सावन की सोमवारी पर हलेश्वरनाथ धाम में उमड़ा आस्था का सैलाब; सिर्फ शिवधाम नहीं, माता सीता के प्राकट्य का भी साक्षी है यह पौराणिक मंदिर
हलेश्वरनाथ मंदिर प्राचीन शिवधाम ही नहीं, बल्कि माता सीता के प्राकट्य से जुड़ी पौराणिक परंपरा का भी साक्षी है. धर्मेंद्र कुमार झा की रिपोर्ट

Published : August 17, 2026 at 10:36 AM IST
सीतामढ़ी: सावन के पवित्र महीने की शुरुआत के साथ ही प्रदेश के विभिन्न शिव मंदिरों में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है. सावन के महीने में विशेषकर सोमवार के दिन सोमवारी व्रत के अवसर पर शिवालयों में जलाभिषेक के लिए भक्तों की भारी भीड़ देखी जा रही है. इसी क्रम में, बिहार के सीतामढ़ी जिले का ऐतिहासिक हलेश्वरनाथ मंदिर इन दिनों 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गूंज रहा है.
माता सीता के प्राकट्य से जुड़ा इतिहास: यह पावन स्थल केवल एक प्राचीन शिवधाम ही नहीं, बल्कि माता सीता के प्राकट्य से जुड़ी उस पौराणिक परंपरा का भी जीवंत साक्षी है, जिसका उल्लेख स्थानीय जनश्रुतियों और धार्मिक मान्यताओं में मिलता है. मान्यता है कि त्रेता युग में यहीं राजा जनक ने ऋषि-मुनियों के निर्देश पर हलेश्वर स्थान में यज्ञ कर हल चलाना शुरू किया था, जिसके बाद पुनौरा धाम में माता सीता का प्राकट्य हुआ. यही कारण है कि सावन के इस पावन महीने में ये मंदिर देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है.

भगवान शिव की आराधना: कहा जाता है कि जनकपुर में पड़े भीषण अकाल के दौरान राजा जनक ने ऋषि-मुनियों के निर्देश पर हलेश्वर स्थान में यज्ञ कर भगवान शिव की आराधना की थी. बाद में भोलेनाथ की आराधना कर यहीं से हल चलाना शुरू किया. आगे चलकर पुनौरा धाम में हल की नोक धरती से टकराई और माता सीता का प्राकट्य हुआ. यही कारण है कि हलेश्वरनाथ मंदिर आज भी देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है.
माता सीता की जन्मस्थली: मिथिला की पावन धरती पर स्थित सीतामढ़ी को माता सीता की जन्मस्थली के रूप में विशेष पहचान प्राप्त है. इसी जिले में स्थित हलेश्वरनाथ मंदिर धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. सावन, महाशिवरात्रि और अन्य पर्वों के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.लेकिन इस मंदिर की पहचान केवल एक शिव मंदिर तक सीमित नहीं है. ये माता सीता के प्राकट्य से जुड़ी पौराणिक कथा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है.
त्रेता युग की कथा से जुड़ी मान्यता
हलेश्वर स्थान ट्रस्ट के सदस्य राजीव कुशवाहा ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में मिथिला की राजधानी जनकपुर में भीषण अकाल पड़ गया था. लंबे समय तक वर्षा नहीं होने से जनजीवन संकट में आ गया. प्रजा की पीड़ा देखकर राजा जनक अत्यंत चिंतित हुए. तब उन्होंने ऋषि-मुनियों से इसका समाधान पूछा, ऋषियों ने उन्हें भगवान शिव की आराधना और विशेष यज्ञ करने की सलाह दी.
"त्रेता युग में मिथिला की राजधानी जनकपुर में भीषण अकाल पड़ गया था. प्रजा की पीड़ा देखकर राजा जनक अत्यंत चिंतित हुए. राजा जनक ने ऋषि-मुनियों के निर्देश पर हलेश्वर स्थान में यज्ञ कर हल चलाना शुरू किया था और बाद में उसी हल की नोक धरती से टकराई और माता सीता का प्राकट्य हुआ." - राजीव कुशवाहा, सदस्य, हलेश्वर स्थान ट्रस्ट
राजा जनक स्वयं खेत में हल लेकर उतरे: कहा जाता है कि राजा जनक ने वर्तमान हलेश्वर स्थान पर हलेश्वरी यज्ञ का आयोजन किया और शिवलिंग की स्थापना कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की. यज्ञ संपन्न होने के बाद राजा जनक स्वयं खेत में हल लेकर उतरे. यह केवल खेती की शुरुआत नहीं थी, बल्कि धार्मिक अनुष्ठान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था.
पुनौरा धाम में हुआ माता सीता का प्राकट्य: जनश्रुति के अनुसार हलेश्वरनाथ से हल चलाते हुए राजा जनक जब वर्तमान पुनौरा धाम क्षेत्र में पहुंचे तो हल की नोक धरती से टकराई, उसी स्थान से एक दिव्य बालिका प्रकट हुईं. जिन्हें राजा जनक ने अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया. यही बालिका आगे चलकर माता सीता के रूप में पूरे विश्व में पूजित हुईं. इसी मान्यता के कारण हलेश्वरनाथ और पुनौरा धाम का धार्मिक संबंध आज भी अभिन्न माना जाता है. श्रद्धालु इन दोनों स्थलों के दर्शन को एक ही आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा मानते हैं.
भगवान शिव और माता सीता की आस्था का संगम: हलेश्वरनाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि यहां भगवान शिव और माता सीता की कथा एक-दूसरे से जुड़ती है. शिव की आराधना के बाद ही माता सीता के प्राकट्य की कथा आगे बढ़ती है. यही कारण है कि यहां आने वाले श्रद्धालु पहले भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और फिर पुनौरा धाम जाकर माता जानकी के दर्शन करते हैं. मान्यता है कि सच्चे मन से भगवान हलेश्वरनाथ का जलाभिषेक करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन के कष्ट दूर होते हैं.

