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अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड लेकर लौटे सुमेर सिंह भाटी, बोले, 'यह सम्मान पूरे ओरण आंदोलन का'

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान मिलने से उम्मीद है कि अब ओरण संरक्षण के मुद्दे को और मजबूती मिलेगी.

Sumer Singh Bhati speaking to the media
मीडिया से बात करते सुमेर सिंह भाटी (ETV Bharat Jaisalmer)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : September 3, 2026 at 2:16 PM IST

4 Min Read
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जैसलमेर: थार के ओरण, गोचर और सामुदायिक चारागाहों के संरक्षण के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे जैसलमेर के सुमेर सिंह भाटी को मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में Rangeland Restoration Award 2026 से सम्मानित किया गया. अंतरराष्ट्रीय सम्मान लेकर जैसलमेर लौटने पर सुमेर सिंह का रेलवे स्टेशन से लेकर सोनार किले, जवाहर निवास और आल्हा डाडा मंदिर तक जगह-जगह स्वागत किया गया.

'यह सम्मान संघर्ष की पहचान': सुमेर सिंह भाटी ने कहा कि मंगोलिया में मिला सम्मान उनके लिए व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि थार के ओरणों, पशुपालकों और ग्रामीणों के संघर्ष की पहचान है. उन्होंने कहा कि ओरण केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी भूमि नहीं हैं, बल्कि थार के पर्यावरण, जैव विविधता, पशुधन और पशुपालकों की आजीविका का आधार हैं. वर्षों से ग्रामीणों और पशुपालकों के साथ मिलकर ओरणों के संरक्षण के लिए आवाज उठाई है. जैसलमेर से जयपुर तक की पदयात्रा सहित इस संघर्ष में लोगों का लगातार सहयोग मिला. अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान मिलने से उन्हें उम्मीद है कि अब ओरण संरक्षण के मुद्दे को और मजबूती मिलेगी. उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन सभी ग्रामीणों, पशुपालकों और ओरण प्रेमियों को समर्पित है, जिन्होंने ओरण बचाने के लिए संघर्ष किया है.

सम्मान पर यह बोले सुमेर सिंह भाटी... (ETV Bharat Jaisalmer)

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मंगोलिया के मंच पर थार की आवाज: रेंजलैंड संरक्षण से जुड़े इस अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में दुनिया के विभिन्न देशों और क्षेत्रों में चारागाहों, रेंजलैंड, पशुपालक समुदायों, जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के लिए काम करने वाले चुनिंदा लोगों एवं संस्थाओं को सम्मानित किया गया. भारत के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े लोगों के साथ राजस्थान के जैसलमेर से सुमेर सिंह भाटी को भी सम्मान मिला. इस उपलब्धि के साथ थार के ओरणों और पारंपरिक चरागाहों के संरक्षण की स्थानीय मुहिम को वैश्विक पहचान मिली है.

Sumer Singh Bhati offering prayers at the temple
मंदिर में नमन करते सुमेर सिंह भाटी (ETV Bharat Jaisalmer)

जगह-जगह किया अभिनंदन: मंगोलिया से सम्मान लेकर जैसलमेर पहुंचने पर सुमेर सिंह भाटी के स्वागत का सिलसिला शुरू हो गया. रेलवे स्टेशन पर लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. इसके बाद सोनार किले की ऐतिहासिक धरती पर उनका अभिनंदन किया गया. जवाहर निवास में भी सम्मान समारोह आयोजित हुआ. वहीं आल्हा डाडा मंदिर पहुंचने पर लोगों ने फूल-मालाओं और साफा पहनाकर उनका स्वागत किया. इस दौरान लोगों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैसलमेर और थार की पहचान को मिली नई पहचान को लेकर उत्साह नजर आया.

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ओरण संरक्षण बना संघर्ष का आधार: सुमेर सिंह भाटी के अंतरराष्ट्रीय सम्मान के पीछे थार के ओरणों और सामुदायिक चारागाहों के संरक्षण को लेकर उनका वर्षों का संघर्ष प्रमुख वजह रहा है. जैसलमेर के थार क्षेत्र में ओरण धार्मिक आस्था से जुड़ी भूमि होने के साथ-साथ पशुपालकों के लिए चरागाह, जैव विविधता का संरक्षण क्षेत्र और जल एवं मिट्टी संरक्षण का प्राकृतिक तंत्र भी हैं. इन क्षेत्रों पर हजारों परिवारों की आजीविका और पशुधन निर्भर है. सुमेर सिंह ने देगराय माता ओरण सहित सामुदायिक चरागाहों के संरक्षण को लेकर लंबे समय से अभियान चलाया. उनके प्रयास करीब 10 हजार हेक्टेयर क्षेत्र के संरक्षण से जुड़े हैं और इस मुहिम में करीब 20 गांवों के लोगों को जोड़ा गया है.

Sumer Singh Bhati was welcomed
सुमेर सिंह भाटी का किया स्वागत (ETV Bharat Jaisalmer)

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जैसलमेर से जयपुर तक 700 किलोमीटर की पदयात्रा: ओरण संरक्षण की मांग को लेकर सुमेर सिंह भाटी ने ग्रामीणों और पशुपालकों को साथ लेकर जैसलमेर से जयपुर तक करीब 700 किलोमीटर की पदयात्रा भी की. इस यात्रा के माध्यम से ओरण और चारागाह संरक्षण का मुद्दा गांवों से निकलकर प्रदेश की राजधानी तक पहुंचा. उनके संघर्ष में ग्रामीणों, पशुपालकों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों की भागीदारी भी रही.

पारंपरिक ऊंटपालक से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक: सुमेर सिंह भाटी जैसलमेर के सांवता गांव से जुड़े पारंपरिक पशुपालक हैं. उनका परिवार पीढ़ियों से पशुपालन से जुड़ा रहा है. रोजमर्रा के जीवन से जुड़े ओरण और चरागाहों के सवाल को उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और पशुपालक समुदाय की आजीविका से जोड़कर एक बड़े अभियान का रूप दिया. उनका मानना है कि ओरण सुरक्षित रहेंगे तो घास और चारागाह बचेंगे, घास बचेगी तो पशुधन सुरक्षित रहेगा और पशुधन के साथ पशुपालकों की आजीविका भी बनी रहेगी. इसी सोच ने उन्हें स्थानीय स्तर के संघर्ष से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया.