2027 के विधानसभा चुनावों में सपा PDA तो बसपा अपनाएगी BDM मॉडल; ब्राह्मण, दलित और मुसलमानों पर पूरा फोकस
100 सीटों पर सबसे पहले बसपा अपने प्रत्याशी घोषित करेगी. इन प्रत्याशियों में बड़ी संख्या में ब्राह्मण और मुस्लिम उम्मीदवार होंगे.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : February 27, 2026 at 9:58 PM IST
|Updated : February 27, 2026 at 11:10 PM IST
लखनऊ: आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अपना मॉडल तय कर लिया है. समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पीडीए मॉडल पर विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी उतारेंगे तो बहुजन समाज पार्टी बीडीएम मॉडल पर फोकस करेगी. सपा के केंद्र बिंदु में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक होंगे तो बसपा ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम प्रत्याशियों को केंद्र में रखकर टिकट देगी.
भले ही चुनाव में अभी लगभग एक साल का समय शेष हो, लेकिन बीएसपी ने अपने पत्ते अभी से खोलने शुरू कर दिए हैं. बसपा सुप्रीमो ने 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में चार विधानसभा सीटों पर अभी से अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं. इन प्रत्याशियों में दो ब्राह्मण हैं तो दो मुस्लिम. पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है कि जल्द ही 100 सीटों पर सबसे पहले बसपा अपने प्रत्याशी घोषित कर देगी और इन प्रत्याशियों में अच्छी खासी तादाद ब्राह्मण और मुस्लिम उम्मीदवारों की होगी.

प्रत्याशियों को लेकर मंथन कर रहे दल: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और इसे लेकर अभी से काउंटडाउन शुरू हो गया है. विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव में प्रत्याशियों को लेकर मंथन करने लगे हैं. सियासी तपिश को भांपते हुए कहां पर कौन सा किस जाति का प्रत्याशी मुफीद रहेगा इसकी रणनीति तैयार कर रहे हैं. पार्टियां जहां कुम्भ में शंकराचार्य के साथ ही ब्राह्मण बटुकों के साथ हुए अन्याय को लेकर जहां ब्राह्मणों के अपमान के मुद्दे को लेकर हवा बनाने की कोशिश में जुट गई हैं.

जाति और धर्म के आधार पर विश्लेषण: यूजीसी इक्विटी के मुद्दे पर भी राजनीतिक दल चुनाव में उम्मीदवारों का चयन जाति और धर्म के आधार पर करने को लेकर आपसी विचार विमर्श में जुट गए हैं. बहुजन समाज पार्टी ने तो इसी बीच प्रदेश की विभिन्न विधानसभा सीट पर चार प्रत्याशी भी घोषित कर दिए हैं. इनमें दो ब्राह्मण और दो मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दे दिया गया है. इससे बहुजन समाज पार्टी ने पत्ते खोल दिए हैं कि अगले विधानसभा चुनाव में 2027 में साल 2007 की तरह ब्राह्मणों को पूरा अधिकार और मुस्लिमों को उनका पूरा हक मिलेगा.
विनोद मिश्रा पहली बार बसपा से लड़ेंगे चुनाव: बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मण उम्मीदवार पर दांव खेलते हुए इस बार पिछले 14 साल से राजनीति में सक्रिय विनोद मिश्रा को उम्मीदवार घोषित कर दिया है. विनोद ने राजनीति की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी से की थी. इसके बाद वे समाजवादी पार्टी में भी रहे थे..साल 2022 तक उन्होंने समाजवादी पार्टी के लिए वोट मांगे थे, लेकिन इसके बाद वे बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए. जौनपुर के मुंगरा बादशाहपुर विधानसभा क्षेत्र के सोहासा गांव के रहने वाले विनोद मिश्रा काफी चर्चित चेहरा हैं और 14 साल से राजनीति कर रहे हैं.
बादशाहपुर विधानसभा पर सवर्णों का दबदबा: उनके खानदान में कभी भी कोई राजनीति में नहीं रहा है विनोद खुद पहली बार ही चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमाने उतर रहे हैं मुंगरा बादशाहपुर विधानसभा सीट की बात की जाए तो यहां पर सवर्णों का दबदबा है, खासकर ब्राह्मण मतदाताओं का. यहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या तकरीबन 80000 है, जबकि 70000 दलित मतदाता हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग की बात की जाए तो 7000 पटेल और 40000 यादव मतदाता हैं.