सावन में उमड़ता है आस्था का सैलाब: सावन का महीना आते ही हलेश्वरनाथ मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है. बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. कांवड़िए पवित्र जल लेकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं. मंदिर परिसर 'बोल बम' और 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गूंज उठता है. सुबह से देर रात तक पूजा-अर्चना और दर्शन का सिलसिला चलता रहता है.
देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु: मिथिला की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जुड़े इस मंदिर में केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों और नेपाल सहित अन्य स्थानों से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं. विशेष अवसरों पर हजारों नहीं बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ यहां उमड़ती है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान हलेश्वरनाथ के दर्शन और जलाभिषेक से परिवार में सुख-समृद्धि आती है तथा जीवन की बाधाएं दूर होती हैं.
धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र: हलेश्वरनाथ मंदिर, पुनौरा धाम और जनकपुर धाम को जोड़कर देखा जाए तो यह पूरा क्षेत्र रामायण सर्किट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. यही वजह है कि यहां धार्मिक पर्यटन की संभावनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं. राज्य सरकार और जिला प्रशासन भी समय-समय पर यहां आधारभूत सुविधाओं के विकास, श्रद्धालुओं की सुविधा और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास करते रहे हैं. सड़क, प्रकाश व्यवस्था, पेयजल और अन्य सुविधाओं में सुधार से यहां आने वाले श्रद्धालुओं को लाभ मिल रहा है.
मिथिला की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक: हलेश्वरनाथ मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है. यहां हर वर्ष विभिन्न धार्मिक आयोजन, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय लोग शामिल होते हैं.मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि मिथिला की परंपराओं और लोक संस्कृति का भी अनुभव करते हैं.
आस्था और विश्वास का जीवंत केंद्र:सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हलेश्वरनाथ मंदिर आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. राजा जनक, भगवान शिव और माता सीता से जुड़ी यह पौराणिक परंपरा इस स्थान को विशेष महत्व प्रदान करती है. जन विश्वासों ने हलेश्वरनाथ को मिथिला की आध्यात्मिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बना दिया है. यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान हलेश्वरनाथ का जलाभिषेक करते हैं, माता जानकी को नमन करते हैं और अपने जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना करते हैं.
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