वन भूमि से नहीं कटेंगे सेब के पौधे, सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया हिमाचल हाईकोर्ट का फैसला, सीजे की बैंच से आई ये बड़ी टिप्पणी
हिमाचल में सरकारी वन भूमि पर उगाए गए सेब पौधों को काटने के मामले में हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : December 17, 2025 at 12:41 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश के सबसे चर्चित मामले में सुप्रीम फैसला आया है. हिमाचल में सरकारी वन भूमि पर उगाए गए सेब पौधों को काटने से जुड़े हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अगुवाई वाली खंडपीठ ने अपने फैसले में एक अहम टिप्पणी भी की. बैंच ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में एक ऐसी गंभीर गलती हो रही है, जिसका परिणाम सीमांत बागवानों पर होता.
हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकारी वन भूमि पर अवैध कब्जा कर विकसित किए गए सेब बागीचों को लेकर फैसला दिया था कि एक-एक इंच से अवैध कब्जा हटाया जाए. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति सूर्यकांत व न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने की.
उल्लेखनीय है कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहे माकपा नेता व शिमला नगर निगम के पूर्व डिप्टी मेयर टिकेंद्र पंवर व सामाजिक कार्यकर्ता राजीव राय ने हाईकोर्ट के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही 28 जुलाई को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने सेब से लदे पौधों को काटने पर रोक लगाई थी.
यहां बता दें कि हिमाचल में सरकारी वन भूमि पर कब्जा कर हजारों लोगों ने सेब के बागीचे विकसित किए थे. उनमें से अधिकांश सीमांत बागवान हैं या फिर लगभग भूमिहीन ग्रामीण हैं. हाईकोर्ट के आदेश के बाद सेब से लदे पौधे काटने पर काम शुरू हो गया था. माकपा नेता व पूर्व विधायक राकेश सिंघा ने इस फैसले का विरोध किया था.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेब से लदे पौधे काटने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इससे सीमांत व भूमिहीन किसान-बागवान प्रभावित होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा फैसला नीतिगत निर्णय के दायरे में आता है. अलबत्ता राज्य सरकार सरकारी वन भूमि पर अतिक्रमण हटाने के लिए तय नियमों के अनुसार कार्रवाई कर सकती है. राज्य सरकार कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के अनुकूल कोई ऐसा प्रस्ताव बनाकर केंद्र के समक्ष ला सकती है, जिससे सीमांत किसानों का हित हो.
याचिका में टिकेंद्र पंवर ने कहा था कि हाईकोर्ट का फैसला संविधान के अनुकूल नहीं है और पर्यावरण की दृष्टि से भी उचित नहीं है. मानसून सीजन में फलों से लदे पौधों को काटने से कई विपरीत प्रभाव होंगे. इससे भूस्खलन का भी खतरा है. टिकेंद्र पंवर का कहना था कि हाईकोर्ट ने फैसला देते समय पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की ध्यान नहीं रखा है.
याचिका में दर्ज किया गया था कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद चार हजार के करीब सेब से लदे पौधे काट दिए गए. पूरे राज्य में सरकारी वन भूमि से कम से कम पचास हजार पौधे कटने का अनुमान था. फिलहाल, याचिकाकर्ता टिकेंद्र पंवर ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने पर खुशी जताई है और उसका स्वागत किया है.