समाजवादी पार्टी के पंकज पटेल विधायक हैं: इस सीट पर 30000 मुस्लिम मतदाता भी हैं. वर्तमान में इस सीट से समाजवादी पार्टी के पंकज पटेल विधायक हैं. बहुजन समाज पार्टी ने इस उम्मीद के साथ अपना उम्मीदवार उतारा है कि उनका इस बार का फार्मूला काम करेगा और ब्राह्मण दलित व मुस्लिम मतदाता मिलकर उनके प्रत्याशी विनोद मिश्रा को विधानसभा सीट जिताएंगे.
इस बार बीएसपी ने खेला आशीष पाण्डेय पर दांव: बहुजन समाज पार्टी ने इस बार पिछले तीन बार के चुनाव से तैयारी कर रहे आशीष पांडेय को आखिरकार विधानसभा का टिकट दे ही दिया. आशीष मूल रूप से जालौन के माधवगढ़ विधानसभा क्षेत्र के कुरौती गांव के निवासी हैं. 14 साल से बहुजन समाज पार्टी के लिए काम कर रहे हैं. उनका रियल स्टेट का बड़ा बिजनेस है. साल 2017 और 2022 में उन्होंने माधवगढ़ विधानसभा सीट से अपने उम्मीदवारी जताई थी, लेकिन उनकी उम्मीदवारी बसपा को रास नहीं आई थी. उन्हें टिकट नहीं मिला था, लेकिन तीसरी बार का उनका प्रयास आखिरकार सफल हो गया है.
माधवगढ़ विधानसभा सबसे अधिक दलित मतदाता: अब बहुजन समाज पार्टी ने उन्हें माधवगढ़ विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार घोषित कर दिया है. आशीष से पहले उनके पूरे खानदान में कभी भी कोई राजनीति में नहीं आया है. हालांकि उनका भांजा बहुजन समाज पार्टी से जिला पंचायत सदस्य है. माधवगढ़ विधानसभा सीट के चुनावी समीकरण की बात करें तो यहां पर सबसे अधिक दलित मतदाताओं की संख्या है. 90000 के करीब दलित मतदाता हैं.
माधवगढ़ विधानसभा में 45000 ब्राह्मण मतदाता: इसके बाद सबसे ज्यादा संख्या ब्राह्मण मतदाताओं की है. लगभग़ 45000 ब्राह्मण मतदाता इस सीट पर हैं, साथ ही 40000 राजपूत और 20000 के करीब मुस्लिम मतदाता भी हैं. ओबीसी वोटर की संख्या भी इस सीट पर लगभग डेढ़ लाख है. वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी का इस सीट पर कब्जा है. मूलचंद निरंजन इस सीट से कुर्मी समाज के विधायक हैं.
दीदारगंज से आजमी ठोकेंगे ताल: बहुजन समाज पार्टी ने आजमगढ़ के दीदारगंज के रहने वाले अबुल कैस आजमी को एक बार फिर अपना उम्मीदवार अगले विधानसभा चुनाव के लिए घोषित कर दिया है. आजमी बहुजन समाज पार्टी के काफी पुराने नेता हैं. साल 2012 और 2017 में फूलपुर पवई से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर ही चुनाव लड़ चुके हैं. उन्हें पहले चुनाव में 46000 तो दूसरे इलेक्शन में 61000 वोट मिले थे.
फूलपुर पवई में 80000 दलित वोटर हैं: वह दूसरे नंबर पर आए थे. दोनों बार उनकी हार काफी कम मार्जिन से हुई थी. आजमी ने 2022 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन इस बार वे दीदारगंज विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी होंगे. इस सीट पर वोटों के समीकरण की बात की जाए तो लगभग 95000 मुस्लिम मतदाता और 80000 दलित वोटर हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की संख्या लगभग 38000 है जबकि 14000 चौहान और सात हजार्वनिषाद समाज के मतदाता हैं.
सपा से बसपा में आए आफताब प्रत्याशी घोषित: सहारनपुर के सरसावा क्षेत्र निवासी फिरोज आफताब का परिवार राजनीतिक है. यूपी के पहले विधानसभा में उनके दादा चौधरी जफर अहमद कांग्रेस से विधायक बने थे. इसके बाद उनके चाचा शमशाद अहमद 1977 में जनता पार्टी से विधायक निर्वाचित हुए थे. उनके पिता आफताब अहमद दलित मजदूर किसान पार्टी से चुनाव लड़े थे और दूसरे नंबर पर रहे थे. फिरोज आफताब ने साल 1996 में सरसावा से निर्दलीय चुनाव लड़ा और 40000 वोट हासिल किया.
