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हिमाचल के इस जिले में हर पांच में एक से अधिक व्यक्ति पथरी का मरीज, सर्वे में चौकाने वाला खुलासा

दो साल तक चले इस अनूठे फील्ड सर्वे में बीमारी के असल कारणों को लेकर कई बड़े खुलासे हुए हैं. पढ़ें पूरी रिपोर्ट

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अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल Cureus में प्रकाशित हुआ शोध (CONCEPT IMAGE)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : July 4, 2026 at 3:14 PM IST

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शिमला: हिमाचल प्रदेश की ऊंचाई वाले जनजातीय क्षेत्र स्पीति घाटी में पित्त की पथरी (गॉलस्टोन) के मामलों को लेकर स्टडी में बड़ा खुलासा हुआ है. अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल Cureus में प्रकाशित शोध "प्रिवैलेंस एंड फैक्टर्स ऑफ गॉलस्टोन डिजीज इन द हाई-अल्टीट्यूड ट्राइबल पापुलेशन ऑफ स्पीति वैली, नॉर्दर्न इंडिया: ए पापुलेशन-बेस्ड क्रॉस-सेक्शनल स्टडी" में बताया गया है कि स्पीति के क्षेत्र में हर पांच में से एक से अधिक वयस्क (21.3%) में गॉलस्टोन की समस्या पाई गई है, जो देश के कई अन्य क्षेत्रों की तुलना में काफी अधिक है.

दो वर्षों तक चला फील्ड सर्वे

स्पीति घाटी के दूर-दराज और ऊंचाई वाले गांवों में जाकर ये सर्वे किया गया था. कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में कुलियों की मदद से मशीनरी को टेस्टिंग स्थान तक पहुंचाया गया था. टीम ने अल्ट्रासाउंड मशीनों के साथ हिक्किम, कोमिक और अन्य दुर्गम गांवों का दौरा किया. अध्ययन में 30 से 70 वर्ष आयु वर्ग के 450 स्थानीय निवासियों की मौके पर ही अल्ट्रासोनोग्राफी कर जांच की गई. इस सर्वे में अस्पताल में आने वाले पत्थरी के मरीजों को शामिल नहीं किया था. इसमें लोगों की रेंडम सैंपलिंग के जरिए डाटा जुटाया गया था. ये सर्वे फरवरी 2024 से जनवरी 2026 के बीच चला था. आईजीएमसी में सर्जरी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. विपिन शर्मा ने इसका नेतृत्व किया था. इस शोध में सात सदस्यीय विशेषज्ञों की टीम शामिल थी.

450 लोगों को किया गया सर्वे में शामिल

शोध के दौरान स्पीति घाटी के 30 से 70 वर्ष आयु वर्ग के 450 मूल निवासियों का खाली पेट अल्ट्रासाउंड किया गया. प्रतिभागियों को समुद्र तल से ऊंचाई के आधार पर तीन समूहों में बांटा गया. अध्ययन में 3500 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में गॉलस्टोन की दर 24 प्रतिशत, 3501 से 4000 मीटर के बीच 24.7 प्रतिशत तथा 4000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 15.3 प्रतिशत दर्ज की गई. इन आंकड़ों से स्पष्ट हुआ कि ऊंचाई बढ़ने के साथ बीमारी का जोखिम अपने आप नहीं बढ़ता.

गॉलस्टोन की दर कहां कितनी दर हुई दर्ज

  • समुद्र तल से ऊंचाई के आधार पर बनाई गई 3 श्रेणियां
  • 3500 मीटर से कम ऊंचाई में गॉलस्टोन की दर 24 प्रतिशत रही.
  • 3501 से 4000 मीटर के बीच सबसे अधिक 24.7 प्रतिशत रही.
  • 4000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर गॉलस्टोन की दर घटकर 15.3 प्रतिशत रही

राष्ट्रीय औसत से कई गुना अधिक गॉलस्टोन

कुल मिलाकर सर्वे में पाया गया कि स्पीति घाटी के 21.3 प्रतिशत लोगों में गॉलस्टोन की समस्या है. ये आंकड़ा उत्तर भारत के गंगा के मैदानी ग्रामीण क्षेत्रों (करीब 4.15%) और कश्मीर (करीब 6.12%) में पहले दर्ज मामलों की तुलना में काफी अधिक है. सर्वे टीम का पहले अनुमान था कि ऊंचाई बढ़ने के साथ गॉलस्टोन की समस्या बढ़ती है, लेकिन ऊंचाई बढ़ने से इसका सीधा संबंध नहीं था.

क्या अधिक ऊंचाई है गॉलस्टोन का कारण

सर्वे टीम में शामिल रहे आईजी एमसी सर्जरी विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ विपिन ने बताया कि 'केवल अधिक ऊंचाई ही इस बीमारी का सीधा कारण नहीं है. बढ़ती उम्र, महिलाओं में हार्मोनल बदलाव और फैटी लीवर प्रमुख जोखिम कारक है. मल्टीवेरिएबल लॉजिस्टिक रिग्रेशन विश्लेषण में पाया गया कि प्रत्येक वर्ष बढ़ती उम्र के साथ गॉलस्टोन का खतरा लगभग 4 प्रतिशत बढ़ जाता है. महिलाओं में पुरुषों की तुलना में इस बीमारी का खतरा 2.04 गुना अधिक पाया गया.'

ये हैं असली विलेन (मुख्य कारण)

  • हर साल उम्र बढ़ने के साथ बढ़ता है खतरा.
  • पुरुषों की तुलना में महिलाओं में रिस्क अधिक.
  • कम पानी पीना, कम शारीरिक एक्टिविटी और सूखे मांस का सेवन.
  • फैटी लिवर के मरीजों में खतरा कहीं अधिक

क्या पानी की कमी से होती है पत्थरी

हालांकि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ये समस्या अधिक इसलिए भी पाई जाती हैं, क्योंकि यहां तापमान शून्य से नीचे होता है. लोगों की शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं. इसलिए लोग पानी कम पीते हैं. सर्दियों में सूखे मांस का सेवन भी गॉलस्टोन के प्रमुख कारण हैं, जबकि फैटी लीवर से पीड़ित लोगों में गॉलस्टोन होने की संभावना 1.79 गुना ज्यादा रही. शोध में ये भी सामने आया कि मोटापा , मधुमेह और उच्च रक्तचाप का गॉलस्टोन से कोई स्वतंत्र और प्रत्यक्ष संबंध नहीं मिला.

डॉ विपिन ने बताया कि कि समय पर गॉलस्टोन का इलाज न करवाने पर कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. इनमें गॉलब्लैडर में सूजन (एक्यूट कोलेसिस्टाइटिस), अग्नाशयशोथ (पैंक्रियाटाइटिस), अवरोधक पीलिया और बार-बार होने वाला पित्त (गॉलब्लैडर) दर्द शामिल हैं. इसके साथ ही दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं बहुत सीमित हैं इसे देखते हुए भविष्य में पित्ताशय के कैंसर जैसी जटिल बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है.

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