कांच नगरी फिरोजाबाद के हुनरमंद कलाकारों की कहानी, कांच में दिखती है गंगा-जमुनी तहज़ीब
कांच नगरी फिरोज़ाबाद में कांच की कारीगरी पर अनिल कुमार पाण्डेय के संपादन में अरविंद शर्मा की स्पेशल रिपोर्ट...

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : September 2, 2026 at 3:47 PM IST
|Updated : September 2, 2026 at 5:28 PM IST
फिरोजाबाद: कांच की चमक के लिए दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाला फिरोजाबाद सिर्फ चूड़ियों और कांच के सामान के लिए ही मशहूर नहीं है. इस शहर की गलियों में ऐसे हुनरमंद कलाकार भी हैं, जिनकी उंगलियां कांच को आकार देकर ऐसी कलाकृतियां तैयार करती हैं कि देखने वाला बस देखता रह जाता है. ख़ास बात यह है कि इन कलाकारों का धर्म भले ही अलग हो, लेकिन उनकी कला में किसी मज़हब की दीवार नज़र नहीं आती.
ठाकुर जी की मनमोहक मूर्तियां बनाते हैं मुस्लिम कारीगर: फिरोजाबाद के कुछ मुस्लिम कारीगर कांच से भगवान श्रीकृष्ण (ठाकुर जी) की ऐसी मनमोहक मूर्तियां तैयार कर रहे हैं, जिनमें बारीकी, ख़ूबसूरती और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है. कांच की नाजुक डंडियों और टुकड़ों को आग की भट्ठी पर तपाकर कलाकार जब अपने हुनर से उन्हें आकार देते हैं, तो देखते ही देखते भगवान की सुंदर प्रतिमा आकार लेने लगती है.
इन कलाकारों के हाथों से तैयार ठाकुर जी की मूर्ति को जब अंतिम रूप मिलता है, तो उसकी बारीकी देखकर सहज़ ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इसे बनाने में कितनी मेहनत, धैर्य और हुनर लगा होगा.
कला किसी एक धर्म की बपौती नहीं : इन कलाकारों की कहानी सिर्फ कांच से कलाकृति बनाने की नहीं है, बल्कि यह फिरोजाबाद की गंगा-जमुनी तहज़ीब की भी मिसाल है. मुस्लिम परिवार में जन्मे ये कलाकार भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियां बनाने में किसी तरह का संकोच नहीं करते. उनके लिए कला किसी एक धर्म की बपौती नहीं है.

कांच किसी धर्म को नहीं पहचानता: कलाकारों का कहना है कि उनके हाथों में आया कांच किसी धर्म को नहीं पहचानता. वह सिर्फ कलाकार का हुनर पहचानता है. इसी सोच के साथ वे कभी ठाकुर जी की मूर्ति बनाते हैं, तो कभी दूसरी धार्मिक और सजावटी कलाकृतियों को आकार देते हैं.
कांच को आग में तपाकर उसे मनचाहा आकार देना आसान काम नहीं है. थोड़ी सी चूक से पूरी कलाकृति ख़राब हो सकती है. इसके बावज़ूद वर्षों के अनुभव से इन कलाकारों ने इस कठिन कला को अपने हाथों में साध लिया है.

कांच की कलाकारी में जोख़िम बहुत : कांच की कलाकारी का यह काम बेहद मेहनत और जोख़िम भरा है. तेज गर्मी के बीच कारीगर कांच को गर्म करते हैं और फिर बेहद सावधानी से उसे मोड़कर अलग-अलग आकार देते हैं. कभी हाथों में औज़ार होते हैं, तो कभी आंखों के सामने तपता हुआ कांच. एक छोटी सी गलती और महीनों की मेहनत से सीखा हुनर पल भर में बेकार हो सकता है. इसके बावज़ूद कारीगर घंटों इस काम में जुटे रहते हैं.
ठाकुर जी की प्रतिमा तैयार करते समय कांच की हर बारीक रेखा, चेहरे का भाव, मुकुट, पोशाक और हाथों की मुद्रा पर विशेष ध्यान दिया जाता है. यही वज़ह है कि तैयार होने के बाद यह कलाकृति सामान्य कांच के सामान से बिल्कुल अलग नज़र आती है.

कला को उचित बाज़ार और पहचान दिलाना बड़ी चुनौती: शहर के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले इन कलाकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी कला को उचित बाज़ार और पहचान दिलाने की है. कलाकारों का कहना है कि कांच की ऐसी कलाकृतियां तैयार करने में काफी समय, मेहनत और लागत लगती है, लेकिन उन्हें उनके हुनर के अनुरूप कीमत नहीं मिल पाती.

सरकार और प्रशासन से मदद की उम्मीद: बदलते दौर में मशीनों से बनने वाले सजावटी सामान और बाज़ार में उपलब्ध सस्ते उत्पादों के कारण पारंपरिक कांच कला के सामने भी चुनौती बढ़ी है. नई पीढ़ी भी इस काम में बहुत ज्यादा रुचि नहीं दिखा रही है, क्योंकि मेहनत के मुकाबले आमदनी कम है. कलाकारों को उम्मीद है कि सरकार और प्रशासन यदि उनकी कला को प्रोत्साहन दें, उन्हें बाजार उपलब्ध कराएं, प्रदर्शनियों में जगह दें और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराएं तो, फिरोजाबाद की यह अनूठी कला देश-दुनिया तक पहुंच सकती है.

