SC के फैसले पर सेब उत्पादक संघ ने जताई खुशी, कहा- ये गरीब बागवानों की जीत
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सेब उत्पादक संघ ने खुशी जाहिर की है. संगठन ने इसे बागवानों की बड़ी जीत बताया है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : December 17, 2025 at 5:15 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश के लाखों सेब बागवानों के लिए सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत की खबर आई है. 16 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें वन भूमि पर लगे फलदार पेड़ों को हटाने के निर्देश दिए गए थे. इस फैसले से ऊपरी हिमाचल के हजारों सेब उत्पादकों को सीधा फायदा मिलेगा, जिनकी आजीविका इन बागानों पर निर्भर है.
सेब उत्पादक संघ ने फैसले का किया स्वागत
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सेब उत्पादक संघ और किसान सभा ने खुशी जताई है. संगठनों ने इसे गरीब और भूमिहीन बागवानों की बड़ी जीत बताया है. उनका कहना है कि यह फैसला उन लोगों के हक में है, जो वर्षों से वन भूमि पर सेब की खेती कर अपनी रोज़ी-रोटी चला रहे हैं.
'संगठित संघर्ष का नतीजा'
सेब उत्पादक संघ के नेता संजय चौहान ने कहा, "यह फैसला गरीब बागवानों की संगठित ताकत का परिणाम है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा है कि वह भूमिहीन और कमजोर वर्ग के लोगों की मदद करे. अगर राज्य सरकार ऐसा करने में सक्षम नहीं है, तो केंद्र सरकार के लिए प्रस्ताव तैयार किया जाए. उन्होंने इस फैसले को ऐतिहासिक और न्यायपूर्ण बताया."
आगे भी जारी रहेगी लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शिमला जिले के नावर में सेब उत्पादक संघ और किसान सभा ने जनसभा का आयोजन किया. इस दौरान नेताओं ने साफ कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूरी तरह लागू नहीं किया जाता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा. संगठन का कहना है कि अक्सर आम जनता से जुड़े फैसले समय पर लागू नहीं होते, इसलिए दबाव बनाए रखना जरूरी है.
सेब उत्पादक संघ ने मांग की है कि प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जल्द लागू करे. संगठन का कहना है कि जब तक घरों और जमीनों से बेदखली पूरी तरह नहीं रुकती, तब तक आंदोलन चलता रहेगा. उनका मकसद है कि किसी भी गरीब बागवान को उसके बाग या जमीन से हटाया न जाए।
खेती योग्य भूमि घटने से बढ़ी समस्या
हिमाचल प्रदेश का कुल भौगोलिक क्षेत्र 55.67 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से केवल लगभग 6.15 लाख हेक्टेयर भूमि ही खेती योग्य है. यह कुल क्षेत्र का करीब 11 प्रतिशत है. वहीं, प्रदेश में वन क्षेत्र लगभग 37 हजार वर्ग किलोमीटर है. आबादी बढ़ने और परिवारों की संख्या बढ़ने से खेती योग्य भूमि लगातार कम हो रही है.
वन अधिकार अधिनियम बना बड़ी बाधा
प्रदेश में लंबे समय से मांग उठ रही है कि भूमिहीन परिवारों को वन भूमि से पांच बीघा तक जमीन दी जाए. हालांकि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत वन भूमि पर कब्जे की अनुमति नहीं है, जिससे यह मुद्दा उलझा हुआ है. प्रदेश में इस साल आई आपदा के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू भी कई बार भूमिहीनों को भूमि देने की बात कह चुके हैं, लेकिन कानून बड़ी बाधा बना हुआ है.
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस मामले में भाजपा से भी अपील की थी कि केंद्र सरकार से बातचीत कर समाधान निकाला जाए. वहीं, अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि सरकार भूमिहीन सेब बागवानों के हित में ठोस कदम उठाएगी.

