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डलमऊ किला: खंडहरों में जीवित है इतिहास, मुगलों से लेकर नवाबों की सत्ता का साक्षी, जानते हैं किले की कहानी?

डलमऊ का किला, जिसे भर राजा डालदेव ने बनवाया था, आज खंडहर में तब्दील है.

डलमऊ का किला
डलमऊ का किला (Photo Credit; ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 24, 2026 at 7:53 PM IST

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Updated : February 26, 2026 at 12:58 PM IST

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रायबरेली(रविन्द्र सिंह): रायबरेली में गंगा नदी किनारे बना डलमऊ का किला, उस दौर की याद दिलाता है, जब यह नगर अवध की सीमाओं की रक्षा करता था. यह किला मुगलों से लेकर अवध के नवाबों तक कई बार सत्ता परिवर्तन का गवाह बना, लेकिन इतिहास के पन्नों में जीवित ये किला आज खंडहर में तब्दील है और गंगा की धाराओं से अपनी वीरता की कहानी सुनाता है.

डलमऊ किले का ऐतिहासिक महत्व: डलमऊ किला फतेहपुर, प्रतापगढ़, अमेठी, उन्नाव व लखनऊ जनपदों से सीधा जुड़ा है. यहाँ सड़क मार्ग व रेल मार्ग से भी आसानी से पहुंचा जा सकता है. ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व को समाहित करने वाला डलमऊ एक प्राचीन नगर है. गंगा किनारे स्थित डलमऊ न केवल एक प्राचीन नगरी है, बल्कि मुगल, अवध व अंग्रेजी काल में भी इसका विशेष महत्व रहा है. दालम्य ऋषि से लेकर राजा डल, इब्राहिम शाह शर्की, मौलाना दाऊद सहित अनेक सूफी संतों के अलावा कवि निराला जैसे लोगों ने यहां के इतिहास को गढ़ा है. यह किला मुगलों से लेकर अवध के नवाबों तक कई बार सत्ता परिवर्तन का गवाह बना. आईए जानते हैं. ETV Bharat के 'किले: हिस्ट्री और मिस्ट्री' के चौथे एपीसोड में फोर्ट का इतिहास और स्टोरी...

डलमऊ का किला (VIDEO Credit; ETV Bharat)

राजा डालदेव ने अवध में सत्ता स्थापित की थी: इतिहासकार डॉ जितेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि डलमऊ की पहचान एवं नामकरण ऋषि दालम्य से मानी जाती है. यह उनकी तपस्थली है, इस लिए इसका नाम दालम्य पड़ा, बाद में डलमऊ हुआ जिसका विस्तृत विवरण छान्दोग्य उपनिषद में मिलता है. 15वीं शताब्दी में भारशिवों और नागवंशों ने यहां अवध क्षेत्र में अपनी मजबूत सत्ता स्थापित की थी. प्राचीन काल से भर राजवंशों का विशेष महत्व रहा. भरों का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है. भर शासक राजा डालदेव ने ही राजपूतों के साथ मिलकर अवध व उसके आसपास के क्षेत्र में सत्ता स्थापित की थी. राजा डल चार भाई थे. डाल देव, बाल देव, ककोरन और भारव.

डालदेव का शासन काल 1402-1421 तक चला: राजा डाल देव ने अपने साम्राज्य का विभाजन अपने अन्य भाइयों के साथ किया था. इनका साम्राज्य मध्य पूर्व में अरखा से लेकर पश्चिम में खीरों तक फैला था. डालदेव का शासन काल 1402-1421 ई. तक माना जाता है. इस दौरान उन्होंने अपने साम्राज्य को काफी मजबूत किया और किले का निर्माण कराया. यह किला लगभग 8 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ था. इसकी ऊंचाई 20 मीटर है, इसके चारों ओर खाई बनी है, जिसमें में गंगा नदी का पानी भरा जाता था, ताकि दुश्मन हमला न कर सके. दीवारें भी काफी मोटी बनाई गई हैं. जिसे भेद पाना बेहद मुश्किल था. किले में सैन्य अधिकारी व सैनिक भी रहा करते थे.

यूपी के प्रमुख शहरों से किले की दूरी
यूपी के प्रमुख शहरों से किले की दूरी (Photo Credit; ETV Bharat)

इब्राहिम शर्की ने राजा हरदेव को हराया: उस समय सल्तनत वंश मोहम्मद तुगलक का शासन दिल्ली पर था. तभी इब्राहिम शाह शर्की नें जौनपुर रियासत को एक स्वतंत्र राज्य बना लिया और अपना साम्राज्य अवध क्षेत्र में फैलाना प्रारंभ किया. उसे जानकारी मिली कि हरदोई क्षेत्र में भरों का बहुत प्रभाव है. इब्राहिम शाह शर्की ने अपने सेना के साथ हरदोई पर आक्रमण किया. जिसमें राजा हरदेव मारे गए, उनके सैनिक भाग कर डलमऊ में इकट्ठा होए.

शर्की और डालदेव के बीच भीषण युद्ध: इब्राहिम शर्की का एक प्रतिनिधि "हाजी" अवध क्षेत्र में रहता था, उसने शर्की को बताया कि राजा डाल देव अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं. उनको हराना आवश्यक है. इसके बाद इब्राहिम शाह शर्की ने अपनी सेना के साथ डलमऊ की तरफ कूच किया. लेकिन उसे पता चला कि राजा डाल की सेना काफी मजबूत है, उसकी सेना राजा की सेना का सीधा मुकाबला नही कर सकती. तभी एक गुप्तचर ने बताया कि होली के दिन राजा डाल व उनकी सेना हथियार नही उठाती. इसके बाद शर्की ने होली के दिन धोखे से किले पर आक्रमण कर दिया. राजा डाल देव परंपरा से मजबूर थे, फिर भी डालमऊ से 4 किलोमीटर दूर पखरौली में दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ.

