कागजों पर डॉक्टर...अस्पताल में ताला! सरकारी भरोसे रहे तो हो जाएगी मवेशी की मौत
लाखों की लागत से बना मवेशी अस्पताल आज बदहाली की कहानी बयां कर रहा है. डॉक्टर है लेकिन आते नहीं, अस्पताल में ताला लगा होता.

Published : May 22, 2026 at 5:39 PM IST
सीतामढ़ी: डुमरा प्रखंड के मिश्रौलिया गांव में लाखों रुपये की लागत से पशु चिकित्सा अस्पताल बनाया गया था. अब वह अस्पताल बदहाली की कहानी बन गया है. भवन की स्थिति इतनी खराब हो गयी है कि दिवार के प्लास्टर उखड़ कर नीचे गिर रहे हैं. खिड़किया टूंट गयी है. भवन के चारो ओर जंगल झाड़ उग आए हैं, ऐसा लगता है मानो इस अस्पताल में वर्षों से कोई इलाज नहीं हुआ हो.
कागजों पर डॉक्टर की तैनाती: हैरानी करने वाली बात है कि यहां डॉक्टर की तैनाती के बावजूद पशुपालकों को लाभ नहीं मिल रहा है. जिला स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार इस पशु अस्पताल में डॉक्टर निशांत कुमार की नियुक्ति है, लेकिन लोगों का कहना है कि डॉक्टर आखिरी बार कब आए थे, यह याद नहीं है. अस्पताल का दरवाजा ज्यादातर बंद रहता. गेट पर ताला लटका होता है.
पशुपालन पर टिकी है आजीविका: गांव के पशुपालकों के लिए यह स्थिति बेहद परेशान करने वाली है. गांव और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में लोग पशुपालन करते हैं. लेकिन, जब पशु बीमार पड़ते हैं, तो उन्हें इलाज के लिए भटकना पड़ता है. मजबूरी में पशुपालक निजी डॉक्टरों का सहारा लेते हैं, जिससे उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है. इस कारण कई किसान कर्ज में डूब जाते हैं.
सरकारी दावों की खुली पोल: अस्पताल की इस व्यवस्था को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधी और लोगों में भारी नाराजगी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार लाखों रुपए खर्च कर अस्पताल तो बनवा दिया, लेकिन इसकी देखरेख और संचालन पर कोई ध्यान नहीं है. अस्पताल की इस बदहाली ने सरकारी दावों की पोल खोल दी. किसानों की प्रगति के वादे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं.
बेजुबानों को बचाने का संकट: स्थानीय बताते हैं कि आसपास 10-12 गांव हैं, जहां किसी किसान का पशु बीमार होता है तो उसे काफी परेशानी होती है. गांव के किसानों को याद भी नहीं होगा कि आखिरी बार पशु चिकित्सक कब आए थे. किसी किसान का पशु बीमार पड़ा और समय से निजी चिकित्सक नहीं मिला तो सरकारी अस्पताल के भरोसे पशु की मौत होना तय है.

"बहुत पहले यह अस्पताल बनाया गया था, लेकिन आज खंडहर बन गया है. अगर किसी का पशु बीमार पड़ता है तो प्राइवेट डॉक्टर से इलाज कराते हैं. अगर सरकारी के भरोसे रहेंगे तो पशु की मौत हो जाएगी." -रामप्रीत, पशुपालक
गरीब किसानों की मजबूरी: स्थानीय पार्षद सिमांत खिरहर कहते हैं कि आसपास के जितने गांव हैं, वहां के लोगों के पास गाय, भैंस, बकरी आदि अलग-अलग पशु, लेकिन अगर पशु बीमार हुए तो उन्हें समय से इलाज नहीं मिल पाता. इसमें कई पशुपालक ऐसे हैं, जो काफी गरीब है. वे निजि चिकिस्तक से इलाज नहीं करा सकते. ऐसे में उन्हें विवश होकर डुमरा जाना पड़ता है. सबसे हैरानी की बात है कि यहां डॉक्टर रहते ही नहीं हैं.
"यह अस्पताल गांव के लिए बहुत जरूरी था, लेकिन डॉक्टर के नहीं आने से इसका कोई फायदा नहीं मिल रहा है. हमने कई बार अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. अगर जल्द व्यवस्था नहीं सुधरी, तो हम आंदोलन करने को मजबूर होंगे." -सिमांत खिरहर, पार्षद

परिचारक का हैरान करने वाला दावा: हालांकि ग्रामीणों के आरोपों और ज़मीनी हकीकत के विपरीत अस्पताल परिचारक अरविंद कुमार ने डॉक्टर का बचाव करने की कोशिश की. कहा कि 'डॉक्टर आते रहते हैं.' लेकिन परिचारक का यह दावा पशुपालक के गले से नहीं उतर रहा. हालांकि डॉक्टर निशांत कुमार ने फोन पर बात करने से साफ़ मना कर दिया. कहा कि कार्य से बाहर हैं. मिलना है तो परसों जिला मुख्यालय स्थित अस्पताल में आकर मिले.

जिला पशुपालन पदाधिकारी का आश्वासन: इधर, जब इस पूरी लापरवाही और ग्रामीणों के आक्रोश को लेकर जिला पशुपालन पदाधिकारी से बात की गयी तो उन्होंने इस मामले की जांच कराने की बात कही है. जिला पशुपालन पदाधिकारी डॉ प्रेम कुमार ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिलाया.
"मामले की जानकारी मुझे नहीं थी. मामला संज्ञान में आया है. हॉस्पिटल में डॉक्टर पदस्थापित है. अगर वह अस्पताल नहीं जाते हैं तो इसकी जांच की जाएगी. जांच कर कार्रवाई की जाएगी." -डॉ प्रेम कुमार, जिला पशुपालन पदाधिकारी
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