आखिरी समय में दूसरा उम्मीदवार उतारा: वह भी दूसरे नंबर पर रहे थे. साल 2001 और 2007 में लोकदल से फिरोज आफताब ने चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. इसके बाद वे समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. 2012 का विधानसभा चुनाव उन्होंने सहारनपुर ग्रामीण से समाजवादी पार्टी से लड़ा था, लेकिन जीत नहीं मिली थी. इसके बाद समाजवादी पार्टी ने उन्हें सहारनपुर से 2014 का लोकसभा प्रत्याशी घोषित किया, लेकिन आखिरी समय में दूसरा उम्मीदवार उतार दिया.
आफताब सपा छोड़कर बीएसपी में शामिल हुए: इससे आफताब नाराज हो गए और समाजवादी पार्टी छोड़कर बहुजन समाज पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली. जिस सीट से वह चुनाव लड़े थे उस पर वर्तमान में आशु मलिक समाजवादी पार्टी के विधायक हैं. इस सीट के समीकरण की बात की जाए तो लगभग सवा लाख मुस्लिम वोटर हैं. 90000 दलित मतदाता हैं..32000 सैनी, 18000 गुर्जर और 24000 सवर्ण में ब्राह्मण और ठाकुर मतदाता हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आशु मलिक को एक लाख से ज्यादा वोट मिले थे.
क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक: राजनीतिक विश्लेषक प्रभात रंजन दीन का कहना है कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. 403 विधानसभा सीटों में से बहुजन समाज पार्टी के खाते में सिर्फ एक सीट है. ऐसे में यह कहना कि किसी फार्मूले के साथ सत्ता में बसपा की वापसी हो जाएगी, तर्कसंगत नहीं होगा, क्योंकि अन्य पार्टी भी चुनाव में पूरा जोर लगा रही हैं और सभी अपने समीकरण ही भिड़ा रही हैं.
भाजपा साल भर चुनावी मोड में रहती है: यह बात ठीक है कि भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश में पिछले दो बार से सरकार है और बीजेपी के प्रति मतदाताओं में नाराजगी हो सकती है, लेकिन भाजपा साल भर चुनावी मोड में ही रहती है, जबकि अन्य राजनीतिक दल चुनाव आने से एक साल या छह माह पहले ही जागते हैं. ऐसे में अभी यह कहना कि किसी समीकरण के सहारे बसपा चुनाव में सफल हो जाएगी तो जल्दबाजी होगी.
हां यह सही है कि 2007 के विधानसभा चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला कामयाब हुआ था, लेकिन अगले ही चुनाव में यह पूरी तरह फेल हो गया तब से लेकर अब तक चाहे विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव बसपा को सत्ता से काफी दूर रहना पड़ा है. ऐसे में ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम के सहारे बसपा चुनावी बैतरणी पार कर ही जाएगी, यह कोई जरूरी नहीं है.
क्या कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार: वरिष्ठ पत्रकार अशोक मिश्रा का मानना है कि यह बात ठीक है कि 2007 में बहुजन समाज पार्टी की उत्तर प्रदेश में पहली बार प्रचंड बहुमत की सरकार बनी थी. बसपा ने ब्राह्मणों को सरकार में प्रतिनिधित्व भी दिया था, लेकिन तब से लेकर अब तक राजनीति की दशा और दिशा काफी बदल चुकी है. अब यह कह देना कि किसी फार्मूले के सहारे कोई पार्टी जीत हासिल कर लेगी, ठीक नहीं होगा. बहुजन समाज पार्टी को सही सीट पर सही उम्मीदवारों का चयन करना होगा तभी उसके प्रत्याशी भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के प्रत्याशियों को टक्कर देने में सफल होंगे.
इसके अलावा अहम बात ये भी है कि बहुजन समाज पार्टी अकेले चुनावी मैदान में उतरती है जबकि सपा और कांग्रेस आपसी गठबंधन कर लेते हैं भारतीय जनता पार्टी तो पहले से ही काफी मजबूत है ऐसे में किसी फार्मूले के सहारे भी बसपा का रास्ता इतना आसान नहीं होगा..यह अच्छी बात है कि अन्य राजनीतिक दलों की तरह वह भी अपना फार्मूला बना रही है और हर जाति वर्ग को प्रतिनिधित्व देने के बारे में विचार कर रही है.
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