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रेशम हब छत्तीसगढ़, रेशमी रास्ते पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिला संबल, महिलाएं हो रही आत्मनिर्भर

रेशम का धागा बनाकर कोरबा जैसे ट्रायबल जिले की तस्वीर बदल रही है.

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रेशम हब छत्तीसगढ़ (ETV Bharat Chhattisgarh)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : October 16, 2025 at 7:34 PM IST

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कोरबा(राजकुमार शाह): 25 साल में छत्तीसगढ़ रेशम धागे के उत्पादन में सिल्क हब बन चुका है. रेशम उत्पादन के मामले में छत्तीसगढ़ भारत में केवल झारखंड से पीछे है. छत्तीसगढ़ देश का दूसरा सबसे बड़ा रेशम उत्पादक है. विकास के इस रेशमी रास्ते पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी संबल मिला है. टसर और मलबरी रेशम उत्पादन के क्षेत्र में समूह की महिलाओं, किसानों के साथ श्रमिकों के जीवन में भी परिवर्तन आया है.

जानिए कैसे होता है रेशम का उत्पादन: कोसा बीज केंद्र में मास्टर ट्रेनर अनीता कौशिक बताती है पहले चरण में जुलाई में इसका उत्पादन शुरू किया जाता है. तीस दिन में कोसा तैयार हो जाता है. उसके बाद धागाकरण किया जाता है. ग्रेड के अनुसार कोसा निकाला जाता है. जिसमें A, B और C ग्रेड है. कोसा को छंटाई के बाद अलग किया जाता है. इसके बाद इसे उबाला जाता है. जिसमें प्रति लीटर 5 ग्राम खाने का सोड़ा और 6 ग्राम कपड़े धोने का सोड़ा लिया जाता है. ग्रेड के अनुसार कोसा की छंटाई कर 25 से 30 मिनट तक उबाला जाता है. इसके बाद इसे भांप दिया जाता है. भाप देने के बाद घागा तैयार किया जाता है.

रेशम हब बनता कोरबा (ETV BHARAT)

अनीता बताती है कि कोसा दो प्रकार का होता है. पॉली कोसा और गुड कोसा. गुड कोसा को मशीन से धागा निकालते हैं. इसमें 60 से 70 डेनियर का धागा तैयार किया जाता है. डेनियर माप की एक इकाई है जो धागों की मोटाई बताती है. पॉली कोसा स्पिनिंग मशीन से तैयार किया जाता है. इसमें 20 से 25 डेनियर का धागा अच्छा माना जाता है. जितने काउंट की डिमांड होती है. उसके अनुसार धागा निकाला जाता है. बुनियाद धागा से साड़ी तैयार की जाती है. स्पिनिंग धागा से कोट जैकेट तैयार किया जाता है.

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कोरबा के रेशमी दागे से बनी कोसा साड़ी (ETV Bharat Chhattisgarh)

रेशम के धागे बनाकर महिलाएं कमा रही आय: अनीता कहती है रेशम उत्पादन काफी लाभ वाला क्षेत्र है. क्योंकि इसमें वेस्ट मटेरियल भी बिक जाता है. जिससे कमाई हो जाती है. ककून से जितना जल्दी घागा निकाला जाएगा उतना फायदा मिलता है. इस वजह से स्व सहायता समूह की महिलाएं इससे काफी लाभान्वित हो रही है. यहां के किसान भी लाभान्वित हो रहे हैं. समूह की महिलाएं कीट पालन भी कर रही है. इसमें साल में तीन से चार बार फसल होती है.

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छत्तीसगढ़ देश का दूसरा सबसे बड़ा रेशम उत्पादक (ETV Bharat Chhattisgarh)

धागाकरण के कार्यों से महिलाओं को जोड़ा: ककून से धागा निकालने की प्रक्रिया में रेशम विभाग ने स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया है. टसर/मलबरी/धागाकरण जैसे कार्यो में स्व सहायता समूहों का गठन कर उन्हें लाभ पहुंचाया जा रहा है. साल 2025 की स्थिति में टसर योजना अन्तर्गत 26 स्व सहायता समूह, तो मलबरी योजना अन्तर्गत 7 स्व सहायता समूह और इसी तरह धागाकरण कार्य में 14 स्व सहायता समूहों को जोड़ा है.

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ककून से रेशमी धागा बनाती महिलाएं (ETV Bharat Chhattisgarh)

महिलाओं को मिला रोजगार: जिले के कोसाबाड़ी स्थित केंद्र में काम करने वाली लाभार्थी महिलाएं बताती है कि वह पिछले 2 से तीन साल से कोसा धागा केंद्र में काम कर रही हैं. हर रोज 200 से ढाई सौ ग्राम धागा निकाल लेती हैं. वे कहती है कि पहले वह और उनकी जैसे कई महिलाएं बेरोजगार थी, अब महीने भर में 8 से साढ़े 8 हजार रुपये धागा निकाल कर मिल जाते हैं. जिससे उनका घर चल जाता है. वे कहती हैं दूसरी जगह काम करने जाने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इसमें कम मेहनत लगती है. महिलाओं का ये भी कहना है कि अभी उन्हें साल में चार महीने काम मिलता है, 12 महीने काम मिल जाए तो और अच्छा रहेगा.

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रेशम उत्पादन से महिलाओं को मिला रोजगार (ETV Bharat Chhattisgarh)

वहीं कोसाबाड़ी केंद्र में धागा निकाल कर आय कमाने वाली एक अन्य महिला ने बताया कि तीन से चार साल से काम कर रही है. उन्हें यहां काम करना अच्छा लगता है. वे बताती है कि उनका काम कोसा से धागा निकालकर रील बनाना है. जिसे डीलर और बुनकर ले जाते हैं और कोसा साड़ी बनाते हैं. वे कहती है कि यहां काम कर कई महिलाएं अपना घर चला रही है. जरूरतें पूरी कर रहे हैं. यहां काम करने से उन्हें बहुत लाभ हुआ है. वे आगे भी यहां काम करना चाहती है.

