त्रेता युग में माता जानकी की डोली स्थल बना लोगों के आस्था का केंद्र, होली के दौरान होता है विशेष आयोजन
सीतामढ़ी में स्थित पंथपाकर धाम मिथिला की आस्था-रामायण कालीन का अद्वितीय संगम है. मान्यता है कि माता सीता की डोली इसी स्थान पर रुकी थी.

Published : March 3, 2026 at 3:33 PM IST
सीतामढ़ी: देश में कल यानी 4 मार्च को होल का त्योहार मनाया जाएगा. जगह-जगह इसे लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं. बिहार के सीतामढ़ी के पंथपाकार में विशेष आयोजन की तैयारियां शुरू हो चुकी है. माना जाता है कि इस स्थान पर त्रेता युग में माता जानकी ने पहली बार अयोध्या जाने के दौरान विश्राम किया था.
भगवान राम और माता जानकी ने किया था विश्राम! : मान्यता है कि त्रेता युग में जब भगवान राम का विवाह माता सीता से हुआ था. इस दौरान अयोध्या से जनकपुर बारात आई थी और जब भगवान राम विवाह कर अयोध्या जा रहे थे तो रात्रि विश्राम उन्होंने सीतामढ़ी जिले के पंथपाकार में किया था. यह स्थल सदियों से श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र बना हुआ है. लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं और जिस स्थान पर माता सीता की डोली रखी गई थी उस स्थान पर पूजा अर्चना करते हैं.
भगवान शिव ने तालाब और पाकर के पेड़ का किया था निर्माण! : बाल्मीकि रामायण के अनुसार जब माता सीता की डोली विवाह के बाद जनकपुर से अयोध्या के लिए चलने वाली थी, इससे पहले ही भगवान शिव ने पथ पाकड़ में पहुंचकर माता सीता के और भगवान राम के विश्राम के लिए एक पेड़ का निर्माण किया था. वहीं भगवान शिव ने जल को लेकर अपने प्रभाव से एक तालाब का भी निर्माण किया था. जो आज भी लोगों के आस्था का केंद्र है.
श्रद्धालु पवित्र जल को घर भी ले जाते हैं : आज भी इस तालाब का पानी ऊपर से देखने पर गंदा दिखता है लेकिन अगर इस पानी को श्रद्धालु पीते हैं तो यह मिनरल वाटर से कम नहीं है. श्रद्धालु इस पवित्र जल को किसी बर्तन में भरकर अपने घर भी ले जाते हैं. स्थानीय महंत का कहना है कि पाकर का पेड़ और यह तालाब आज ही नहीं सदियों से श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है.
''जब जिले के अधिकतम चापाकल तालाब भी सूख जाते हैं, फिर भी इस तालाब का जल जस का तस रहता है. इसमें कभी पानी कम नहीं होता है.'' -रामरेखा दास, मंदिर के महंत

होली के दिन होता है विशेष आयोजन : होली के दौरान पंथपाकर में विशेष होली का आयोजन होता है. होली से पहले भी देश के विभिन्न मठ मंदिरों से आए महंत और पुजारी यहां होली खेलते हैं. वहीं स्थानीय महंत ने बताया कि जब भगवान परशुराम स्वयंवर के दौरान यह जान चुके थे कि भगवान राम ही नारायण है तो माता सीता की जब डोली यहां आकर रूकी तो भगवान परशुराम भी नारायण अवतार भगवान राम से मिलने पथ पाकर पहुंचे. जहां भगवान राम और भगवान परशुराम का संवाद भी हुआ. स्थानीय महंत ने बताया कि बाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान परशुराम भी भगवान राम के साथ 6 दिनों तक इसी स्थान पर रुके थे और इसके बाद यहां से चले गए थे.
''आज भी अगर आप बाल्मीकि रामायण पढ़ेंगे तो आप उसमें देखेंगे कि भगवान राम जब माता सीता के साथ पंथपाकड़ में 6 दिनों तक रुके थे तो राजा जनक ने माता जानकी और भगवान राम को यहीं रोक लिया. उनकी छाया रामायण में लीला करने के लिए अयोध्या भेज दिया.'' - रामरेखा दास, मंदिर के महंत