किले का इतिहास
किले का इतिहास (Photo Credit; ETV Bharat)

होली के सप्ताह बाद होली मनाने की परंपरा: राजा डाल और उनकी सेना, इब्राहिम शाह का मुकाबला निहत्थे किया. जिसमें राजा डाल देव के साथ साथ उनके भाई भी वीरगती को प्राप्त हुए. लोग राजा डालदेव को लोक नायक मानते थे. इस लिए उन्होंने होली के दिन होली न मनाने का प्रण लिया. यहाँ आज भी होली के एक सप्ताह बाद होली मनाने की परंपरा है.

डालदेव ने सलमा को बंधक बनाया था: प्रो. जितेंद्र प्रताप सिंह अवध गजेटियर का जिक्र करते हुए बताते हैं कि एक बार राजा डालदेव जंगल मे शिकार करने गए थे. उसी जंगल मे जौनपुर के शासक इब्राहिम शर्की के प्रतिनिधि हाजी की बेटी सलमा की पालकी जा रही थी. वह भटक कर डलमऊ किले की तरफ आ गई. जिसके बाद राजा ने सलमा को बंधक बनाने का आदेश दे दिया. सैय्यद हाजी मदद के लिये इब्राहिम शर्की के पास गए और उसे बहाना मिल गया कि वह डलमऊ पर आक्रमण करें.

शर्की, राजा डालदेव की वीरता से परिचित था: शर्की, राजा डालदेव के जन बल और उनकी वीरता से परिचित था. उसमें सीधे युद्ध करने की हिम्मत नही हुई. शर्की को यह भी पता था कि राजा डाल हिन्दू जातियों को लेकर एक मजबूत सेना बना रहा है, जो उसके लिये बड़ा खतरा बन सकता है. ऐसे समय में किले पर सीधा धावा बोलना ठीक नही था.

अकबर ने किला को परगना बनाया: राजा डालदेव की मौत के बाद काफी समय तक किला स्थिर रहा. मुगल काल में अकबर द्वारा इसको एक परगना के रूप में इस्तेमाल किया गया, सैन्य छावनी बनाई गई. राजपूतों के समय में भी यह सैन्य छावनी ही रही. जिस पर अवध केसरी राणा बैनी माधव बक्श सिंह का प्रभाव रहा. राव माऊ ने इस किले से अपना शासन चलाया. 19वीं सदी में यह एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बना. यहाँ पर गंगा नदी के रास्ते खस का बड़ा व्यापार हुआ करता था. ब्रिटिश काल में भी यह महत्वपूर्ण छावनी रही, जिसे युद्ध के समय अंग्रेज इस्तेमाल किया करते थे.

किले की उपेक्षा की जा रही है: प्रो. जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि वर्तमान काल में इस किले की स्थिति बहुत ही खराब है. शासन-प्रशासन द्वारा इसकी उपेक्षा की जा रही है. उनकी मांग है कि यह पुरानी धरोहर घोषित होनी चाहिए. कुछ समय पहले किले से संबंधित उनकी अधिकारियों से बात हुई थी. उन्होंने प्रोजेक्ट के बारे में बताया और कहा कि आप इस पर एक शोध करके लिखिए. इसका सौंदर्यीकरण कराया जाएगा और इसे पर्यटन के तौर पर विकसित किया जाएगा. लेकिन दुर्भाग्य रहा कि उनकी रिसर्च को बीच मे रोक दिया गया.

ऐतिहासिक किला आज भी खराब अवस्था में है. पर्यटकों का भी यहां पर ज्यादा आना जाना नही रहता. जो भी आता है गंगा स्नान करके चला जाता है. जबकि एक जमाने में यह स्थान के बजाए व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था.


डलमऊ के किले की सैर पर आए एक पर्यटक अभिषेक ने कहा कि वह अक्सर डलमऊ के किले में आते रहे हैं. पहले के मुकाबले इस किले की अब हालत और खराब हो गई है. सीढ़ियां टूट गई हैं, दिवारों से ईंट लगातार गिर रही है. वहीं राघवेंद्र यादव ने कहा कि यहाँ आने जाने का रास्ता भी बहुत खराब है. शिशु पंडित ने बताया कि यहाँ के कर्मचारी व नेता कोई कार्य नही करवाते. किले के अंदर सिंचाई विभाग का गेस्ट हाउस है, नगर पंचायत अध्यक्ष ने बगल में स्विमिंग पुल बनवा दिया.


वहीं, नगर पंचायत अध्यक्ष डलमऊ पंडित बृजेश दत्त गौड़ का कहना है कि हमने डलमऊ किले के जीर्णोद्धार के लिये उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग को प्रपोजल बनाकर 2 महीने पहले दिया है. लेकिन उस पर अभी तक कोई कार्य नही हुआ है. फिलहाल जो भी बजट हमारे पास है उस से हम काम कराने का प्रयास करते हैं. नगर से आने वाली सड़क को अभी हाल ही में ठीक कराया गया है.

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Last Updated : February 26, 2026 at 12:58 PM IST