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रेशम उत्पादन से जुड़कर महिलाएं बन रही आत्मनिर्भर (ETV Bharat Chhattisgarh)

रेशम पालन केंद्र में फील्ड मैन मंगल दास महंत बताते हैं "साल 2020 में महिलाओं को प्रशिक्षण देने के बाद उन्हें काम दिया गया. पहले 150 रुपये दिया जाता था, फिर 200, 250 इस तरह पैसे बढ़ाए गए. समूह की महिलाओं को रोजगार मिलता है. यहां से निकला कोसा धागा बुनकर ले जाते हैं. बुनकर बताते हैं कि कोसा साड़ी विदेशों तक जाती है. कोसा साड़ी का शुरुआती दाम 4000 रुपये से शुरू होता है, जो 40 से 50 हजार रुपये तक जाता है. रेशम उत्पादन से कई लोगों को फायदा हो रहा है. कई किसान फार्म में रेशम कीट पालन कर लाभ कमा रहे हैं."

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कोरबा के कोसा की दूर दूर तक डिमांड (ETV Bharat Chhattisgarh)

49 पालित टसर केंद्रों में रेशम उत्पादन: रेशम विभाग कोरबा के सहायक संचालक बीएस भंडारी ने बताया कि रेशम उत्पादन के मामले में छत्तीसगढ़, झारखंड के बाद देश में दूसरा स्थान है. कोरबा जिले में रेशम गतिविधियों में पांच विकासखंडों के 49 पालित टसर केंद्रों में रेशम उत्पादन किया जा रहा है. टसर ककून का उत्पादन वर्ष 2000 में 67.1 करोड़ पीस से बढ़कर 2024-25 में 108.56 करोड़ पीस हो गया है. वर्तमान वर्ष 2025-26 में अब तक 50 करोड़ पीस टसर का उत्पादन किया जा चुका है. इस वर्ष का लक्ष्य पिछले वर्ष से भी ज्यादा है. विभाग के अनुसार इस वर्ष बड़ा हुआ लक्ष्य आसानी से प्राप्त कर लिया जाएगा.

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कोरबा में रेशम उत्पादन (ETV Bharat Chhattisgarh)

छत्तीसगढ़ में रेशम उत्पादन इस तरह बढ़ा: छत्तीसगढ़ बनने के बाद साल 2000 में 1030 हेक्टेयर में रेशम कीट का पालन किया गया, जिससे 3126 किलोग्राम रेशम का उत्पादन हुआ. कोरबा के 128 हितग्राही और श्रमिक लाभान्वित हुए. साल 2025- 26 में 1199 हेक्टेयर में रेशम उत्पादन हुआ. सितंबर तक 1484.00 किग्रा रेशम उत्पादन किया जा चुका है. इससे पहले साल 2024-25 में 1199 हेक्टेयर में रेशम कीट पालन कर 5052 किग्रा मलबरी ककून का उत्पादन किया गया. जिससे 487 हितग्राही, स्व सहायता समूह की महिलाएं और किसान लाभान्वित हुए. साल 2019 से साल 2023 तक 1199 हेक्टेयर में रेशम उत्पादन 69, साल 2018 में 1396 हेक्टेयर में रेशम उत्पादन 99 लोग लाभांवित हुए.

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कोरबा में रेशम उत्पादन (ETV Bharat Chhattisgarh)

सिल्क समग्र योजना से निजी किसान भी जुड़े : सहायक संचालक बीएस भंडारी ने बताया कि मलमरी केंद्रों में महिला समूह कोसा उत्पादन कर रही है. रेशम उत्पादन के लिए विभिन्न तरह की योजनाओं का संचालन किया जा रहा है. सिल्क समग्र योजना के अंतर्गत किसानों को एक एकड़ में पौधों का रोपण कराया जाता है. इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से 5 लाख रुपये तक की राशि मुहैया कराई जाती है. जिसमें पूरी तरह छूट है. सिल्क समग्र योजना के फायदा निजी किसानों को भी दिया जा रहा है. सिल्क समग्र योजना के अंतर्गत साल 2021- 22 में 13 किसान, 2022- 23 में 30 और 2023- 24 में 14 किसानों को लाभ मिल चुका है. इसके अंतर्गत 45 एकड़ लघु सीमान्त कृषक निजी भूमि पर शहतूती पौधरोपण कर योजना से जुड़े हैं. पौधरोपण कार्य पूर्ण कर उन्हें मलबरी ककून उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया गया. यह सभी अब ककून का उत्पादन कर रहे हैं.

25 सालों में रेशम उत्पादन का दायरा बढ़ा है. निजी किसान भी हमसे जुड़ रहे हैं. महिला समूह को भी से जोड़ा गया है. महिला समूह की महिलाएं हो या फिर श्रमिक सभी लाभान्वित हुए हैं-बीएस भंडारी, सहायक संचालक, रेशम विभाग कोरबा

कोरबा में रेशम उत्पादन : विभाग ने बताया कि रेशम से जुड़ी योजनाओं से वर्ष 2025-26 में 1523 किसान, हितग्राहियों एवं श्रमिकों को माह सितम्बर 2025 तक लाभान्वित किया गया है. रेशम योजनाओं से लाभान्वित हितग्राहियों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है. वर्ष 2000 में 1756 हितग्राही लाभान्वित हुए थे. वर्ष 2024-25 तक यह संख्या बढ़कर 2759 तक पहुंच गई है.

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