सुक्खू सरकार का APMC चेयरपर्सन को तोहफा, 24 हजार से 60 हजार होगा मानदेय
हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार ने APMC चेयरपर्सन के मानदेय में ढाई गुना तक बढ़ोतरी का लिया फैसला.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : June 23, 2026 at 7:55 PM IST
शिमला: हिमाचल की कृषि मंडियों से जुड़े पदाधिकारियों के लिए सुक्खू सरकार ने बड़ा तोहफा दिया है. प्रदेश सरकार ने APMC चेयरपर्सन के मासिक मानदेय में ढाई गुना तक बढ़ोतरी का फैसला किया है. जिसके तहत अब तक 24 हजार रुपये प्रतिमाह पाने वाले एपीएमसी चेयरमैन को 60 हजार रुपये मानदेय मिलेगा. इसको लेकर हिमाचल प्रदेश सरकार के कृषि विभाग ने हिमाचल प्रदेश कृषि एवं बागवानी उपज विपणन (वित्तीय) नियम, 2006 में संशोधन का मसौदा जारी किया है. इस संबंध में अधिसूचना जारी कर आम जनता से 30 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं.
प्रस्तावित संशोधन के अनुसार कृषि मंडी समितियों के गैर-सरकारी अध्यक्ष को दिए जाने वाले मानदेय में वृद्धि की जाएगी. नए प्रावधान के तहत अध्यक्ष को 60,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय देने का प्रस्ताव है. इसके अलावा, मंडी समिति के गैर-सरकारी सदस्यों को भी बैठक में भाग लेने पर 3,000 रुपये प्रति बैठक भत्ता (सिटिंग अलाउंस) देने का प्रस्ताव रखा गया है.

सरकार ने स्पष्ट किया है कि अधिसूचना के ई-राजपत्र में प्रकाशित होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर प्राप्त सुझावों और आपत्तियों पर विचार करने के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा. यह संशोधन लागू होने पर “हिमाचल प्रदेश कृषि एवं बागवानी उपज विपणन (वित्तीय) संशोधन नियम, 2026” के नाम से जाना जाएगा और राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से प्रभावी होगा.
एक लाख करोड़ से अधिक का कर्ज
हिमाचल प्रदेश की आर्थिक सेहत लगातार सवालों के घेरे में है. राज्य पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज बताया जा रहा है, जबकि कर्मचारियों के डीए और एरियर की देनदारियां भी 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच चुकी हैं. वित्तीय मांगों को लेकर HRTC कर्मचारी सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और हाल ही में प्रस्तावित चक्का जाम को रोकने के लिए सरकार को एस्मा तक लागू करना पड़ा.
ऐसे चुनौतीपूर्ण हालातों के बीच सरकार द्वारा APMC चेयरमैन के मानदेय में बढ़ोतरी और मंडी समितियों के गैर-सरकारी सदस्यों को बैठकों में शामिल होने पर 3,000 रुपये भत्ता देने का फैसला नई बहस को जन्म दे रहा है. विपक्ष और कर्मचारी संगठनों के निशाने पर आए इस निर्णय ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब सरकार वित्तीय संकट और कर्मचारियों की लंबित मांगों से जूझ रही है, तब जनप्रतिनिधियों और बोर्ड-निगमों से जुड़े पदाधिकारियों पर अतिरिक्त खर्च को प्राथमिकता देना कितना उचित है.
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