरी स्टॉल पर उपलब्ध है. लेकिन इसे बनाना आसान बिल्कुल नहीं होता. एक दिन में मुश्किल से दो-तीन गहने तैयार हो पाते हैं. हालांकि लगातार मेहनत करने के बावजूद सिर्फ दो ही ज्वेलरी बन पाती है. अभी उनके साथ 15-16 महिलाएं काम कर रही हैं".
इस काल को दिए 26 साल: पुतुल ने बताया कि "वे पिछले 26 वर्षों से यह काम कर रही हैं. मजेदार बात ये है कि उन्होंने इस कहीं से सीखा नहीं है. यह पूरी तरह से उनका खुद का प्रोडक्ट है. शुरुआत में उन्होंने धान से राखी बनाना शुरू किया था. राखी बनाने के दौरान उन्हें एहसास हुआ कि धान के दाने छोटे-छोटे मोतियों जैसे होते हैं, तो क्यों न इनसे ज्वेलरी बनाई जाए. इसके बाद इसे बनाने की कोशिश की. कई डिजाइन तो विफल हुए, मेहनत बेकार गई. लेकिन कभी हार नहीं मानी. धीरे-धीरे यह शौक उनका पेशा बन गया और इस काम और अच्छी तरह से तराशा गया".

बहुत कम कीमत में बहुत सुंदर ज्वेलरी: कीमत की बात करें तो पुतुल की ज्वेलरी आम आदमी के बजट में है. 50 रुपये से लेकर 1 हजार रुपये के रेंज में आसानी से मिल जाती है. पुतुल बताती हैं कि "लोग अक्सर यह नहीं समझ पाते कि ये धान से बने गहने हैं. इसलिए उन्होंने अपने स्टॉल पर धान की ज्वेलरी बड़े अक्षरों में लिखा है. जिससे लोग पढ़कर चौंक जाते हैं. सवालों की झड़ी लगा देते हैं".

देश ही नहीं विदेशों में भी फेमस है गहने: पुतुल दास मित्रा की धान से बने गहने न केवल भारत बल्कि अमेरिका,चीन,ब्राजील, इटली, फ्रांस, अफ्रीका और ब्रिटेन जैसे देशों में भी भेजी जा चुकी हैं. वह दूसरों को इस कला की ट्रेनिंग भी देती हैं. भारत में उनके अलावा कोई भी धान की ज्वेलरी बनाना नहीं सिखाता. उनके साथ काम करने वाली कई लड़कियों ने खुद का काम भी शुरू किया है. उनकी कला को कई बड़े अवॉर्ड मिल चुके हैं. जैसे 2002 में पश्चिम बंगाल सरकार का राज्य पुरस्कार, 2014 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से राष्ट्रीय पुरस्कार, ताज महोत्सव का बेस्ट आर्टिस्ट अवॉर्ड और त्रिपुरा सरकार से बेस्ट क्राफ्ट पर्सन अवॉर्ड भी मिल चुका है.
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