साक्षात मौजूद है पंथपाकर में माता सीता और भगवान राम : मंहत ने बताया कि बाल्मीकि रामायण के अनुसार उनकी छाया ही 14 वर्षों तक वनों में असुरों का संघार करती रही और रावण का भी भगवान राम की छाया ने ही संघार किया था. वहीं महंत का कहना है कि माता जानकी की जन्मस्थली पुनौरा धाम में दर्शन के बाद जो सच्चे दिल से पंथपाकर आते हैं उनकी माता सीता और भगवान राम सब मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं.
''आज भी लाखों की संख्या में आने वाले पर्यटक माता सीता की डोली स्थल का दर्शन करते हैं. लाखों-करोड़ों लोगों के आस्था का केंद्र माने जाने वाला पंथपाकर के सौंदर्यीकरण का कार्य शुरू हो चुका है.''- रामरेखा दास, मंदिर के महंत

वैवाहिक जीवन में प्रेम, सुख और समृद्धि मिलती है : हर साल यहां जानकी डोली परिक्रमा यात्रा के दौरान विशेष पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है. इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. डोली यात्रा के दर्शन करते हैं और पाकर वृक्षों के पास माथा टेकते हैं. स्थानीय मान्यता है कि यहां आशीर्वाद लेने से वैवाहिक जीवन में प्रेम, सुख और समृद्धि बनी रहती है. यह स्थल मिथिला और अयोध्या के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रिश्तों का प्रतीक भी है जो पीढ़ियों से जीवित है.
राज्य और केंद्र सरकार ने पर्यटक स्थल घोषित किया : पंथपाकर धाम मिथिला की आस्था और रामायण कालीन इतिहास का अद्वितीय संगम है. 'पंथ' का अर्थ है मार्ग और 'पाकर' एक प्रकार का वृक्ष है जो यहां की पहचान है. इसी कारण इस स्थल का नाम 'पंथपाकर' पड़ा. यह स्थान सदियों से श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ केंद्र रहा है. हाल के दिनों में राज्य सरकार और केंद्र सरकार इसे पर्यटन स्थल घोषित कर करोड़ों रुपए की लागत से इसका सौंदर्यीकरण कर रही है. आने वाले दिनों में यह स्थान भव्य मंदिर के रूप में देखा जाएगा.

आसपास के धार्मिक स्थलों को जोड़ने की पहल : योजना के तहत मंदिर परिसर का सौंदर्यीकरण, श्रद्धालुओं के लिए धर्मशाला, स्वच्छ पेयजल व्यवस्था, सौर ऊर्जा से प्रकाशित मार्ग, पार्किंग स्थल, डिजिटल सूचना केंद्र और सांस्कृतिक प्रदर्शनी हॉल का निर्माण किया जाएगा. पर्यटन से जुड़े ढांचे का विस्तार किया जाएगा ताकि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को यहां बेहतर सुविधाएं मिल सकें. यह परियोजना रामायण सर्किट के अंतर्गत सीतामढ़ी और आसपास के धार्मिक स्थलों को जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है.
पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा : धार्मिक महत्व को और मजबूती देगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति प्रदान करेगी. पर्यटन के बढ़ने से होटल, परिवहन, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों को बाजार मिलेगा. पंथपाकर धाम का नया स्वरूप श्रद्धालुओं को आधुनिक सुविधाओं के साथ एक आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करेगा. जिस स्थल से कभी जनकी डोली की यात्रा शुरू होती थी और जहां माता सीता ने पाकर वृक्ष को जीवन दिया था वह अब अपनी नई आभा और पहचान के साथ मिथिला की संस्कृति और आस्था का वैश्विक केंद्र बनने की ओर अग्रसर है.
इन खबरों को भी पढ़ें-
आगरा की मयूर पायल पहनेंगी माता जानकी, मुस्लिम कारीगर कर रहे तैयार, जानिए क्या है खासियत