पारंपरिक कला को संरक्षण की मांग: कारीगरों की मांग है कि कांच की इस पारंपरिक कला को संरक्षण दिया जाए. उन्हें आधुनिक डिज़ाइन, मार्केटिंग और ऑनलाइन बिक्री का प्रशिक्षण दिया जाए. साथ ही ऐसे कलाकारों को आर्थिक सहायता और आसान ऋण उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे अपनी छोटी इकाइयां स्थापित कर सकें और दूसरे युवाओं को भी रोज़गार दे सकें.

अगर सरकार इस दिशा में गंभीर पहल करे तो फिरोजाबाद की कांच कला को एक नई पहचान मिल सकती है. यहां तैयार होने वाली ठाकुर जी की कांच की प्रतिमाएं देश के मंदिरों, घरों और धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ विदेशों तक पहुंच सकती हैं.

फिरोजाबाद की इन कलाकृतियों की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि इनमें सिर्फ कांच की चमक नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और भाईचारे की चमक भी दिखाई देती है.
मुस्लिम कलाकारों के हाथों से आकार लेती ठाकुर जी की प्रतिमा इस बात का संदेश देती है कि कला की कोई जाति और कोई धर्म नहीं होता. जहां एक तरफ कलाकार आग की तपिश में कांच को सुंदर आकार देते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी कला समाज को यह संदेश भी देती है कि हुनर और मोहब्बत मज़हब की सीमाओं से कहीं ऊपर हैं.
फिरोजाबाद की गलियों में कांच से बनते ठाकुर जी सिर्फ एक कलाकृति नहीं, बल्कि उस सांझी संस्कृति की तस्वीर हैं, जिसमें हुनर मुस्लिम हाथों का है और आस्था की खूबसूरती हर देखने वाले के दिल तक पहुंचती है.
ईटीवी भारत की टीम ने लेबर कॉलोनी स्थित मुस्लिम कलाकर मुवीन खान से बातचीत की. उन्होंने बताया कि वह पिछले 30 सालों से इस काम को करते हैं. इससे पहले उनके पिता इस काम को करते थे और अपने पिता से ही उन्होंने इस काम को सीखा है. हमारी टीम ने उन्हें पूछा कि वह मुस्लिम कारीगर हैं ऐसे में उन्हें हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां बनाने में अटपटा नहीं लगता.
इस सवाल के ज़वाब में कारीगर मुवीन ने कहा कि वह कलाकार हैं और कलाकार का धर्म कला का प्रदर्शन करना होता है. हम लोग धर्म नहीं देखते. सभी धर्मों के देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने के साथ ही वह अन्य कलात्मक कलाकृतियों को भी बनाते है.
व्यापारी और बिचौलिए उठा रहे फायदा: मुवीन खान ने कहा कि वह लंबे समय से इस काम को करते आ रहे हैं, लेकिन रोज कमाकर खाने जैसी हालत है. रसोई गैस का सिलेंडर ब्लैक में खरीदना पड़ता है. उन्होंने कहा कि हमारी मेहनत का फायदा व्यापारी और बिचौलिए उठा लेते है. उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस काम मे प्रयुक्त होने वाला रौ मेटेरियल को रियायती दर पर मुहैया करायी जाए.

क्या कहते हैं उद्योग विभाग के अधिकारी: जिला उद्योग विभाग के सहायक आयुक्त संदीप कुमार यादव का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हस्तशिल्पियों की मदद के लिए दो तरह की योजनाएं चला रही हैं. पहली हस्त शिल्प विपणन प्रोत्साहन योजना है. इसके अंतर्गत अगर हस्तशिल्पी, जो हस्तशिल्प में नोटिफाइड फेयर हैं, उनमें कहीं भी प्रदेश में पार्टिसिपेट करते हैं, तो गवर्नमेंट उनको जो भाड़ा होता है, जो यहाँ से माल लाने-ले जाने में लगता है. उसके लिए 7500 रुपये तक की सब्सिडी देती है.
दूसरे एक जनपद एक उत्पाद (ODOP) विपणन प्रोत्साहन योजना. इसके तहत अगर हस्तशिल्पी कहीं स्टॉल लगाते हैं. कहीं पर भी किसी फेयर में पार्टिसिपेट करते हैं तो उसमें पार्टिसिपेंट करने पर जो चार्जेज़ हैं, उसका 75 प्रतिशत ही लिया जाता है. साथ ही आने-जाने का एक आदमी का बस या रेल के किराए के साथ उनके सामान माल ढुलाई का 75 फीसदी या अधिकतम 7500 रुपये सरकार उस पर सब्सिडी देती है.
जानिए आंकड़ों के बारे में : फिरोजाबाद में लगभग छह सौ परिवार यानी दो हजार कारीगर कांच से जुड़े काम को करते हैं. इनमें से से 100 मुस्लिम परिवार हैं. इस तरह से फिरोजाबाद के कांच के कारीगरों का सालाना टर्नओवर 5 से छह करोड़ रुपये का रहता है.
यहां ये कांच की मूर्तियां 6 इंच से 18 इंच तक की साइज़ में बन रही हैं. इनकी कीमत 100 रुपये से लेकर 30 हजार रुपये तक है. जन्माष्टमी पर राधा-कृष्ण, रामनवमी पर राम दरबार, गणेश चतुर्थी पर गणेश जी और सावन में शिवलिंग और नंदी की मूर्तियों की डिमांड रहती है. यहां सिर्फ़ उत्तर प्रदेश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि मुंबई, दिल्ली, राजस्थान से सबसे ज्यादा ऑर्डर आ रहे हैं. मुंबई से सर्वाधिक डिमांड है. विदेशों में भी यहां से बने कांच के उत्पाद एक्सपोर्ट होते हैं.
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